Follow by Email

Followers

Monday, 21 March 2016

उत्तराखंडः मुख्यमंत्री बदलने की प्रयोगशाला




उत्तराखंड इन दिनों चर्चा में है। घोड़े की टांग टूटने से गरमाई सियासत अब सियासी घोड़ों के कारोबार तक आ पहुंची है। हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में एक कैबिनेट मंत्री समेत कुल 9 विधायकों की बगावत ने सूबे को जबरदस्त राजनैतिक अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। सरकार के भविष्य को लेकर अटकलें तेज हैं, तो राजनैतिक हलकों में इस बात का भी आकलन चल रहा है कि 28 मार्च के बाद सूबे का सियासी परिदृश्य क्या होगा। हरीश रावत सरकार बचा पाते हैं या नहीं ये तो 28 मार्च के बाद ही पता चलेगा। लेकिन एक बात तो तय है कि ये छोटा सा पहाड़ी राज्य उत्तराखंड मुख्यमंत्री बदलने की प्रयोगशाला बनता जा रहा है। यहां सत्ता की राजनीति में मुख्यमंत्री ऐसे बदले जाते हैं जैसे क्रिकेट के मैच में गेंद। राज्य ने सिर्फ 15 साल के अपने जीवन काल में आठ मुख्यमंत्री देखे हैं।
नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड देश के 27 वें राज्य के रूप में वजूद में आया, तभी से यहां राजनैतिक अस्थिरता ने इसमें घर कर लिया। राज्य गठन के वक्त उत्तराखंड के अंतर्गत आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद के कुल 30 विधयकों को लेकर अंतरिम विधानसभा का गठन किया गया। बीजेपी आलाकमान ने नित्यानंद स्वामी को पहली और अंतरिम सरकार की कमान सौंपने का फरमान सुनाया तो अधिकांश विधायक इस फैसले को पचा नहीं पाए। नतीजतन मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही स्वामी का विरोध होने लगा। लेकिन बीजेपी आलाकमान के सख्त रुख के कारण प्रदेश बीजेपी नेता तब तो खामोश हो गए। मगर अंदर ही अंदर विरोध की चिंगारी सुलगती रही और करीब ग्यारह महीने बाद ही स्वामी को कुर्सी छोड़नी पड़ी। जिसके बाद भगत सिंह कोश्यारी को स्वामी के जगह मुख्यमंत्री बनाया गया, जो राज्य के पहले विधानसभा चुनाव तक चंद महीने के लिए इस पद पर रहे। यानी, सवा साल की अंतरिम सरकार में ही बीजेपी ने दो मुख्यमंत्री दे दिए। पहले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इस अंतर्कलह का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। राज्य निर्माण के श्रेय पर काबिज होने के बावजूद जनता ने उसे नकार कर सत्ता से बेदखल कर दिया।
फिर साल 2002 में कांग्रेस सत्ता में आई तो आलाकमान ने किसी निर्वाचित विधायक की बजाए नैनीताल के बुजुर्ग सांसद नारायण दत्त तिवारी को सरकार की कमान सौंप दी। तिवारी को मुख्यमंत्री बनाए जाने का फैसला कई दिग्गजों को रास नहीं आया। उस वक्त मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे और उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव भी लड़ा गया था। इस लिहाज से उनकी नाराजगी समझी लाजिमी भी थी। यह रोष पूरे पांच साल तक चला। हालांकि तिवारी तजुर्बेकार और कद्दावर राजनेता होने के कारण इस अंतर्कलह से पार पाने में कामयाब रहे और वो उत्तराखंड के पंद्रह साल के इतिहास में अकेले ऐसे मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।
इस अंतर्कलह के वजह से साल 2007 के विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी को मतदाताओं ने सबक सिखाया और बीजेपी को बहुमत देकर सरकार बनाने का मौका दिया। बीजेपी आलाकमान ने भी कांग्रेस की कहानी को आगे बढ़ाते हुए तत्कालीन पौड़ी गढ़वाल सांसद भुवन चंद्र खंडूड़ी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी। इस फैसले को बीजेपी में खंडूड़ी के विरोधी गुट पचा नहीं पाए। सवा दो साल गुजरते-गुजरते खंडूड़ी को सत्ता से रुखसत होना पड़ा और उनके उत्तराधिकारी बने डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक। लेकिन निशंक की राह भी आसान नहीं रही और उन्हें भी करीब सवा दो साल के कार्यकाल के बाद मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा और सिर्फ 6 महीने के लिए खंडूड़ी फिर से मुख्यमंत्री बने।
साल 2012 के विधानसभा चुनाव में देवभूमि ने फिर बीजेपी को नकार जनमत कांग्रेस के पक्ष में दे दिया। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने इस बार भी किसी निर्वाचित विधायक की बजाए तत्कालीन टिहरी सांसद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया। अब अंतर्कलह और इससे उपजी सियासी अस्थिरता तो उत्तराखंड के साथ पनौती की तरह जुड़ी है, लिहाजा बहुगुणा को भी महज पौने दो साल में ही कांग्रेस नेतृत्व ने मुख्यमंत्री पद से हटाकर हरिद्वार के सांसद और तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत को सरकार का मुखिया बनाकर उत्तराखंड भेज दिया। उस वक्त कांग्रस के वरिष्ठ नेता डॉ. हरक सिंह रावत भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जाते थे। हरीश रावत ने इसी फरवरी में बतौर मुख्यमंत्री अपने दो साल पूरे किए हैं और इत्तेफाक देखिए अब उनकी भी कश्ती सियासी अस्थिरता के भंवर में फंसी हुई है।
दरअसल, बार-बार मुख्यमंत्री बदलने का ही खामियाजा है कि सत्ताधारी कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों में इस समय कम से कम तीन सक्रिय खेमे हैं जो लगातार एक दूसरे के लिए गड्ढ़ा खोदते रहते हैं। कांग्रेस में हरीश रावत, इंदिरा ह्रदयेश और विजय बहुगुणा हैं तो बीजेपी में रमेश पोखरियाल निशंक, भुवन चंद्र खंडूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी हैं।
इस राजनीतिक अस्थिरता का उत्तराखंड के विकास पर कितना प्रतिकूल असर पड़ रहा है, ये एक अध्ययन का विषय है। लेकिन एक बात तो तय है कि सत्ता की राजनीति और सियासी अस्थिरता से राज्य का कभी भला नहीं हो सकता है।
आप हम से ट्विटर या फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
https://www.facebook.com/sonu.kumar.75436
https://twitter.com/jhazone

Sunday, 13 March 2016

भाग माल्या भाग....!




देश की कई एजेंसियां माल्या को तलाश रही हैं, पर माल्या को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। सरकार, पुलिस, सीबीआइ, गुप्तचर एजेंसियां सब की सब देखती रह गईं। लेकिन दो-चार दिन बीत जाने के बाद पता चला कि माल्या तो माल लेकर पिछले दरवाजे से फुर्र हो गए। अब उनके भागने पर देश में चारों तरफ हल्ला मचा है। ऐसा पहली बार थोड़ी ना हुआ है। क्वात्रोची भी कभी ऐसे ही भागा था, भोपाल गैस कांड के मुख्य आरोपी एंडरसन भी भागा था और हाल फिलहाल में ललित मोदी भी तो भागे हैं। भागने और भगाने का तो हमेशा हमारे देश में फैशन रहा है। लेकिन माल्या और मोदी के भागने के बाद ये और ज्यादा फैशनेवल हो गया है, क्योंकि ये दोनों बड़े ही फैशन प्रेमी रहे हैं। हालांकि माल्या साहब कहते है कि वो भगोड़ा नहीं है पर वो सारे बैंकों का नींद उड़ाकर... बैठे कहां हैं, ये नहीं बता रहें हैं।
दरअसल हमारे देश में करीब 90 हजार किसान ऐसे है जिन्होंने सरकारी बैंको से कर्ज लिए हैं और इन सारे किसानों के कर्ज की राशि माल्या साहब के एक फीसदी के बराबर भी नहीं है। लेकिन इसे वसूलने के लिए किसानों से मारपीट तक की जाती है और किसानों के गाय, बकरी और भैंस तक उठा लिए जाते हैं। अभी कुछ दिन पहले की ही घटना है तमिलनाडु के एक शहर में गरीबी का मारा एक किसान को पुलिस ने सिर्फ इसलिए जमकर सबके सामने पीटा क्योंकि वो सिर्फ 3.5 लाख रुपए का पूरा कर्ज नहीं चुका पा रहा था, वो भी कर्ज न चुकाने की बात नहीं कर रहा था, बल्कि फसल की बर्बादी के कारण सिर्फ 2 किस्ते नहीं भर पा रहा था, जिसको लेकर बैंक ने उसका ट्रेक्टर छीन लिया औऱ जमकर धुनाई भी की। अब सवाल है कि देश एक, कानून एक और गुनाह एक, लेकिन एक व्यापारी और एक किसान दोनों पर अलग-अलग बर्ताव क्यों? क्या उसकी गलती सिर्फ ये है की वो माल्या के तरह रसूखदार नहीं है। 
नौ हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा लिखने में कितने शून्य आते हैं, यह देश के सामान्य आदमी को समझने में कुछ वक्त लग जाता है। लेकिन इतनी बड़ी धनराशि को डूबते हुए सारी बैंक और सरकार देखती रही लेकिन माल्या शौक पूरे करने लंदन की फ्लाइट लपक कर निकल लिए पर फिर भी सरकार कार्रवाई करने की वजह विपक्ष को ये बताने में लगी है कि आपने भी तो क्वात्रोची को भगाया। यानी अब हिसाब बराबर हो गया।
दरअसल विजय माल्या जैसे स्वघोषित रसूखदारों को बढ़ावा देने वाले राजनेता आज चाहे एक दूसरे पर जितने भी आरोप-प्रत्यारोप लगाएं पर एक बात तो तय है कि विजय माल्या और उन जैसे कारोबारी द्वारा सरकारी पैसा हड़पने के रणनीतिक कारोबार में कहीं ना कहीं राजनीतिक संरक्षण अवश्य ही मिलता रहा है। उसी का तो नतीजा है कि लोन का पैसा ना चुकाने के बावजूद देश के विभिन्न बैंकों द्वारा माल्या पर पैसे की बरसात की जाती रही और माल्या द्वारा उस पैसों से अपने तथाकथित व्यवसायों और अन्य गैरजरूरी गतिविधियों का संचालन धड़ल्ले से किया जाता रहा। माल्या को संरक्षण देने के मामले में चाहे पूर्ववर्ती सरकार की भूमिका पर विचार किया जाए या फिर उसके विदेश भागने में मौजूदा सरकार की भूमिका पर उठ रहे सवालों पर गौर करें। एक बात तो जरूर है कि सत्ता में कुछ ऐसे दलालनुमा लोगों की पैठ है जो किसी भी काले कारोबारी को सिर आंखों पर बिठाने के लिए हर समय मुस्तैद रहते हैं और शायद इसलिए इतना सब होने के बाद भी माल्या के तेवर बरकरार हैं।
कर्ज लेकर घी पीनेवाले माल्या अब विदेश में बैठ कर नेता-पत्रकार खेल रहे हैं। मीडिया में उनके खिलाफ आई खबरों और संसद में मामला उठने के बाद माल्या ने धमकी दी है कि वह उन सबका खुलासा करेंगे जो उनकी कंपनी का मुफ्त में सेवाएं ली है। यानी अब वो भी ललित मोदी की तरह रोज नए ट्वीट कर मीडिया के लिए ब्रेकिंग देते रहेंगे। यानी अब जब तक कोई दूसरा माल्या (खबर देने वाला) मीडिया को नहीं मील जाता, तब तक ऐसे ही हर चैनलों पर माल्या कथा सुनते रहिए, लेकिन यकीन मानिए जैसे सरकारें क्वात्रोची, एंडरसन और ललित मोदी का कुछ नहीं बिगाड़ पाई, वैसे इस सबसे माल्या साहब का भी कुछ बिगड़ने वाला नहीं हैं,  जब तक इस देश में क्रोनी कैपिटलिज्म है।
आप हम से ट्विटर या फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
https://www.facebook.com/sonu.kumar.75436
https://twitter.com/jhazone

Saturday, 5 March 2016

राजनीति का सबसे बुरा दौर




देश की राजनीति पिछले कुछ सालों से अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। इससे पहले शायद ही आपने राजनीति का ऐसा दौर देखा हो। हो सकता है आपने देखें भी हो लेकिन मैंने तो कभी नहीं देखा। हालांकि आप कहेंगे मैंने अभी राजनीति को देखा ही कितना है, लेकिन जितना भी देखा है एक बात तो तय है कि एक राजनेता का बेटा होने के नाते मैंने राजनीति को बचपन से बहुत करीब से देखा, जाना, समझा और परखा भी है।
दरअसल राजनीति में हमेशा से विरोधी को नीचा दिखाने और खुदको उपर दिखाने की परंपरा रही है और उसके बिना राजनीति शायद संभव भी नहीं है। लेकिन हमेशा ये एक दायरा और मर्यादा में होता रहा है। पर पिछले कुछ सालों में जिस तरह से केवल दूसरों को नीचा दिखाने की परंपरा चल पड़ी है उससे आम जन के हितों का मुद्दा तो गायब ही होता जा रहा है। सारी ताकतें सिर्फ इस पर झोक दी जाती है कि कौन देशभक्त है तो कौन देशद्रोही, कौन दलितों, अल्पसंख्यकों का हितैषी है तो कौन दुश्मन.... हर किसी का सिर्फ एक ही मकसद रह गया है किसी तरह से येन केन प्रकारेण सत्ता को हथियाना और अगर सत्ता उसके पास है तो उसे बरकरार रखना।
मैंने देखा है कि आतंकी हमलों के बाद हर मौके पर देश एक जुट होता रहा है,  चाहे दिखावे के लिए ही सही एकजुटता सब तरफ दिखाई देती थी, चाहे वो राजनीतिक दल हो या फिर समाज के विभिन्न अंग। लेकिन आज आतंकियों के सवाल पर देश कुछ इस तरह से बट गया या यूं कहें कि बांट दिया गया, जहां सत्ता राष्ट्रभक्ति का राग अलापते हुए विपक्ष को देशद्रोह कहने से नहीं चूक रही, तो दूसरी ओर विपक्ष सत्ता पर देश भक्ति का खौफ पैदा कर अपनी असफलता छुपाने का आरोप लगा रही है।
इस सबके बीच संसद में या तो चर्चा ही नहीं होती या होती भी है तो सिर्फ इस में समय निकाल दिया जाता है कि रोहित दलित था या नहीं, कन्हैया देशद्रोही है या नहीं, इशरत आतंकी थी या नहीं। क्या इन सब सवालों को सुलझाने के लिए देश की जनता उन्हें वहां तक पहुंचाती है। मैं ये नहीं कहता कि इन मुद्दों पर चर्चा ना हो, इन सभी मुद्दों पर भी चर्चा हो लेकिन सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए ना हो। क्योंकि इन मुद्दों से आम जन का भला होने वाला नहीं हैं। इशरत केस को अगर दबाया गया तो पहले उसकी जांच हो फिर जो सामने निकल कर आए उसपर बहस होनी चाहिए। कन्हैया को जिस तरह से सरकार और विपक्ष ने मिलकर हीरो बना दिया बिना कुछ साबित हुए, क्या वो सही है? क्या अगर वो जांच में देशद्रोही निकला तो विपक्ष देश की जनता से माफी मांगेगी और जनता उसे माफ करेंगी या अगर ये साबित हुआ कि कन्हैया ने देश के विरोध में नारे नहीं लगाए तो क्या सरकार उससे माफी मागेंगी?
याद कीजिए साल 2001, तब भी केंद्र में बीजेपी की ही सरकार थी, और तब गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी थे, आज भी बीजेपी की ही सरकार है, और आज गृह मंत्री राजनाथ सिंह है। तब भी 6 छात्रों पर राजद्रोह के आरोप लगे थे, इस बार करीब 10 छात्र पर देशद्रोह का केस हैं। तब ये छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी के थे, इस बार जेएनयू के हैं। लेकिन उस वक्त और इस वक्त की कहानी अलग है। उस वक्त अफगानिस्तान में अमेरिकी अतिक्रमण से भन्नाए 6 छात्रों पर इस लिए देशद्रोह का आरोप लगाया गया क्योंकि उन्होंने अमेरिका के खिलाफ पर्चें बांटे थे और अमेरिका के साथ देने के लिए भी भारतीय नीति पर सवाल उठाये थे। लेकिन उस वक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी के वीसी तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी से मिले और महज 15 मिनट के अंदर आडवाणी ने दिल्ली पुलिस से छात्रों पर से देशद्रोह का आरोप हटाने को कह दिया। लेकिन इस बार ऐसा बवाल खड़ा किया गया कि इससे पूरे विश्व भर में हमारे देश के छवि को नुकसान पहुंचा और देशद्रोह के आरोप झेल रहे कन्हैया को पक्ष और विपक्ष ने मिलकर कृष्ण बना दिया।
दरअसल आज सत्ता की चाह ने इन राजनेताओं को इस कदर अंधा बना दिया है कि वो इसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। मेरे पापा हमेशा कहा करते थे कि जब आदमी को किसी चीज की बहुत ज्यादा चाह होती है तो वो बहुत घटिया बन जाता है और वो हर हाल में अपने चाहत को पूरा करना चाहता है, चाहे उसके लिए उसे किसी भी हद तक क्यों ना जाना पड़े। आज ऐसा ही कुछ लग रहा है।   
आप हम से ट्विटर या फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
https://www.facebook.com/sonu.kumar.75436
https://twitter.com/jhazone

Wednesday, 2 March 2016

जेटली की ‘पोटली’



कश्ती चलाने वालों ने जब हार कर दी पतवार हमें, लहर-लहर, तूफान मिलें, दिखा देंगे सबको कि इन हालात में भी आता है दरिया करना पार हमें।इसी शेरो-शायरी के साथ जब जेटली ने अपनी पोटली खोली, तो उम्मीद की जा रही थी कि आर्थिक मंदी के इस दौर में वो जीडीपी और आर्थिक सुधार के लिए कुछ बड़े कदम उठाएंगे। लेकिन इस बजट में पहली बार ग्रामीण जीवन और किसानों के बारे में कुछ सोचा गया। यनी पिछले कुछ समय से जो मोदी सरकार की किसान विरोधी और सूट-बूट की सरकार वाली छवि बनती जा रही थी, उससे निकलने की पूरी कोशिश इस बजट में दिखी। आने वाले समय में देश के चार राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने हैं, इसलिए प्रधानमंत्री मोदी लगातार अपनी रैलियों से लेकर मन की बातमें किसानों की बात करते रहे हैं। जिसका असर इस बार के बजट में भी दिखा।
दरअसल प्रधानमंत्री मोदी आम आदमी और किसानों में फिर से विश्वास जगाना चाहते हैं इसलिए इस बजट में परंपरागत कृषि विकास योजनाओं पर ध्यान दिया गया। जिस मनरेगा को सरकार और खुद मोदी जी 'कांग्रेस की साठ साल की विफलता का दस्तावेज' बताते रहे हैं, उसका भी बजट बढ़ाकर 34 हजार से 38 हजार 500 करोड़ रुपया कर दिया गया। हालांकि इस बढ़त को नगण्य ही माना जाएगा। वहीं फसल बीमा योजना के लिए 5500 करोड़ रूपये दिए गए, तो कर्ज से लगातार मरते किसानों को ऋण देने के लिए 15,000 करोड़ और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए 19,000 करोड़। साथ ही जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए भी प्रावधान किए गए हैं। इसके तहत 5 लाख एकड़ जमीन में जैविक खेती की जाएगी। दालों की पैदावार बढ़ाने के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। इसके अलावा बीपीएल परिवारों को एलपीजी कनेक्शन देने के लिए 2 हजार करोड़ की व्यवस्था है। वहीं साल 2018 तक सभी गांवों को बिजली से रोशन करने का भी वादा किया गया है। कुल मिलाकर 87,761 करोड़ रुपए का बजट ग्रामीण विकास के लिए दिया गया।
हालांकि किसानों की असली जरूरत पानी, खाद और बीज की है। इसके लिए उसे हर साल समय पर पैसे की जरूरत पड़ती है। उसके बाद उसे अपनी मेहनत से उपजाई फसल के वाजिब दाम की उम्मीद होती है। लेकिन उसे इस बजट में इन उम्मीदों के पूरे होने का प्रबंध नहीं दिख रहा है। किसानों को 2022 तक आमदनी दोगुनी होने के सपने तो दिखाए गए हैं, लेकिन कैसे...? उसके उपाय नहीं बताए गए। यानी साफ है कि अच्छे दिनों की उम्मीदों को अब एक और कार्यकाल के लिए आगे टिकाकर रखा गया है। किसानों को हाल के हाल कुछ मिलता नहीं दिखता। उसे यह आश्वासन जरूर दिया गया हैं कि उसकी अच्छी हालत अब से पांच साल बाद, यानी 2022 में आने वाली है।
वहीं जेटली की पोटली में इस बार पिछले बजटों का खास अक्स नहीं दिखा। स्मार्ट सिटी, इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर, बंदरगाहों के निर्माण, नमामि गंगे, डिजिटल इंडिया, निर्भया फंड, महंगाई फंड, स्वच्छ भारत अभियान जैसी बातों को लगभग भुला दिया गया है, जिन्हें अब तक नई सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं की तरह पेश किया जा रहा था। सरकार कारोबारी सहूलियत का माहौलबनाने के अपने वादे को भी लगभग भूल सी गई है।
खैर, इसमें कोई शक नहीं कि देश की माली हालत उतनी अच्छी नहीं थी कि उद्योग-व्यापार जगत को छप्पर फाड़कर कुछ दिया जा सके। जिसका जिक्र जेटली जी बजट के शुरूआत में ही शायरी के जरिए यूपीए सरकार पर हमला बोलते हुए किया। इस बजट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस बार बहुत ज्यादा तो नहीं, लेकिन थोड़ा बहुत गरीबों, किसानों और गांवों के तरफ ध्यान दिया गया है। इसपर अगर अमल किया जाए तो आने वाले दिनों में सरकार और देश दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
आप हम से ट्विटर या फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें