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Monday, 25 July 2016

गालियों की राज'लीला'


क्रिकेट के तरह ही राजनीति के मैदान में भी बाजी पलटने में देर नहीं लगती। कब किस पार्टी के नेता क्या बोल जाए और कब विरोधी उसका क्या मतलब निकल के राजनीतिक फायदा उठा ले, ये कोई नहीं जनता। अब देखिए बीते कुछ दिनों से देश के सबसे बड़े प्रदेश की राजनीति गालियों के बीच घूम रही है। गालियों की इस राज लीला को जानने से पहले आपको इस पूरे विवाद के इतिहास भूगोल को जानना होगा। इस गाली कांड की शुरुआत 19 जुलाई से हुई थी। उस दिन लखनऊ से बलिया जाने के दौरान मऊ में बीजेपी के तत्कालीन उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने मायावती को लेकर अपशब्द का इस्तेमाल किया। जवाब में सड़क पर उतरे बीएसपी के कार्यकर्ताओं ने गाली का जवाब गाली से देना शुरू दिया। नतीजा हुआ कि जिस गाली का विरोध करने मायावती के कार्यकर्ता सड़क पर उतरे थे उस गाली के फेर में खुद मायावती ही फंस गई। दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह ने आरोप लगाया कि बीएसपी वालों की गाली से उनकी 12 साल की बेटी बीमार हो गई है। इसके बाद  लखनऊ में दयाशंकर के परिवार ने मायावती और उनकी पार्टी के नेताओं के खिलाफ केस दर्ज करा दिया और दयाशंकर के खिलाफ बीएसपी कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन में उनकी मां, बेटी और बहन को लेकर लगाए गए आपत्तिजनक नारों के विरोध में बीजेपी 'बेटी के सम्मान में, बीजेपी मैदान में' नारे के साथ राज्यभर में भी प्रदर्शन किया और परिणाम ये हुआ की अब तक बैकफुट पर आई बीजेपी फ्रंट फुट पर खेलने लगी और मायावती की पार्टी एक झटके में बैकफुट पर गई।
दरअसल असल में गालियों की इस राज लीला के पीछे सम्मान के साथ-साथ वोट बैंक का गणित भी है। मायावती जिस दलित वोट बैंक के सहारे राजनीति करती आई हैं। उस दलित वोट में सेंध लगाकर बीजेपी लखनऊ की लड़ाई जीतने की तैयारी कर रही है। लेकिन गाली कांड ने मायावती को बीजेपी पर हमले का बड़ा हथियार दे दिया और इसी बहाने मायावती के कार्यकर्ता चार्ज हो गये।
यूपी में करीब 22 फीसदी दलित वोट है। जिसमें से 10 से 12 फीसदी जाटव वोट पर मायावती की पकड़ है। लेकिन लोकसभा चुनाव में दलितों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ था। अब विधानसभा में भी ऐसा हो इसी रणनीति के तहत बीएसपी ने अपने कार्यकर्ताओं को उग्र किया और सड़कों पर उतारा। अब बीजेपी की रणनीति भी समझ लीजिए।

दरअसल सवर्णों में मजबूत राजपूत जाति की आबादी करीब 7 से 9 फीसदी है। 2012 में बीजेपी को 29 फीसदी राजपूतों का वोट मिला था। जबकि समाजवादी पार्टी को 26 फीसदी। राजपूत वोट के बिना बीजेपी लखनऊ की सत्ता में लौट नहीं सकती है। दयाशंकर सिंह पर कार्रवाई के बाद बीजेपी दुविधा में है और यही वजह है कि पार्टी ने भले ही दयाशंकर को बाहर का रास्ता दिखा दिया है, लेकिन परिवार के साथ खड़ी हो गई। इतना ही नहीं गालियों की इस राजलीला पर पीएम ने भी गोरखपुर में चुप्पी साधे रखी। बीजेपी और बीएसपी में संघर्ष चल रहा है तो कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दर्शकों के बीच बैठकर इस पूरी फिल्म को बारीकी से देख रही है और मजे ले रही हैं।