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Saturday, 30 April 2016

बीजेपी का ‘हेलीकॉप्टर शॉट’





कांग्रेस की सत्ता चली गई लेकिन विवाद और भ्रष्टाचार के पुराने मामलों का साथ नहीं छुटा। इस बार सोनिया गांधी के लिए बुरी खबर उसकी मायके से ही आई है। अगस्ता वेस्टलैंड सौदे की सुनवाई कर रही इटली की एक अदालत ने अपने फैसले में ये माना है कि सौदे में जमकर भ्रषटाचार हुआ था। इस फैसले के बाद राजनीतिक जगत में एक बार फिर घोटाले को लेकर खलबली मची हुई है। इस घोटाले में सोनिया समेत कांग्रेस के पांच बड़े नेताओं के नाम सामने आने के बाद कांग्रेस अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक मुसीबत में है। कहां कांग्रेस संसद में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को लेकर बीजेपी पर हमला करने को तैयार बैठी थी लेकिन ये मामला सामने आने पर फिलहाल ऐसा लगता है कि अगस्ता के भूत से बचने के लिए कांग्रेस को ही किसी राजनैतिक पैराशूट की जरूरत है।
दरअसल, सरा विवाद इटली की एक कंपनी से अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर की खरीद को लेकर है। इस कंपनी पर इटली में भ्रष्टाचार का मुकदमा चला जिसके दौरान इस प्रकार के सबूत सामने आए जिनसे पता चलता है कि इस सौदे को पक्का करने के लिए भारत के तत्कालीन वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल एसपी त्यागी और उनके रिश्तेदारों के अलावा कई राजनीतिक नेताओं को भी रिश्वत दी गई थी। लेकिन निचली अदालत ने इस मुकदमे को खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय ने उसके फैसले को उलट दिया। कुछ दस्तावेजों में सोनिया गांधी का नाम भी है। हालांकि भारत में घूस की रकम किसे दी गई, ये अभी तक साफ नहीं हुआ है। लेकिन बीजेपी को कांग्रेस पर हमला करने का बहाना मिल गया है। इस समय पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। जाहिर है कि बीजेपी की कोशिश कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा उछाल कर चुनावी लाभ उठाने की है। लेकिन कांग्रेस का कहना है कि मनमोहन सिंह सरकार ने यह मामला सामने आते ही सबसे पहले इस सौदे को रद्द किया गया था और फिर इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया। इसके विपरीत नरेंद्र मोदी सरकार ने इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट से हटा दिया है। अब सवाल ये है कि यदि यह कंपनी भारतीय सेनाधिकारियों और राजनीतिज्ञों को रिश्वत देने की दोषी है, तो फिर उसे ब्लैकलिस्ट से बाहर करने का क्या आधार है?
दरअसल सच्चाई यह है कि विमानों, हेलीकॉप्टरों, हथियारों और अन्य रक्षा उपकरणों की खरीद के हमाम में सभी नंगे हैं। दुनिया भर में इन सौदों में कमीशन दिया और लिया जाता है। हालांकि मोदी सरकार ने रक्षा सौदों को पारदर्शी बनाने के लिए अनेक कदम उठाए है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। रक्षा सौदों को पारदर्शी बनाने के साथ ही यह भी जरूरी है कि उन्हें अंतिम रूप देने में आवश्यकता से अधिक देरी ना हो, क्योंकि ज्यादातर मामलों में यही सामने आता है। इससे देश के प्रति रक्षा तंत्र को मजबूत बनाने के लक्ष्य में बाधा उत्पन्न होती है।
बहरहाल, हो जो भी लेकिन केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय जल्द ही सच्चाई का पता लगाए, ना कि इटली की अदालती कार्यवाही के बहाने केवल इसका राजनीतिक लाभ उठाए और दूसरे मामलों की तरह यह मामला भी केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रह जाए, ना ही इसका हश्र बोफोर्स जैसा होना हो।
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Friday, 15 April 2016

हर दल की ‘दलित’ दौड़ !





समय के हिसाब से सियासत बदलती है और उस सियासत हिसाब से नायक भी बदलते है। ऐसा लगता है जैसे आज दलितों के मसीहा माने जाने वाले बाबासाहेब अंबेडकर सभी पार्टियों के लिए जरूरत बन गए है। अंबेडकर के प्रति पिछले कुछ सालों से अचानक ही हर दल का प्यार उमड़ पड़ा है। अब अंबेडकर पर सिर्फ मायावती या बीएसपी का ही हक नहीं रहा, बीजेपी का भी है, कांग्रेस का भी है और यहां तक कि अब समाजवादी पर्टी भी इसमें पिछे नहीं है। याद कीजिए पिछले साल अंबेडकर की जयंती, जब कांग्रेस ने उनके जन्म स्थान मऊ से इसे साल भर मनाने की शुरुआत की जिसका समापन 11 अप्रैल 2016 को नागपुर में किया, तो वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मऊ में बाबासाहेब के 125वीं जयंती की शुरुआत की और अब बीजेपी साल भर अंबेडकर की जयंती मनाएगी। यानी आज कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियां अंबेडकर की विरासत पर अपना हक जमाने में जुटी हैं जिनका अंबेडकर और उनके विचारों से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं रहा।
अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच दलितों के उत्थान के प्रश्न पर दोनों में कितने मतभेद थे ये किसी से छिपे नहीं है। जहां गांधी एक आस्थावान हिंदू थे, तो वहीं अंबेडकर जाति व्यवस्था के नाश के लिए प्रतिबद्ध थे और उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ ही दिन पहले अपने हजारों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। ऐसा व्यक्ति किसी हिंदुत्ववादी पार्टी का आदर्श पुरुष हो सकता है, यह बात भी गले से नहीं उतरती। लेकिन इस समय बीजेपी यह दिखाने में लगी है कि अंबेडकर की विरासत और जीवन मूल्यों के प्रति उससे अधिक कोई और गंभीर नहीं है। इस बेचैनी के पीछे अंबेडकर के प्रति प्रेम या उनकी विचारधारा के प्रति निष्ठा नहीं, बल्कि शुद्ध चुनावी गणित है।
दरअसल, साल 2017 के शुरुआत में ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां अंबेडकरवाद की प्रबल प्रचारक मायावती की बहुजन समाज पार्टी अन्य सभी पार्टियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। भले ही अपने आचरण से मायावती अंबेडकर के सिद्धांतों पर चलती नजर ना आती हों, लेकिन उनके विरोधी भी यह मानते हैं कि बसपा के संस्थापक और मायावती के राजनीतिक गुरु कांशीराम और मायावती के प्रयासों के फलस्वरूप दलितों में एक नया आत्मविश्वास और उत्साह जगा है। अब वह अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रहा है। कांग्रेस को मायावती से यह खतरा है कि वह उसके दलित वोटों को अपनी ओर खींच कर ना ले जाएं।
दरअसल, पिछले तीन दशकों में कांग्रेस का दलित वोट मायावती की ओर और मुस्लिम वोट मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी की ओर खिंचा है जिसके कारण कभी उत्तर प्रदेश पर राज करने वाली कांग्रेस अब वहां तीसरे-चौथे नंबर की पार्टी बन कर रह गई है। उधर दिल्ली और बिहार में करारी हार के बाद बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव जीवन-मरण का सवाल है। उसकी कोशिश है कि दलित उसे अपना हमदर्द समझें। इसीलिए वह अंबेडकर के हिन्दू धर्म और जातिप्रथा संबंधी आलोचनात्मक विचारों को नजरंदाज करके उन्हें अपने प्रेरणास्रोतों में शामिल करती हुई दिखना चाहती है।
आज राहुल गांधी देश में कही भी किसी जवान की मौत हो वहां दिखें या ना दिखें पर किसी दलित की मौत पर आपको घड़ियाली आसू बहाते जरूर दिख जाएंगे। लेकिन राहुल शायद इस सच से दूर है कि कांग्रेस के दस साल की सत्ता के दौर में दलितों पर उत्पीड़न के करीब तीन लाख से ज्यादा मामले दर्ज हुए। तो वहीं दूसरी तरफ पीएम मोदी भी इस सच से दूर है कि उनके सत्ता में आने के बाद सिर्फ 2014-2015 में 50 हजार से भी ज्यादा दलितों पर उत्पीड़न के मामले देश भर में दर्ज किए गए। आज भी दलितों की सामाजिक स्थिति बेहद भयावह है। आज भी गांवों से ऐसी खबरें आती हैं कि घोड़ी पर चढ़कर बारात निकालने पर दलितों की हत्या कर दी गई, तो कही पर वोट ना देने पर दलित के बस्ती में आग लगा दी जाती है। दलित महिलाओं के साथ बलात्कार भी दलितों के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। तो क्या ऐसे में सिर्फ जय भीम का नारा लगाने भर से देश में हाशिये पर पड़े दलित कभी मुख्य धारा में शामिल हो पाएंगे और क्या ऐसे में समाजिक बदलाव को लेकर कभी अंबेडकर का सपना पूरा हो पाएगा ?
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