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Saturday, 23 January 2016

9 जनवरी की वो काली रात



ज़िंदगी में कुछ पल ऐसे आते हैं जो आपको भीतर से तोड़ देता हैं.... पापा का जाना भी ऐसा ही पल था.... आज पापा की दूसरी  बरसी है.... आज उनको इस दुनिया से गए दो साल से हो गए है... लेकिन ऐसा लगता है, जैसे ये कल ही की तो बात है.... कल तक तो वो हम लोगों के बीच ही थे.... ये दो साल किस तरह से हमने काटे ये सिर्फ आप ही समझ सकते हैं पापा.... कभी ये सोचा ना था कि आप इतने जल्दी हम सब को छोड़ कर चले जाएंगे.... पिछले दो साल में कितना कुछ बदल गया ना पापा.... ना जाने हम कहाँ से कहाँ आ गए.... 9 जनवरी की वो काली रात जब एक ही झटके में मेरा पूरा परिवार बिखड़ चूका था.... टूट चूका था.... हम कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें..... कैसे पापा फिर से बोल पाएंगे.... मैं डॉक्टर को पागलों की तरह गाली दें रहा था पर डॉक्टर सिर्फ सॉरी बोल, सर झुका कर निकल गया.... कई लोगों ने समझाया भी कि जिसके पापा बचपन में ही छोड़ कर चले जाते हैं वो कैसे रहते होंगे.... तुम लोग तो फिर भी इतने बड़े हो गए हो कि अपना बुरा-भला खुद सोच सकते हो.... पर इससे पिता के जाने का दर्द तो कम नहीं होता ना पापा.... बल्कि इस उम्र में पिता का साथ होना और भी जरूरी हो जाता है.... क्योंकि इस उम्र में ज़िदगी के कई अहम फैसले लेने होते जिसमें पिता की भूमिका काफी अहम हो जाती है.... लेकिन शायद उपर वाले को ये मंजूर ना था।
पापा आपके जाने के बाद मेरी हर रातें अधूरी सी.... टूटी सी लगती है.... उस दिन के बाद से हम लोग हंसना तो जैसे भूल ही गए हैं.... आपकी हंसी हम सब बहुत मिस करते हैं पापा.... आपकी एक हंसी से हमलोग सारे दूख-दर्द भूल जाते थे.... आप मुश्किल हालात में भी हमेशा मुस्कुराते रहते थे... कभी हमलोग आप के पास कुछ शिकायते भी ले कर जाते तो आप बस मुस्कुरा देते थे.... और फिर हम शिकायते भुल जाते थे।
पापा अब किसी भी पर्व-त्यौहार को मनाने का मन नहीं होता.... हर मौके पर आपकी याद आती है और हम लोग रो के अपना दिल हलका कर लेते हैं.... मैं हमेशा छुप के रोता हूं ताकि मां ना देख ले, नहीं तो वो भी फिर से रोने लगेंगी.... और मां भी हमेशा छुप के रोती हैं ताकि हम लोग कही ना देख ले, नहीं तो हम भी रो परेंगे.... पापा भैया का तो और भी हाल बुरा हैं.... अब सारी जिम्मेदारी उन्हीं पर तो हैं.... वो तो खुल कर रो भी नहीं सकते हैं ना.... उन्हें अब हम सब के लिए मजबूत होना होगा.... वो बिलकुल अकेले पर गए हैं।
पापा आप हमेशा कहा करते थे ना कि ज़िंदगी किसी की भी हो, पूरी तरह से उसकी अपनी नहीं होती.... जिंदगी के कई हिस्से होते हैं और वो अलग-अलग लोगों के लिए होते हैं.... जैसे मेरे जिंदगी का कुछ हिस्सा तुम्हारे मां के लिए, कुछ हिस्सा तुम सब भाई-बहनों के लिए और कुछ हिस्सा दूसरों के लिए हैं.... वैसे ही तुम्हारे जिंदगी में भी है कुछ हिस्सा मेरे लिए, कुछ मां के लिए, कुछ तुम्हारे दोस्तों के लिए और जैसे-जैसे तुम अपने लाईफ में आगे बढ़ते जाओगे वैसे-वैसे तुम्हारे जिंदगी के हिस्से भी बटते जाएंगे। तो क्या पापा आप के जिंदगी का बस इतना सा ही हिस्सा हम सब के लिए था..... मुझे पता है कि अब आप कभी लौट कर नहीं आओगे लेकिन हमे फिर भी आपका हमेशा इंतजार रहता हैं।
अपने जाने के बाद आप बहुत सारी जिम्मेदारियां छोड़कर गए हैं पापा.... पता नहीं उनमें से मैं कितना कर पाऊंगा या कर पाऊंगा भी या नहीं.... लेकिन कोशिश करूंगा जरूर, आप ही के तरह कभी हार नहीं मानूंगा.... बस आप जहां भी हैं वहीं से अपना आशीर्वाद देते रहना और कोई गलती करने पर रोकना पापा.... आपको तो पता ही हैं मैं गलती बहुत करता हूं।
पापा आप कहते थे कि बेटा हर इंसान को इस तरह से अपना व्यवहार रखना चाहिए कि अगर कोई तुम्हारे बारे में बुरा भी कहे, तो कोई भी उस पर विश्वास न करें.... मैं भी आपकी तरह बनने की कोशिश करूंगा पापा.... और यही आपको मेरे तरफ से सच्ची श्रद्धांजलि होगी.... मैं जानता हूं कि आपकी तरह बन नहीं पाऊंगा फिर भी कोशिश जरूर करूंगा.... आप मां की चिंता मत करना उसे मैं हमेशा खुश रखुंगा ये मेरा आपसे वादा हैं पापा... दूसरी जिम्मेदारी मैं निभा पाऊं या नहीं पर ये जिम्मेदारी जरूर निभाऊंगा.... ताकि जब उपर आ के आप से मिलूं तो आपसे नजरें मिला के कह सकूं कि देखिए मैंने सब संभाल लिया.... बस आपको भी इस सबके लिए एक वादा करना होगा कि आप हर जन्म में मेरे ही पापा बनना.... शुक्रिया पापा इतनी अच्छी जिंदगी देने के लिए आपका ये कर्ज कभी नहीं चुका पाऊंगा...............................आपका सोनू...................................शुक्रिया!
       आंखों के परदे नम हो गए है, बातों के सिलसिले कम हो गए हैं!!
        पता नहीं गलती किसकी हैं, वक्त बुरा है या बुरे हम हो गए हैं!!
--------------------स्व. श्री चंद्रकांत झा जी को श्रद्धांजलि--------------------



Friday, 8 January 2016

नीतीश की असली चुनौती



बिहार विधानसभा चुनाव में एक गीत अक्सर सुनने को मिलता था फिर से एक बार हो बिहार में बहार हो’, अब बिहार में बहार का मतलब आम जनता से था या फिर अपराधियों के बहार से ये बताना मुश्किल है। लेकिन चुनाव परिणाम के ठीक दो महीने बाद से ही जिस तरह से बिहार में अपराध का ग्राफ ऊपर चढ़ा है उससे तो मौजूदा व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगना लाजमी है। लगातार हो रहे अपराध से तो यही कहा जाएगा कि राज्य में आज हत्या, लूट, अपहरण का उद्योग फिर से फलने-फूलने लगा है और यहां अपराधियों का बहार हो चला है। हाल में दरभंगा में दो इंजीनियरों की हत्या का मामला हो या वैशाली में इंजीनियर सुजीत झा का मर्डर या फिर इस साल के शुरूआत में ही राजधानी के बुद्धा कॉलोनी इलाके में एक शिक्षक की गोली मारकर हत्या हो। ये सभी घटनाएं नब्बे के दशक की कथित जंगलराज की याद दिलाती है। चुनाव के दौरान विपक्ष ने भी यही मुद्दा बनाया कि नीतीश-लालू की जीत से जंगलराज की वापसी होगी। लेकिन बिहार की जनता ने बीजेपी के इस मुद्दे को नकार दिया और जीत नीतीश-लालू को दी थी, जिसमें लालू की कामयाबी नीतीश से बेहतर थी।
दरअसल, लालू-राबड़ी के राज में अपहरण और फिरौती का ग्राफ बहुत चढ़ गया था, रंगदारी ने एक संगठित धंधेका रूप ले लिया था। जिसके बाद से ही लालू राज को जंगल राज कहा जाने लगा। अब जब दस साल बाद एक बार फिर लालू की सत्ता में वापसी हुई है तो ये सवाल उठने लगा है कि क्या बिहार में जंगलराज की वापसी हो रही है? हालांकि अभी महागठबंधन की सरकार को चंद दिन ही हुए हैं, और ऐसा कोई निष्कर्ष निकालना फिलहाल जल्दबाजी होगी। लेकिन मौजूदा हालात बहुत चिंताजनक हैं और इससे नीतीश कुमार की छवि पर दाग तो लगा ही है। अगर वे सुशासन के अपने वादे पर लोगों के भरोसे को कमजोर होने देना नहीं चाहते, तो उन्हें कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर विशेष ध्यान देना होगा। अधिकारियों को बराबर यह अहसास रहे कि अपराधों पर सख्ती से काबू पाना राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। हालांकि दरभंगा में दो इंजीनियरों की हत्या के बाद मुख्यमंत्री ने राज्य के गृह मंत्रालय के कामकाज की समीक्षा की, और नए आपराधिक उभार पर आला पुलिस अफसरों को फटकार लगाई। पर सवाल यह है कि इसका असर जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा है? रंगदारी और फिरौती के लिए अपहरण और हत्या ऐसे अपराध नहीं हैं जो फौरी उत्तेजना में हो जाते हों। ऐसे अपराधों के पीछे संगठित गिरोह होते हैं और कइयों के तार राजनीति तथा प्रशासन के भ्रष्ट तत्वों से जुड़े रहते है। इसलिए हैरत की बात नहीं कि जहां राजनीति का अपराधीकरण या अपराध का राजनीतिकरण अधिक हुआ है, वहां ऐसी घटनाएं ज्यादा होती हैं।
अब सबसे अहम सवाल ये है कि क्या नीतीश बिहार को इससे उबार सकते हैं? नीतीश कुमार में ये क्षमता है और वो पिछले दस सालों में इस उम्मीद पर खरे भी उतरें हैं। तभी बिहार की जनता ने उनपर एक बार फिर भरोसा जताया है। हालांकि उन दस सालों में करीब 8 साल बीजेपी भी सत्ता में रही लेकिन अब हालात जुद़ा है। नीतीश के कभी धुड़ विरोधी रहे और अपने शासन काल में जंगलराज से मशहूर रहे लालू यादव अब उनके साथ सत्ता में हैं तो ऐसे में नीतीश कुमार को जल्द से जल्द बिहार की कानून व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी। क्योंकि बिहार की तस्वीर बदलने के लिए बिहार को आर्थिक स्तर पर और मजबूत करने की आवश्यकता है, जिसके लिए बिहार में निवेशकों की जरूरत है। लेकिन अगर सड़कें बनवा रहे इंजीनियर मारे जाने लगें तो नीतीश सरकार वहां कितने निवेशकों को खींचने में कामयाब रहेगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। खासकर तब, जब सरकार बनने से पहले ही जंगलराज वापसी की आशंका जतायी जाती रही हो। ऐसे मे तो नीतीश के सामने चुनौतियों का पहाड़ सा नजर आ रहा है। लेकिन नीतीश को समझना होगा कि इतिहास उसी महापुरुष को याद करता है जो चुनौतियों को पार करना जानते हो।

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