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Wednesday, 6 December 2017

अयोध्या विवादः सिर्फ राजनीतिक टीआरपी का जरिया भर ?


बाबरी मस्जिद गिराए जाने के आज 25 साल पूरे हो गए. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी गई थी, जिसका मुकदमा आज भी लंबित है. अदालत में ये विवाद 1950 से चल रहा है, यानी पिछले 67 सालों से इस विवाद का कोई हल नहीं निकल पाया है. ये भारतीय न्यायपालिका के इतिहास के सबसे लंबे समय तक चलने वाले केस में से एक है. 67 साल पुराना ये एक ऐसा विवाद है, जिसकी वजह से देश में कई बार राजनीतिक और सामाजिक उथल पुथल हो चुकी है. क्योंकि ये मामला ज़मीन के एक टुकड़े का नहीं बल्कि हिंदू और मुसलमान, दोनों समुदायों की धार्मिक आस्था और संविधान के मूल सिद्धांतों से जुड़ा हुआ है. आप इसे भारत की 'राम' कहानी भी कह सकते हैं.
67 साल में पीढ़ियां बदलीं, लोग बदले, राजनीति बदली, कई प्रधानमंत्री बदले, यूपी में मुख्यमंत्री बदले, लेकिन नहीं बदला तो अयोध्या. ऐसे में सवाल उठता है कि रामजन्मभूमि से जुड़ा ये विवाद क्यों नहीं सुलझ पाया? क्या हमारी सरकारें ये विवाद सुलझाना ही नहीं चाहतीं? क्या राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद सुलझाने से कई राजनीतिक दलों की राजनीति खत्म हो जाएगी या फिर हमारे देश की सरकारें इस विवाद को सुलझाने से डरती हैं? ये वो तमाम सवाल हैं, जिनका जवाब आज का युवा ढूंढ रहा है.
अयोध्या का मामला जितना धार्मिक है उससे कहीं अधिक राजनीतिक है. इस मुद्दे की आंच तेज़ करके लालकृष्ण आडवाणी ने बीजेपी को 2 सीटों वाली पार्टी से एक शक्तिशाली राष्ट्रीय राजनीतिक दल बनाया. हमेशा से राम मंदिर का मुद्दा चुनाव के बीच गर्माने लगाता है.
दरअसल देश की दो सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी और कांग्रेस दोनों राजनीतिक दल को अयोध्या में मंदिर बनाने या न बनाने से ज्‍यादा बेताबी इस बात की है कि इस मसले का किस तरह से खुद राजनीतिक फायदा उठाया जाए और दूसरे दल को इसका फायदा उठाने से रोका जाए. दोनों का हित इसी में है कि यह मसला लंबा खिंचे. बीजेपी का हित जहां इस बात में है कि इस मसले पर गुजरात चुनाव और आगे 2019 के लोकसभा चुनाव तक टेम्‍पो बना रहे. वहीं कांग्रेस शायद यह चाहती है कि इसे किसी तरह 2019 से आगे तक टाल दिया जाए, ताकि लोकसभा चनाव में बीजेपी को किसी तरह का फायदा न मिल पाए.

जरा सोचिए अगर मामले को सुप्रीम कोर्ट से ही निपटाना था तो यह काम तो पहले ही किया जा सकता था, इस पर इतने साल तक आंदोलन करने, बवाल काटने और मसला बनाने का फिर क्‍या फायदा रहा, सिवाय इसके कि इतने साल तक इससे बीजेपी को सत्‍ता मिलती रही. अगर विवादित स्थल पर राममंदिर बनाने को वचनबद्ध केंद्र सरकार होती और उत्तर प्रदेश में गोरखनाथ मठ के महंत योगी आदित्यनाथ की सरकार होती. तो अब तक मंदिर बन गया होता. क्योंकि जब एक फ़िल्म पर ऐसा तूफ़ान खड़ा किया जा सकता है, तो मंदिर के लिए जो उन्माद पैदा होगा वो कैसा होगा, कल्पना की जा सकती है. यानी साफ है बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों ही पार्टियां चाहती है कि अयोध्या मुद्दा यूं ही गरमाते रहे और उस पर ये दोनों अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते रहे.

Tuesday, 28 November 2017

यूपी निकाय चुनाव: सिंबल के इज्जत का सवाल है


उत्तर प्रदेश में निगम चुनाव दो चरणों का मतदान खत्म हो गया है और तीसरे यानि अंतिम चरण के लिए मतदान 29 नवंबर को होना हैं. यह मतदान 26 जिलों में होना है. निकाय चुनाव के आखिरी दिन सभी दल ताबड़तोड़ प्रचार किया. सीएम योगी आदित्यनाथ ने कई रैलियों को संबोधित किया. साथ ही कई दिग्गज नेताओं ने भी रैलियां की. आमतौर पर निकाय चुनाव में सीएम कैंपेन नहीं करते. अब सवाल है कि जब शहरों की सरकार चुनने के इस चुनाव से न तो यूपी में सरकार बदलनी है और न ही दिल्ली में, तो आखिल सभी दलों ने इतनी ताकत क्यों झोंक रखी है.
दरअसल चुनाव सिंबल पर हो रहे हैं तो नतीजों से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. यानि जमीन पर स्थानीय नेताओं ने कितनी मेहनत की उसका खुलासा हो जाएगा. नतीजे पक्ष में न आने पर किसी संभावित कार्रवाई के खौफ से जिलों, शहरों के नेता-कार्यकर्ता जी-जान से जुटे हैं.
बात बीजेपी की करे तो विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत के बाद उत्तर प्रदेश का नगर निकाय चुनाव बीजेपी के लिए अब नाक का सवाल बना हुआ है. तमाम बयानों और चुनावी गुणा-गणित के बीच पूरे अभियान में प्रचार की कमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथ में होना इस बात का साक्ष्य है कि न सिर्फ शीर्ष नेतृत्व उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि को भुनाना चाहता है, बल्कि उनके बहाने पार्टी सदस्यों में इस बात का संदेश देना चाहता है कि चुनाव किसी भी स्तर के हों लेकिन उनका महत्व पार्टी के लिए कम नहीं है.
समाजवादी के पक्ष में एक बात यह भी है कि विधानसभा चुनाव में खराब नतीजों के बावजूद पार्टी के प्रति नेताओं का भरोसा टूटा नहीं है. बीएसपी और कांग्रेस छोड़ कई बड़े नेता बीते कुछ महीनों में एसपी में शामिल हुए हैं जिनमें बीएसपी से आए दलितों के कद्दावर नेता इंद्रजीत सरोज भी शामिल हैं.
वहीं समाजवादी पार्टी के रणनीतिकरों का यह भी मानना है कि विधानसभा के चुनाव में गैर यादव ओबीसी जातियों का जो बड़ा तबका बीजेपी के साथ गया था उसका सत्तारूढ़ दल से मोहभंग शुरू हुआ है और निकाय चुनावों में वह साइकिल की सवारी कर सकता है. निकाय चुनावों में मुस्लिम वोटरों के रुख को लेकर बाकी गैर बीजेपी दलों की तुलना में एसपी ज्यादा अश्वस्त दिख रही है.
ऐसा इसलिए क्योंकि विधानसभा चुनावों से बीजेपी के मजबूत होकर उभरने के बाद मुस्लिम वोटरों का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी को अपनी स्वाभाविक पसंद मान रहा है. इस तबके से मिल रहे ऐसे ही संकेतों के कारण एसपी ने अब अति अल्पसंख्यकवाद की पुरानी सियासत को पीछे किया है और हिंदू प्रतीकों की राजनीति के जरिए बीजेपी को उसके ही हथियार से घेरने की कोशिश कर रही है. इटावा के सैफई में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति बनवाने की अखिलेश यादव की पहल इसी रणनीति का हिस्सा है.
2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में सपा अगर पहले से कमजोर हुई तो वहीं बीएसपी गर्त में ही चली गई. लोकसभा के चुनाव में उसका खाता ही नहीं खुला जबकि विधानसभा चुनाव में वह महज 19 सीटों पर सिमट गई. लिहाजा निकाय चुनाव बीएसपी के लिए एसपी से भी बड़ी चुनौती है कि वह अपने को लड़ाई में वापस लाए.

दलितों के एक बड़े तबके में बीजेपी ने पहले लोकसभा और फिर विधानसभा के चुनाव में सेंध मारी थी. बीएसपी के लिए निकाय चुनावों में इसे वापस लाने की बड़ी चुनौती है. दलितों पर अत्याचार का आरोप लगाते हुए मायावती ने हाल में कहा था कि यह नहीं थमे तो वह बौद्ध धर्म अपना लेंगी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अपने कोर वोट बैंक को जातीय पहचान छोड़ हिंदू पहचान को तवज्जो देने से रोकने के लिए ही उन्होंने निकाय चुनावों से पहले यह बयान दिया.

Saturday, 14 October 2017

पीएम मोदी के गुजरात में यूपी के सीएम योगी के होने के मायने


बीजेपी के पोस्टर बॉय यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ गुजरात दौरे पर हैं। गुजरात गौरव दौरे के दौरान योगी स्टार प्रचारक के रुप में दिखेंगे। अपने दो दिनों के दौरे पर योगी गुजरात के वलसाड, सूरत, कच्छ और भुज में 25 से 30 जनसभाएं करेंगे। जिसके जरिए वो हिंदू वोटरों को लूभाने की कोशिश करेंगे। वैसे तो मोदी और अमित शाह का गृह राज्य होने के कारण ये दोनों गुजरात में प्रचार के लिए काफी हैं। लेकिन इस बार बीजेपी को योगी को प्रचार में उतारना पर रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि करीब 22 साल बाद बीजेपी को पहली बार गुजरात में कड़ी चुनौती मिल रही है। एक तो पार्टी को इस बार सीएम उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी जैसा कोई दमदार चेहरा नहीं है। दूसरा पाटीदार आंदोलन और दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर पार्टी बचाव के मुद्रा में है। वहीं जीएसटी के बाद छोटे कारोबारी भी परेशान हैं और कांग्रेस को इस बात का अंदाजा है। यही वजह है कि उसने भी पूरी ताकत छोक दी है। राहुल गांधी खुद इस महीने दो बार गुजरात का दौरा कर चुके है। गुजरात में करीब 89 फीसदी हिन्दू वोटर है। बड़े पैमाने पर पूर्वांचली और उत्तर भारतीयों की आबादी है। ऐसे में बीजेपी को उम्मीद है कि योगी के दौरे से उसके पक्ष में माहौल बनेगा।

दरअसल पीएम मोदी के गृह राज्य होने के साथ-साथ गुजरात एकलौता राज्य है जहां बीजेपी करीब 22 सालों से लगातार शासन कर रही है। अगर यहा उसका प्रदर्शन खराब रहा है तो उसका असर पूरे देश में पड़ सकता है। यही वजह है कि बीजेपी किसी तरह का जोखीम लेने के मूड में नहीं है और जीत के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।

स्टार्टअप इंडिया: बदनाम पान पैलेस

अगर आप कभी बिहार पहुंचे और बिहार में मधुबनी जिला तो मधुबनी से 8 किलोमीटर की दुरी पर एक गांव बलिया है यहां के दुर्गा भवन के प्रांगण में एक 'बदनाम पान पैलेस' है वहां जरूर पहुंचे। यकीन मानिए आप यहां के पान खा के बनारसी पान भुल जाएंगे। साथ ही आप 'द कपिल शर्मा शो' भी देखना भुल जाएंगे क्योंकि यहां आपको पान के साथ-साथ कॉमेडी का भी भरपूर डोज मिलेगा। यही नहीं यहां आपको जिंदगी के कई बेहतरीन सलाह भी मिलेंगे जैसे तंबाकू सेहत के लिए हानिकारक है, गुटखा से कैसे पान बेहतर है। ऐसे कई सलाह आपको मिलेंगे।

हां लेकिन आप यहां तभी आए जब आपके पास एक पान खाने के लिए आधे-एक घंटे का समय हो। क्योंकि यहां एक पान लगाने में कम से कम आधे घंटे का समय लगता है लेकिन इस दौरान आप बोर नहीं होंगे। वैसे तो मैं पान नहीं खाता पर हर रोज अगर एक बार बदनाम पान पैलेस नहीं पहुंचा तो दिन पूरा नहीं होता और करीब यही हाल इस गांव के हर युवा का है। 'पंकज संन्यासी' उर्फ 'मास्टरमाइंड' का यह पान का दुकान बहुत पुराना तो नहीं है लेकिन आस-पास के गांव में मशहूर जरूर है और ये शायद दुनिया का इकलौता दुकान मिलेगा जिसमें आपको कोई दरवाजा नहीं मिलेगा। 'मास्टरमाइंड' का सपना है कि वो ऑनलाइन पान बेचे और इस पान को पूरे भारत में मशहूर करें। ताकि लोग कह सके खई के पान बलिया वाला
खैर अगर ये ऐसा कर पाए तो पीएम मोदी के 'स्टार्टअप इंडिया' का अच्छा उदाहरण होगा। 'मास्टरमाइंड' को उनके भविष्य और सपनों के लिए शुभकामनाएं!

Saturday, 3 June 2017

नीतीश जी ये नैंसी झा की नहीं सुशासन की हत्या है




बिहार के मधुबनी जिले में एक 12 साल की लड़की की निर्मम तरीके से की गई हत्या ने देश को हिला कर रख दिया है, ठीक वैसे ही जैसे सालों पहले निर्भया हत्याकांड ने लोगों को झकझोर कर रख दिया था। निर्भया कांड के बाद इंसाफ की आवाज उठाने के लिए लोग खुद घरों से निकल आएं थे। अपनी आवाज का हथियार लेकर... देश में हर तरफ सड़क से लेकर संसद तक बस एक ही आवाज थी। बदलना होगा, सामज को बदलना होगा, कानून को बदलना होगा, सोच को बदलना होगा। हर बेटी की आवाज थी, हर बहन का दर्द था, हर माँ की टीस थी और हर टीस में मिल रही थी उस जमात की आवाजें जो औरतों की आजाद सांसों की हिमायती थी। देखते ही देखते एक आंदोलन खड़ा हो गया। हर किसी के मन में बस एक ही बात चल रही थी ऐसी दरिंदगी के खिलाफ समाज को जागना होगा। इस हैवानियत से समाज को निकालना होगा। ऐसा दोबारा हो, उसका इंतजाम करना होगा। इस घटना के बाद एक उम्मीद जगी की शायद अब कुछ बदल जाए। शायद अब किसी चलती बस में... ऑटो में... घर में... या राह पर कोई और निर्भया रौंदी जाए। लेकिन हुआ क्या... कुछ भी तो नहीं बदला... सच्चाई यहीं है की निर्भया कांड के पहले भी ऐसे मामले होते रहे और उसके बाद भी हो रहे हैं और इसका जीता जागता उदाहरण है नैंसी झा हत्याकांड। आखिर क्या गलती थी उस मासूम की।
दरअसल 25 मई को लापता नैंसी झा की लाश 28 मई को सुबह उसी गांव के नदी के किनारे एक खेत में मिलती है। नाबालिग लड़की की लाश जिस स्थिति में बरामद हुई वह वाकई ही सभ्य समाज में रहने वाले लोगों के लिए रोंगटे खड़े करने वाला है। लड़की के शरीर पर तेजाब डाले गए थे। लड़की के दोनों हाथों के नसें काट दी गई थी। लड़की की गला को भी बड़ी निर्ममता से रेत दिया गया था। सोशल मीडिया पर इस बच्ची की तस्वीर देखकर रीढ़ की हड्डी में सिहरन होती है। लगता है कलेजे के बीचोंबीच किसी नरभक्षी ने अपने दांत गड़ा दिया हो। ताजुब तब और होती है जब ये पता चलता है कि नैंसी झा को पुलिस चाहती तो बचा सकती थी। क्योंकि जिस दिन नैंसी का अपहरण हुआ था उसी दिन नैंसी के पिता ने एफआईआर दर्ज करवाई थी मगर पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया। यही नहीं इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद भी नीतीश बाबू चुप चाप है। किसी नेता ने वहां जाना भी जरूरी नहीं समझा और ही इसपर आवाज उठाना जरूरी नहीं समझा पक्ष ही विपक्ष ने।
बहरहाल नैंसी की हत्या ने एक बार फिर से बिहार में गिरते नून व्यवस्था का पोल खोल दिया है। बिहार पुलिस पिछले एक-दो सालों से अपराध और अपराधियों पर नकेल कसने में नाकाम साबित हो रही है। बिहार के मुख्यमंत्री एक तरफ तो लड़कियों के बारे में सरेआम अपनी चिंता जाहिर करते हैं। बिहार में दहेज प्रथा को लेकर नए आंदोलन की बात करते हैं लेकिन वहीं दूसरी तरफ उनकी पुलिस तीन दिन तक एक नाबालिग का मरने का इंतजार करती है।

दरअसल बिहार में पिछले कुछ सालों से युवतियों के साथ रेप और अपहरण की घटना आम हो गई है। सूबे में कानून व्यवस्था पिछले कुछ सालों से बिल्कुल चरमरा सी गई है। रंगदारी, लूट, मर्डर जैसे शब्दो की दहशत बिहारवासियों पर एक बार फिर से छाने लगी है। ऐसे में बिहार में बढ़ रही आपराधिक घटनाओं और सरकार की विफलता पूरे बिहार में धीरे-धीरे उग्र रूप धारण करती जा रही है। इसलिए अब समय गया है कि सीएम नीतीश इसपर जल्द ही कुछ करें और अपने सुशासन को एक बार फिर सावित करें जिसके लिए वो जाने जाते हैं नहीं तो ऐसा हो कि बहुत देर हो जाए।