Follow by Email

Followers

Friday, 19 February 2016

‘द्रोह’काल में भारत





पिछले कुछ महीनों से देश को दो धड़े में बाटने की कोशिश की जा रही है। एक तरफ देशद्रोह तो दूसरी तरफ देशप्रेम यनि आप सरकार से सहमत हैं तो आप देशप्रेमी हुए और अगर आप असहमत हैं तो आप देशद्रोही करार दिए जाएंगे। चाहे आप किसी पार्टी के नेता हो, अभिनेता हो या पत्रकार या फिर आम इंसान अगर आप सरकार से सहमत नहीं हैं तो आप देशद्रोही हैं। आप देश की तरक्की नहीं चाहते, आप देश का विकास नहीं चाहते। क्योंकि अंध भक्ति की इस दौर में खुद को देश भक्त कहने वाले समझते हैं कि इस देश का भला सिर्फ एक आदमी यानि वन मैन आर्मीही कर सकता हैं। पिछले 60 सालों में तो देश ने कोई तरक्की किया ही नहीं, सारी तरक्की तो इन दो सालों में ही हुआ है। मैं यहां जेएनयू की बात नहीं कर रहा हूं। क्योंकि वहां जो हुआ उसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता इसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं इसे अभिव्यक्ति की बर्बादी कहते है।
आप वैचारिक विरोध कीजिए। आपको सरकार के गलत कार्यों का विरोध करने का संवैधानिक हक है। लेकिन आप एकदम से राष्ट्र के विखंडन का नारा लगाएंगे, ये कभी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मोदी विरोध के नाम पर आप राष्ट्र के हितों को भी दांव पर लगा देंगे इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे आप कोई भी हों। विरोध करिए ना भ्रष्टाचार का, सरकार के गलत कामों का, लोग भी साथ देंगे, लेकिन आप अपनी मानसिक परेशानी को देश पर क्यों थोपना चाहते हैं। हालांकि जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने वाले चंद लोग ही थे और वो जेएनयू के थे भी या नहीं इसपर भी संदेह है, लेकिन अब इसे इस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है मानो पूरा का पूरा जेएनयू ही राष्ट्र विरोधी हो। यहां तक कि इसे बंद करने की बात तक की जा रही है।
लोग अब जेएनयू के छात्रों को शक की निगाहों से देख रहे हैं। मेरा एक जेएनयू का दोस्त जिससे मेरी कल ही बात हुई। उसने बताया कि मकान मालिक ने रूम खाली करने को कहा है अगर तुम्हारे नजर में कोई रूम हो तो बताना। क्योंकि जेएनयू के आस-पास कही भी रूम नहीं मिल रहा और  कमोबेश यही हालत आज हर जेएनयू छात्रों का हो गया है। जिस संस्थान का नाम भर लेने से माथा गर्व से ऊंचा हो जाता था, आज उसी संसथान का नाम तक लेने से लोग हिचकते है। वहां जिसने भी भारत विरोधी नारे लगाए वो आज भी सरकार और प्रशासन के पकड़ से दूर है, लेकिन इस नाकामयाबी को छिपाने के लिए इसे देशद्रोह बनाम देशभक्त का मुद्दा बना दिया गया। पक्ष-विपक्ष इसपर जमकर राजनीतिक रोटियां शेक रहे हैं। एक देशभक्ति का नारा लगा रहे है तो दूसरा अभिव्यक्ति की आजादी का। ऐसा लग रहा है जैसे इस देश में अब इसके अलावा बहस करने को और कोई मुद्दा बचा ही ना हो। शेयर बाजार और रुपया यूपीए काल में जहां से चला, आज फिर से वहीं पर है। किसानों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। लेकिन फिर भी विपक्ष को बहस करने का मुद्दा नहीं मिल रहा। कन्हैया दोषी है या नहीं इसपर कानून को बहस करने दें। इसे वेबजह तूल देकर देश को बाटने की कोशिश ना करें। टीआरपी की होड़ में मीडिया भी आम जन से जुड़े मुद्दों पर बहस नहीं करना चाहती। बस उसे उसी मुद्दों पर बहस करना है जिससे बीना किसी मेहनत के टीआरपी मिल जाए। जम्मू-कश्मीर में तो रोज ही देश विरोधी नारे लगते है तब कहां होती है हमारी सरकार, विपक्ष और मीडिया। जो नारे जेएनयू में लगा उसे पीडीपी के कार्यकर्ता अक्सर घाटी में लगाते रहे है। लेकिन ये जानते हुए भी क्यों बीजेपी उसी पीडीपी के साथ सरकार बनाने की जद्दोजहद कर रही है। जेएनयू में भी ये पहला मौका नहीं है जब देश विरोधी नारे लगे हो। लेकिन इस बार इतना बवाल क्यों मचा है। इस बवाल से होता तो कुछ नहीं है उलटे देश को बाटने और लड़ाने वाले तत्वों को और बल मिलता है। भारत हमेशा से एक शांतिप्रिय देश रहा है, ये सब देख कर भारत के विशाल समुदाय दुखी हैं कि आखिर ये हो क्या रहा है ?

आप हम से ट्विटर या फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें




Wednesday, 17 February 2016

पापा का ‘ड्रीम हाउस’




आज का दिन मेरे लिए काफी खास था... आज एक तरफ खुशी का दिन भी था और दूख का दिन भी.... दरअसल आज पापा का दिया हुआ अंतिम नीशानी यानि पापा का ड्रीम हाउस में मेरी मां, बड़े भईया-भाभी और उनके बच्चों ने इस ड्रीम हाउस में अपना पहला कदम रखा... हलांकि ये ड्रीम हाउसअभी पूरी तरह से तैयार नहीं हो सका है ये अभी अंडर कंस्ट्रक्शन में है.... लेकिन फिर भी अच्छे दिन मिल जाने के कारण जल्दबाजी में इसमें गृह प्रवेश कर लिया गया.... क्योंकि इसके बाद दूर-दूर तक कोई अच्छा दिन नहीं मिल रहा था.... तो इसी बात की खुशी है कि आखिरकार आज मेरा पूरा परिवार नए आशियाने में चला गया और दूख इस बात की है कि इस मौके पर आज इस ड्रीम हाउस को बनाने वाले मेरे पापा नहीं हैं.... काश ! आज वो होते तो ये खुशी लाखों गुणा ज्यादा होता.... और गृह प्रवेश की तैयारी महीनों पहले से चल रही होती पर होनी को कौन टाल सकता है.... आज पापा जहां भी होंगे वहीं से देख कर खुश हो रहे होंगे.... आखिर उन्होंने हम सब के लिए ही तो बनाया था.... पापा आप जैसा चाहते थे बिलकुल वैसा ही ये ड्रीम हाउस बनेगा.... ये हम दोनों भाईयों का वादा है आप से.... लेकिन कही ना कही कसक तो मन में होगा ही कि काश आप होते....!


शायद आप नहीं है इस लिए इतने बड़े खुशी के पल में भी गम जैसा ही माहौल है.... किसी के चेहरे पे हंसी नहीं है.... और ना ही नए आशियाने में जाने का कोई उत्साह.... ऐसा लग रहा है मानो जैसे किसी दूसरे के घर में हम चुपके से जा रहे हो।



खैर देखिए ना मैं भी कितना बदनसीब हूं कि मैं खुद भी इस खास मौके पर नहीं पहुंच सका.... जिस कारण से मेरी मां मुझसे काफी नाराज होगी.... लेकिन क्या करें इतने जल्दबाजी में सारा प्रोग्राम बना की चाह कर भी ना जा सके... भैया ने कई बार बोला भी तुम भी नहीं आओगे तो अभी छोड़ ही देते है.... लेकिन मैने कहा नहीं अब आप ही मेरे लिए और उस घर के लिए सब कुछ हैं, आप वहां हैं तो समझिए सब हैं।