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Sunday, 19 March 2017

योगी बने ‘राजयोगी’, यूपी में ला पाएंगे राम राज?


योगी आज उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास के शिखर पर खड़े हैं लेकिन उनकी जिंदगी पहाड़ों के शिखर से शुरू हुई थी। एक राजपूत परिवार में जन्मे योगी बचपन से ही योग और धर्म में गहरी आस्था रखते थे वहीं आस्था उन्हें गोरखनाथ मठ तक खींच लाई। योगी आदित्यनाथ ने राजनीतिक के आंगन में धर्म को ला बिठाया। अब जब वो उत्तर प्रदेश के सीएम बन गए हैं तो सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वो उत्तर प्रदेश में राम राज ला पाएंगे।
वैसे अयोध्या में राम मंदिर का सवाल भी अब चर्चा का केंद्र बना हुआ है। राम मंदिर एक ऐसा मुद्दा है जिसने पहली बार बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाने का काम किया थालेकिन अभी तक उसका ये वादा अधूरा ही है। हालांकि अब स्थितियां बदल गई हैं और केंद्र के साथ यूपी में भी बीजेपी की ऐतिहासिक बहुमत वाली सरकार है। बीजेपी काफी समय से कहती आई है कि यूपी में पूर्ण बहुमत आने पर राम मंदिर बनाया जाएगा। बीजेपी काफी समय से कहती आई है कि यूपी में पूर्ण बहुमत आने पर राम मंदिर बनाया जाएगा। हालांकि इसके आलावा भी और कई मुद्दे है, चुनाव के दौरान योगी ने खुद भी कई वादे किए थे। लेकिन उनकी कट्टर हिंदुत्ववादी छवि को देखते हुए लगता है कि कुछ खास कामों को वह ज्यादा तरजीह दे सकते हैं। बहरहाल योगी से राजयोगी बने आदित्यनाथ को इन कसौटियों पर खड़े उतरने की चुनौती होगी।

लोकसभा चुनाव 2019: घूमेगा विकास का पहिया या चलेगा हिंदुत्व का रथ ?


उत्तर प्रदेश में रविवार से योगी राज की शुरुआत हो गई. योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े सूबे यानी यूपी के सीएम के बन गए हैं. उनके साथ केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा दोनों को डिप्टी सीएम बनाया गया है. देश में ये पहली बार हो रहा है जब किसी राज्य में दो डिप्टी सीएम बनाया गया हो.
एक के साथ दो मुफ्त वाले अंदाज में. पिटारा खुला तो एक नहीं पूरे तीन मुख्यमंत्री एक साथ निकले. लेकिन तीनों एक साथ बन नहीं सकते थे. लिहाजा दो को `उपबनकर एडजस्ट करना पड़ा और इस तरह यूपी के सत्ता के गलियारे में त्रिमूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो गई. योगी आदित्यनाथ राजपूत वर्ग से आते है केशव प्रसाद मोर्य ओबीसी चेहरा है और दिनेश चंद्र शर्मा ब्राह्मण चेहरा है. इस तरह से राजपूत ब्राह्मण और ओबीसी का पावर वैलेंस टीम मोदी ने यूपी में साधने की पूरी कोशिश की है.
2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी. एनडीए और बीजेपी को प्रचंड बहुमत विकास के मुद्दे पर मिला. कुछ समय की शांति के बाद घर वापसी,लव जेहाद और गोरक्षा जैसे संघ के तमाम एजेंडे सामने आ गए.
एक प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने कभी खुलकर इनमें से किसी एजेंडे का समर्थन नहीं कियालेकिन कभी कड़े शब्दों में निंदा भी नहीं की. मोदी के पैरोकार लगातार ये साबित करते रहे कि कारगुजारी चंद कट्टर लोगों की है और बदनाम बेवजह प्रधानमंत्री को किया जा रहा है.
यूपी का चुनावी नतीजा पूरी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति का नतीजा था. तब सवाल ये है कि जब चुनाव विकास के मुद्धे पर लड़ा और जीता गया तो फिर ऐसी क्या मजबूरी आ पड़ी कि एक ऐसे आदमी को सीएम बनाया गयाजिसकी इकलौती पहचान आक्रमक हिंदुवादी नेता होना है.
दरअसल यूपी चुनाव के दौरान घूमा विकास का पहिया हिंदुत्व के रथ में जुड़ चुका है. अब देश की भावी राजनीति की तस्वीर बिल्कुल साफ है. विकास और हिंदुत्व नरेंद्र मोदी की राजनीति के दो इंजन थे. जब जैसी जरूरत होतीउनका वैसा इस्तेमाल होता आया था. अब नई कहानी सामने आ चुकी हैजिसके मुताबिक हिंदुत्व ही विकास है और विकास ही हिंदुत्व है. यानी साफ है कि आने वाले दिनों में एक बार फिर बीजेपी अपने पुराने रंग में दिखेगी और हिंदुत्व के मुद्दे पर ही 2019 का चुनाव लड़ा जाएगा. ऐसे में योगी आदित्यनाथ के फायर ब्रांड हिंदुत्व वाला तड़का बीजेपी वाली राजनीति के लिए सोने पर सुहागा जैसी हो सकती है.

Wednesday, 8 March 2017

महिला दिवसः यूपी की राजनीति में दबंग होती महिलाएं


उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति का समीकरण बहुत अहम है लेकिन महिलाओं की हिस्सेदारी की भी अनदेखी नहीं की जा सकती है। खास तौर पर आज जब हम एक तरफ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं और दूसरी तरफ यूपी में चुनाव जारी है तो ऐसे में इस चुनाव में महिलाओं के योगदान की बात न हो तो बात अधूरी रह जाती है। वह वक्त गया जब महिलाएं सिर्फ घर के मुखिया की बात मानकर वोट डाल देती थीं। बदलते दौर में महिलाएं अपनी जरूरतों को ध्यान में रखकर अपने पसंदीदा उम्मीदवार को वोट करती हैं। न सिर्फ मतदाता के तौर पर बल्कि एक लीडर के तौर पर भी राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को आगे कर रही हैं।

यूपी की राजनीति में कभी पुरुषों के पीछे-पीछे चलने वाली महिलाएं अब आगे बढ़कर कमान संभाल रही हैं। यही वजह है कि राजनीतिक पार्टियां भी अब उन्हें पहले के मुकाबले ज्यादा मौके दे रही हैं। हालांकि ऐसी बहुत सारी महिलाएं हैं जिन्होंने इस चुनाव में किसी न किसी रूप में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन यहां कुछ महिलाओं का जिक्र करना जरूरी है।

मायावती

बसपा की कद्दावर महिला नेता मायावती पार्टी में एकमात्र बड़ा महिला चेहरा हैं और वह अपने दम पर अकेले ही चुनाव जीतकर सरकार बनाने का दमखम रखती हैं। इस बार भी अकेले अपने दम पर चुनाव प्रचार कर चौथी बार सूबे की मुख्यमंत्री बनने की पुरजोर कोशिश कर रहीं हैं। यही नहीं, मायावती ने पार्टी में कई महिला नेताओं को टिकट देकर यह संदेश देने की भी कोशिश की है कि वह महिलाओं को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं और महिला सशक्तीकरण उनके लिए बड़ा मुद्दा है।

राजबाला चौधरी

बागपत जिले की छपरौली जो कि अजीत सिंह का गढ़ रहा है। लेकिन अजीत सिंह के दबदबे को चुनौती देने के लिए बहुजन समाज पार्टी ने यहां राजबाला चौधरी को उतारा है। करीब 55 साल की राजबाला मौजूदा समय में नगर पंचायत की चेयरमैन हैं। राजबाला ख़ुद जाट हैं और छपरौली की ही हैं। उनके पति नरेश राठी कभी राष्ट्रीय लोकदल के कार्यकर्ता हुआ करते थे, लेकिन 12 साल पहले उनकी हत्या कर दी गई थी। राजबाला कहती हैं वह अपने पति के अधूरे सपने को पूरा करने के लिए चुनाव मैदान में उतरी हैं।

अपर्णा यादव और डिंपल यादव

यूपी विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव की दो बहू ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव लखनऊ कैंट से चुनाव लड़ रही हैं तो वही बड़ी बहू सीएम अखिलेश यादव की पत्नी और कन्नौज से सांसद डिंपल पार्टी की स्टार प्रचारक हैं और उन्होंने पार्टी के लिए जम कर चुनाव प्रचार किया। वहीं यादव परिवार की छोटी बहू अपर्णा यादव चाहतीं तो कोई आसान सीट से चुनाव लड़ सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपने लिए लखनऊ कैंट की उस सीट का चुनाव किया, जहां से अब तक समाजवादी पार्टी कभी चुनाव नहीं जीत पाई है। अपर्णा के पास एक और चुनौती है दरअसल उनका मुकाबला बीजेपी की रीता बहुगुणा से हैं जो कि यहां से मौजूदा विधायक हैं।

रीता बहुगुणा जोशी

यूपी के पूर्व सीएम हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी रीता बहुगुणा को राजनीति विरासत में मिली है। वह हाल ही में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हुई हैं। चूंकि पिछले चुनाव में वह इसी सीट से बीजेपी प्रत्याशी को हरा कर जीती थी, इसलिए पार्टी ने उन्हें इस सीट से मैदान में उतार दिया है। वो अपने इलाके में शुरू से सक्रिय रही हैं। घर-घर में उनकी पहचान है।

स्वाति सिंह

मायावती पर अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में बीजेपी से निकाले गए नेता दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को बीजेपी ने सरोजनीनगर से अपना उम्मीदवार बनाया। स्वाति सिंह पिछले कुछ महीनों से बीजेपी की यूपी महिला विंग की अध्यक्ष हैं। उनके सामने दो बड़ी चुनौती है। पहली चुनौती तो ये है कि सरोजनीनगर में अब तक बीजेपी ने कभी चुनाव नहीं जीता है। लेकिन स्वाति सिंह के सामने दूसरी चुनौती कहीं ज्यादा बड़ी है। दरअसल समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव के चचेरे भाई अनुराग यादव को यहां से उम्मीदवार बनाया है। लेकिन इन सबके बावजूद वो इन चुनौतियों से डरी नहीं।

प्रियंका गांधी वाड्रा

यूपी की सियासत में अगर प्रियंका गांधी की बात न हो तो बात अधूरी रह जाती है। यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन में बड़ी भूमिका निभाने वाली प्रियंका गांधी कांग्रेस की स्‍टार प्रचारक हैं। हालांकि इस बार वो पार्टी के लिए इतना प्रचार नहीं कर पाई लेकिन उनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रियंका को लेकर कांग्रेस में कई बार सक्रिय भूमिका निभाने की मांग भी हो चुकी है और ऐसा माना जा रहा है कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में प्रियंका पार्टी में बड़ी भूमिका के साथ नजर आएंगी।

अदिति सिंह

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली की रायबरेली सदर सीट से बाहुबली अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह कांग्रेस प्रत्याशी हैं। अदिति के पिता जब कांग्रेस में थे तब भी इसी सीट से विधानसभा में पहुंचते थे ओर अब विरासत में ये सीट उन्होंने अपनी बेटी को दी है। अखिलेश सिंह इस सीट से 5 बार विधानसभा में पहुंच चुके हैं। अब उनकी जगह जींस पहने और आंखों पर महंगा चश्मा लगाए, विदेश में पली-बढ़ी उनकी बेटी सड़कों और गलियों की खाक छान रही हैं और उनके सामने पिता के विरासत को बचाने की चुनौती है।

इन सब के अलावा और भी कई महिला नेता हैं जो यूपी चुनाव में सक्रिय भूमिका में रहीं हैं। अब राजनीति में महिलाओं की भूमिका भी बढ़ती जा रही है और कोई भी दल अब महिला नेताओं को कम आंकने की भूल नहीं कर रहा है। हालांकि इन सबके बावजूद महिलाएं अभी भी अपना मकाम तलाश रही हैं। यूपी की सभी पार्टियों ने महिलाओं को स्टार प्रचारक के रूप में तो उतारा लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि इस बार चुनावी मैदान में महिला उम्मीदवारों की संख्या बहुत कम है। बीजेपी ने 371 में से 42 महिलाओं को टिकट दिए हैं। जबकि समाजवादी पार्टी ने 298 में से 31 महिला उम्मीदवार खड़े किए हैं। बहुजन समाज पार्टी ने पूरे राज्य में केवल 19 महिलाओं को टिकट दिया है, वहीं कांग्रेस ने 105 सीटों में छह सीटों पर महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है।

Tuesday, 7 March 2017

कैराना, कसाब, करंट के बाद अब सबकी नजर काशी पर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और राहुल गांधी के रोड शो के बाद वाराणसी में चुनावी रंग चोखा हो चला है. इस रंग में अफवाहों की भांग ने रही-सही कसर पूरी कर दी है, क्योंकि यह बनारस है और होली करीब है, इसलिए यहां चुनावी चर्चा चाय की दुकानों से बाहर निकल कर भांग और ठंढई की दुकानों तक पहुंच गई है.

वैसे तो सत्ता का सड़क से नहीं महल से मतलब होता है लेकिन लोकतंत्र में सड़क नापते हुए ही सत्ता के महल तक पहुंचा जा सकता है, लिहाजा एक-एक कर चक्रव्यूह के छह दरवाजे पार करने के बाद अब सत्ता के सातवें दरवाजे पर सभी सियासी दल की नजर हैं. इसके लिए सभी दलों ने अपनी पूरी ताकत भी झोंकी. सभी दलों को ये अच्छे से पता है कि अगर यूपी जीतना है तो बनारस को जीतना ही होगा. खास कर बीजेपी के लिए तो ये नाक का सवाल है और शायद यही कारण है कि पूरी केंद्र सरकार ने अपना काम स्थगित कर वाराणसी को ही फोकस में रखा था. इतना ही नहीं खुद पीएम मोदी ने भी यहां लोकसभा चुनाव से भी ज्यादा वक्त बिताया. अब जिन चालीस सीटों पर कल चुनाव है उनमें वाराणसी जिले की आठ सीटें भी शामिल हैं. 2012 में इन आठ में से तीन सीटों पर बीजेपी का कब्जा था, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी सीटों पर बीजेपी को बढ़त मिली थी. शायद इसीलिए पीएम को भरोसा है कि यूपी में जीत की होली जरूर मनेगी. लेकिन सवाल ये है कि क्या जो लोकसभा में हुआ था वही विधानसभा में भी होगा. इस सवाल का जवाब तो 11 मार्च के बाद ही मिलेगा फिलहाल कैराना, कसाब, करंट के बाद अब सबकी नजर काशी पर टिकी है.

Thursday, 2 March 2017

यूपी चुनाव 2017: काशी की कसौटी पर



उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अपने अंतिम पड़ाव की तरफ बढ़ता जा रहा है. पांच चरण के मतदान हो चुके हैं. बाकी बचे दो चरणों में सभी दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है और वाराणसी इसका मुख्य केंद्र है. बनारस सभी पार्टियों के लिए खास इसलिए भी है. क्योंकि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है. लिहाजा यहां की हार और जीत देश के फलक पर पार्टी की राजनीति पर गहरा असर डाल सकती है. 

वाराणसी फतह करने के लिए तमाम राजनीतिक दलों में चुनाव प्रचार के दौरान वायदे और कसमें खाने की होड़ मची हुई है. लेकिन कड़वा सच ये है कि गंगा स्नाकन से दिनचर्या की शुरुआत करने वाले बनारस के लोग आज खासा परेशान है. पर इसका सुध लेने वाला कोई नहीं है. बंद पड़ी चीनी मिलें होबनारसी साड़ी उद्योग या कालीन उद्योग की दिक्कतें हो या फिर कई जिलों में हर साल आने वाली बाढ़ की समस्या होशहर के संकरी सड़कें हों. किसी पर भी अभी तक एक भी पार्टी ने कोई रोडमैप या आश्वासन नहीं दिया है. बस हर कोई एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में लगा है. किसी को इनकी सुध नहीं है. 

दरअसल हमेशा चुनावी मौसम में बनारस इन राजनेताओं के लिए मुख्य केंद्र तो बन जाता है. लेकिन चुनाव के बाद सब भूल जाते है. चाहे वो पीएम मोदी की काशी को क्योटो बनाने की बात ही क्यों ना हो. बहरहाल काशी के बारे में एक कहावत मशहूर है. रांड,सांडसीढ़ीसंन्यासीइनसे बचै तो सेवै काशी. इस कहावत का मतलब ये है कि काशी में विद्वतासंस्कृतिकला हर चीज की पराकाष्ठा है तो ठगी की भी है और यहां के लोग इन नेताओं से हमेशा ठगे ही जाते है.