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Thursday, 5 January 2017

असमंजस में अखिलेश, कांग्रेस को गठबंधन की आस, बीजेपी को चेहरे की तलाश, पर बीएसपी तैयार


उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। पूरा प्रदेश कड़ाके की ठंड की चपेट में है। पूर्वी उत्तर प्रदेश का हर जिला कुहासे के आगोश में है। कमोबेश यही हाल चुनावी जंग में उतरने वाली पार्टियों का भी है। उनका कुहासा अभी छटा नहीं है। समाजवादी पार्टी पिता-पुत्र  में उलझी है। कांग्रेस को गठबंधन की आस है तो बीजेपी को चेहरे की तलाश। अगर कोई आश्वस्त हैं तो वो सिर्फ मायावती। उन्हें उम्मीद है सोशल इंजीनियरिंग के सहारे वे जंग जीत लेंगी। मायावती को उम्मीद है कि वह 2007 के फार्मूले के आधार पर 2017 में भी सरकार बना लेंगी।

चुनावी बिगुल बजने पर सत्ताधारी दल के प्रदेश मुख्यालय में सबसे ज्यादा गहमागहमी अपेक्षित थी, लेकिन वहां सन्नाटा पसरा है। समाजवादी पार्टी को पता ही नहीं कि उसका लीडर कौन होगा। सिंबल क्या होगा। और तो और मुकाबले में कौन होगा। पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर प्रत्याशी तक सब के सब असमंजस में हैं। सपा कार्यकर्ता और वोटर दोनों की समझ में नहीं आ रहा कि वे कहां जाए।

उधर कांग्रेस में जान फूंकने की कवायद में जुटे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जरूरत जब पार्टी को हैं तो वे परिदृश्य से गायब हैं। चुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले उन्होंने गांव-गांव की खाक छानी थी। लेकिन, ऐन वक्त पर वह विदेश में नए साल की छुट्टियां मना रहे हैं।

वहीं 14 साल के वनवास के बाद सूबे में सरकार बनाने का मंसूबा पाले बैठी बीजेपी के प्रत्याशी अभी तय नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भले ही रैलियों के जरिए कार्यकर्ताओं में जोश भरने में जुटे हों लेकिन जमीनी हकीकत ये है पार्टी की आधी से ज्यादा सीटों पर अपने प्रत्याशियों के चयन में ठंड में भी पसीना छूट रहा है। पार्टी में बाहर से आए नेता मुसीबत का सबब बन गए हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य हो या बृजेश पाठक इस तरह के नेताओं की लंबी फौज है। बहरहाल 21 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में अभी तक कोई चुनावी मुद्दा भी नहीं बन पाया है। ऐसे में बड़ा सवाल है पार्टियां मैदान में उतरेंगी कैसे?

Wednesday, 4 January 2017

आखिर लोकसभा-विधानसभा चुनाव एक साथ क्यों नहीं ?


चुनाव लोकतंत्र की धड़कन है और उसके जीवंत होने का प्रमाण भी लेकिन हमें बार-बार चुनावों से बचना चाहिए। आज हर साल किसी ना किसी राज्य में चुनाव होते हैं और इससे केन्द्र सरकार के सामने एक चुनौती पैदा हो गई है। चुनाव आयोग लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने में सक्षम भी है। कुछ दिन पहले मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने भी कहा था कि अगर सभी राजनीतिक दल सहमत हों तो लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराना संभव है। बेशक ऐसा कराने के लिए नई वोटिंग मशीनों समेत जरूरी संसाधनों पर व्यय करना होगा, लेकिन एक साथ चुनाव से बचने वाला समय और संसाधनों के मुकाबले वह ज्यादा मायने नहीं रखता। फिर एक साथ चुनाव के लिए संसाधनों पर होने वाला व्यय भी एक ही बार होगा। यह सही है कि एक साथ लोकसभा-विधानसभा चुनाव की ताजा बहस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह से छिड़ी है, लेकिन यह मुद्दा नया नहीं है। पहले भी इस जरूरत पर जोर दिया जाता रहा है, ताकि बार-बार होने वाले चुनावों पर होने वाले धन और मानव श्रम के व्यय से बचा जा सके। यह असंभव भी नहीं है। आखिर साल 1967 तक तो देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही होते थे।
दरअसल संविधान लागू होने के बाद चार बार (1952, 1957, 1962, 1967) लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए। लेकिन 1967 में आठ राज्यों जिसमें बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मद्रास (तमिलनाडु) और केरल में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनने से संपूर्ण संघीय ढांचे पर कांग्रेस का एकछत्र वर्चस्व खत्म होने की शुरुआत हो गई। गैर-कांग्रेसी सरकारों को भंग करके उन राज्यों में मध्यावधि चुनाव कराए गए। तबसे लेकर आज तक एक साथ चुनावों का चक्र बन नहीं पाया जिसके कारण हर समय देश में कहीं न कहीं चुनाव चलता ही रहता है और इस कारण से समाज से लेकर सरकारी तंत्र तक पर जो बोझ और असर पड़ता है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि एक साथ चुनाव कराने में कई बाधाएं भी है। संविधान ने लोकतंत्र का संसदीय-मॉडल दिया जिसमें लोकसभा और विधानसभाएं पांच सालों के लिए चुनी जाती हैं, लेकिन अनुच्छेद 85 (2) ब के अनुसार राष्ट्रपति लोकसभा को और अनुच्छेद 174 (2) ब के अंतर्गत राज्यपाल विधानसभा को पांच साल के पूर्व भी भंग कर सकते हैं। अनुच्छेद 356 के तहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है और विधानसभाओं को आपातकाल की स्थिति में उनके कार्यकाल के पूर्व भी भंग किया जा सकता है।
बहरहाल इन सब बातों को अगर नजर अंदाज कर दिया जाए तो इसके कई फायदे भी है। देश को हर साल चुनाव से राहत मिलेगी  सरकार और जनता को पांच सालों तक अपने-अपने काम पर ध्यान देने का अवसर मिलेगा। साथ ही राजनीतिक दलों को रह-रह कर चुनाव की मुद्रा में आने की जरूरत नहीं रहेगी और वे सारा ध्यान अपने एजेंडे पर केंद्रित कर सकेंगे।





नेता जी के नाम खुला खत


आदरणीय नेता जी,
प्रणाम,
मैं सोनू कुमार... एक साधारण सा पत्रकार...
आप बाप-बेटे ने तो मिल कर पिछले 4-5 दिनों से हम पत्रकारों के दिमाग का दही कर रखा है... हम कोई भी ख़बर लिखने जाए तब तक कुछ ना कुछ बदल जाता है... जैसे हम अापकी (मुलायम सिंह यादव) कोई ख़बर लिखते है तो ख़बर लिखते-लिखते हमे पता चलता है कि अापको ही पार्टी से निकाल दिया गया और जब तक हम ख़बर चलाए तब तक अाप फिर पार्टी में वापस भी आ जाते हैं... आपके रोज-रोज के इस सस्पेंस से हम पत्रकार परेशान और कन्फ्यूजन हो गए हैं... एक कन्फ्यूजन हो तब ना अब देखिये ना पता ही नहीं चल रहा कि आखिर राष्ट्रीय अध्यक्ष किसे मानें अाप (मुलायम सिंह यादव) को या अखिलेश यादव को? प्रदेश अध्यक्ष किसे मानें शिवपाल यादव को या नरेश उत्तम को? अमर सिंह को पार्टी से निष्कासित मान लें या नहीं? किरनमय नंदा और नरेश अग्रवाल पार्टी में हैं या पूर्व समाजवादी हो लिए? आपकी पार्टी का एक नारा था, ‘जलवा जिसका कायम है उसका नाम मुलायम है’ फिलहाल की हालत तो ये है कि पता ही नहीं चल रहा है कि समाजवादी पार्टी में जलवा आखिर है किसका?
नेता जी अापके राजनीतिक जीवन में चालाकियों के ना जाने कितने किस्से होंगे... इसमें कोई शक नहीं कि उनमें से कई किस्सों को अखिलेश ने अपनी आंखों के सामने जीवंत होते देखा हो... आपके राजनीतिक विरासत को संभाल रहे अखिलेश अब उन सारे दांव का अगर खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपको बुरा नहीं लगना चाहिए बल्कि गर्व होना चाहिए... नेता जी अगर अखिलेश को विरासत सौंपी है तो फैसले का अधिकार भी उन्हीं के पास रहने दीजिए... अब ये झगड़ा लंबा खिंच चुका है... ना केवल हम पत्रकार बल्कि जनता भी ऊब चुकी है... वोटर्स राय बनाने लगे हैं... कहीं जो फैसला अाप बाप-बेटे मिल कर नहीं कर पा रहे हैं वो जनता न कर ले... लोग सोच रहे हैं कि समाजवादियों के घर में सास बहू टाइप का ये फैमिली ड्रामा आखिर कब खत्म होगा? इसलिए जीतना जल्दी हो सके इस झगड़े को सुलझा लीजिए... आपका शुभचिंतक!

सोनू कुमार झा