Follow by Email

Followers

Tuesday, 29 December 2015

पाकिस्तान को लव-लेटर नहीं, लव की ज़रूरत!



पाकिस्तान को लव-लेटर लिखने की ज़रूरत नहीं है। ये तो यूपीए सरकार करा करती थी। एनडीए सरकार तो कुछ अलग करेगी ना। लिहाजा अब पाकिस्तान से लव करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री मोदी की पाकिस्तान की सरप्राइज विजिट तो यही संकेत देती है। हालांकि प्रधानमंत्री ने एक साहसिक कदम उठाया। मैं तहेदिल से इसका स्वागत करता हूं। मैरा भी यही मानना है कि बात करने से ही बात बनेगी। यह मैं यूपीए सरकार के समय भी कहता था और अब भी। लेकिन यूपीए के समय जब भी ऐसे कदम की मैं सराहना करता था। मेरे कुछ दोस्त मुझे कांग्रेसी कहकर चिढ़ाते थे। आज उन्हीं दोस्तों को अचानक इस सरप्राइज विजिट के बाद पाकिस्तान से प्यार हो गया। यूपीए सरकार गए अभी दो साल भी नहीं हुए हैं। आतंकवाद के खिलाफ और उस बहाने पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाए रखने के लिए तब विपक्ष में रही बीजेपी के रुख को इतनी जल्दी भुलाया नहीं जा सकता। सीमा पर होने वाली शहादत को लेकर राजनीतिक रूप से बीजेपी भाषाई उन्माद फैलाने में लगी थी। सुषमा ने एक सर के बदले दस सर का बयान दिया था। लेकिन अब कोई शहीदों के घर जाकर भावुकता का उन्माद नहीं फैलाता।
जरा सोचकर देखें कि अगर मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से बातचीत का ऐसा रुख दिखाया होता तो बीजेपी का क्या रवैया होता?  इस काल्पनिक स्थिति को यह कहते हुए भी खारिज नहीं किया जा सकता कि तब स्थितियां अलग थीं। क्योंकि पाकिस्तान की तरफ से हाल फिलहाल में ऐसा कोई भी संकेत नहीं आया है कि हालात बदले हैं। बीजेपी के खुद के सहयोगी दल शिवसेना ने भी ये सवाल उठाया कि यदि कोई कांग्रेस का प्रधानमंत्री इसी तरह करता को क्या बीजेपी ऐसे ही उनका स्वागत करती।
खैर मनमोहन सिंह में यह साहस नहीं था। वे बीजेपी के हमलों के आगे झुक गए। मनमोहन सिंह ने दस साल तक पाकिस्तान ना जाकर इसे साफ कर दिया कि वो डरपोक पीएम हैं। लेकिन अब देश को 56 इंच की छाती वाले पीएम मिले हैं तो इस तरह के सरप्राइज मिलते रहेंगे। मोदी सत्ता संभालने के बाद से ही ऐसे सरप्राइज देते रहे हैं। पहले पड़ोसी देशों के राजनेताओं को शपथग्रहण समारोह के लिए बुलाकर, फिर काठमांडू में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से नजरें फेरकर, विदेश सचिवों की बातचीत को रोककर और फिर पेरिस में अचानक नवाज शरीफ से मुलाकात कर। अब देखना दिलचस्प होगा कि मोदी के इस सरप्राइज गिफ्ट के बाद हमे रिटर्न गिफ्ट में क्या मिलता है? 

बहरहाल मोदी के इस सरप्राइज को देखकर कई प्यार करने वाले युवाओं को सीख मिली होगी कि आखिर सरप्राइज होता क्या है और देते कैसे है? मुझे भी इस सरप्राइज को देख अपने प्यार की याद आ गई। मैंने भी सालों पहले अपने प्रेमिका को ऐसा ही सरप्राइज दिया था। जब परीक्षा के सिलसिले में दिल्ली से पटना गया था और वहां से अचानक एक रात अपनी प्रेमिका से फोन पर बात हुई और मैं उससे मिलने अचानक घर पहुंच गया था। तब मेरी प्रेमिका से लेकर घर वाले तक भौंचक रह गए थे। ठीक इसी तरह जिस तरह मोदी के पाक दौरे ने लोगों को भौंचक कर दिया। 

आप हम से ट्विटर या फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

https://www.facebook.com/sonu.kumar.75436


https://twitter.com/jhazone

Wednesday, 16 December 2015

16 दिसंबर की वो काली रात....


यू तो 16 दिसंबर हम विजय दिवस के रूप में मनाते है। क्योंकि आज ही के दिन भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए थे। लेकिन भारतीय इतिहास के पन्नों में शूरवीरों की गाथाओं के साथ ही 16 दिसंबर, 2012 का वह काला पन्ना भी दर्ज हो गया, जिसने पुरुषसत्ता और सामंती मानसिकता के कीचड़ में डूबे भारतीय समाज को झकझोर कर रख दिया था। इसे एक दुर्घटना कहना शायद गलत होगा, क्योंकि यह अमानवीयता की वह पराकाष्ठा थी, जिसने न्याय प्रणाली को भी हिलाकर कर रख दिया। 16 दिसंबर की वो काली रात कोई नहीं भूला होगा और शायद भूल भी नहीं पाएगा। इसी दिन छह दरिंदों ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए चलती बस में 23 साल की दामिनी को अपनी हवस का शिकार बनाया था। इतना ही नहीं इन बेरहम दरिंदों ने दामिनी के शरीर में लोहे की रॉड़ डाल दी बाद में नग्न अवस्था में दामिनी और उसके पुरूष दोस्त को चलती बस से फेंक दिया था। उसके बाद इलाज के दौरान दामिनी की मौत हो गई थी। घटना के बाद पूरे देश में रोष की लहर फैल गई थी। दामिनी की मौत के बाद दिल्ली समेत देशभर की सड़कों पर आक्रोश उमड़ा था।
मानवता के चिथड़े-चिथड़े उधेड़ने वाली इस घटना ने एक ही रात में सत्ता के रसूकदारों को सख्त कानून बनाने और महिला सुरक्षा के मुद्दे को गंभीरता से लेने पर मजबूर कर दिया। हर बार की तरह देश की इस बहादुर बेटी के बलिदान को लेकर खूब राजनीति भी हुई, युवाओं ने नारे बुलंद किए, लाठियां खाईं, कड़ाके की ठंड में जलतोप की बौछारों से भीगे, चौराहों पर उसकी याद में लाखों मोमबत्तियाँ जलाई गई। देश के कई शहरों में भी प्रदर्शन हुए और निर्भया के सर्मथन में लोखों हाथ उठे। लेकिन क्या आपको लगता है निर्भया के इंसाफ की जंग अब पूरी हो चुकी है? क्या देश या फिर दिल्ली पहले से ज्यादा महफूज हो गई है? सच्चाई तो ये है कि आज भी दिल्ली में हर रात किसी न किसी युवती की आबरू को नीलाम किया जाता है। लेकिन ना तो सरकार ने कोई कदम उठाए है और ना ही हम वैसा आक्रोश दिखा पाए। इस तीन सालों में सिर्फ दिल्ली में ही निर्भया जैसी कई घटना हो चुकी है पर ना तो सरकार जागी, ना ही हम। हाल ही में दिल्ली में एक मासूम बच्ची को स्कूल जाते समय अगवाह किया गया। जबरन गाड़ी में ठूसकर उसे कुछ वहशी दरिंदो ने हवस का शिकार बनाया। कुछ दिन पहले ही मैंने आपको अपने ब्लॉग और फेसबुक के जरिए बताया था कि कैसे नोएडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन जैसे भीड़-भाड़ वाले इलाके में दिन-दहाड़े कुछ ऑटो वाले एक लड़की के साथ बदसलूकी कर रहे थे। लेकिन वहां करीब सौ से ज्यादा लोग मौजूद थे पर किसी को कोई मतलब नहीं था। सब देख कर भी अनदेखा बन रहे थे। यहां तक कि वहां सुरक्षा के लिए मौजूद गार्ड ने भी अनदेखा कर दिया। फिर मैंने जब आवाज उठाई तो वो माफी मांगने लगे।
दरअसल, सरकार ही नहीं आज हम भी मतलवी हो गए हैं। अपने आखों के सामने होते घटनाओं को भी देख कर अनदेखा कर देते हैं। अगर हम इन छोटी-मोटी घटनाओं को अनदेखा ना करें तो यकीन मानिए फिर किसी निर्भया के लिए हमे मोमबत्तियाँ जलाने की जरूरत नहीं पड़ेंगी।

आप हम से ट्विटर या फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

Wednesday, 9 December 2015

राहत की आड़ में राजनीति


एक तरफ जहां चेन्नई पिछले कई दिनों से लगातार हो रही बारिश की वजह से बाढ़ जैसे हालातों से जूझ रहा है। वहीं कुछ नेता इस प्राकृतिक आपदा को भी अपनी राजनीति चमकाने के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। आप सोच में पड़ जाएंगे कि राजनैuDSतिक दल और उनके नुमाइंदे खुद को चमकाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। सत्‍तारूढ़ एआईडीएमके समर्थकों ने प्रलय से जूझ रहे लोगों के बीच अपना चेहरा चमकाने के लिए अपनी मुखिया और राज्‍य की मुख्‍यमंत्री जयललिता को बाहुबली बना दिया है। चेन्नई की सड़कों पर ऐसे पोस्टर लगाए गए हैं जिनमें मुख्यमंत्री जयललिता को बाहुबली की राजमाता शिवागामी के रुप में दिखाया गया है जो एक बच्चे को उफनती नदी में एक हाथ से उठाई हुई है। पोस्टर में नीचे लिखा है, ‘’इस आपदा की घड़ी में अम्मा लोगों की जान बचा रही हैं। जयललिता के पोस्‍टर को लेकर सोशल मीडिया पर खासा आलोचना की जा रही है। इतना ही नहीं पीड़ितों को पहुंचाई जा रही राहत सामग्री पर मुख्यमंत्री जयललिता के फोटो के पोस्टर चिपकाए जा रहे हैं। भले ही राहत सामग्री पहुंचाने में देर हो जाए, पर अम्मा का फोटो लगाना अनिवार्य है।
दरअसल शासन करने की नीति को राजनीति कहतें हैं या तरीके से राज्य के शासन को सुचारू रूप से संचालित करने को राजनीति कहा जाता है। इसे राजनीति की संक्षिप्त परिभाषा तो कह सकतें हैं लेकिन वास्तव में राजनीति एक ऐसा व्यापक शब्द है जिसकी परिधि में शासन करने की नीति या प्रक्रिया के अलावा मानवीय संवेदनाओं का तत्व भी आता है हालांकि आज राजनीति के बदलते आयाम के दौर में राजनेता राजनीति को सिर्फ लोकतंत्र की लड़ाई ही मान बैठें हैं जिसका एक मात्र उद्देश्य सत्ता को हथियाना होता है जिसमें उनके निजी सरोकार सर्वोपरि होते हैं। मगर वास्तव में राजनीति हर वो चीज़ है जिससे सभी सामाजिक सरोकार जुड़े रहतें हैं लेकिन अब राजनेताओं द्वारा केवल सत्ता की राजनीति की जा रही है जहाँ सामाजिक सरोकार जैसे शब्द गौण होते जा रहें हैं। इसकी एक बानगी भर है चेन्नई, जहाँ आपदा से जूझते बच्चे-बूढे, स्त्री-पुरुष की मदद की आड़ में ओछी राजनीति की जा रही है। काश! राजनेता और उनके सिपहसलार मानवता की भावना को समझ पाते। 

सोनू कुमार झा से ट्विटर या फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

Tuesday, 8 December 2015

'बंटी दादा' के जज्बे को सलाम.....


कहते है सपने उन्हीं के पूरे होते, जिनके सपनों में जान होती है.....
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसले से उड़ान होती है......

जी हां, ऐसा ही कुछ कर दिखाया हैं जौनपुर उत्तर प्रदेश के अक्षांश गुप्ता, जो शरीर से 95 फीसदी विकलांग होने के बाद भी ना केवल अपने काबलियत के बल पर जेएनयू में दाखिला पाया, बल्कि जेएनयू के रिसर्च स्कॉलर में अपनी कड़ी मेहनत और लगन से पीएचडी कर दुनिया के सामने कायमाबी की मिसाल पेश की और ये सावित कर दिखाया कि मेहनत, लगन और काबलियत हो तो विकलांगता भी आपकी सफलता में बाधा नहीं बन सकती। 

अक्षांश ने कम्प्यूटर साइंस से बी-टैक और एम-टैक किया पीएचडी का विषय भी कम्प्यूटर से ही जुड़ा पर काफी अनोखा चुना था। हमलोग हमेशा सोचते हैं कि कैसे कम्प्यूटर से हम और अधिक स्मार्ट बने। पर उन्होंने ये सोचा कि किस तरह से कम्प्यूटर को ही और स्मार्ट बनाया जाए। ताकि कम्प्यूटर के दिमाग को इंसानी सोच के साथ और भी बेहतर बनाया जा सके। अक्षांश की उपलब्धि के वजह से ना केवल उनके परिजन, दोस्त बल्कि जेएनयू के वाइस चांसलर भी गौरवान्वित हैं। इसलिए अक्षांश के लिए विशेष तौर पर दिक्षांत समारोह का आयोजन कर उसे डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। जबकी जेएनयू में दिक्षांत समारोह नहीं होता है।
वैसे तो डॉक्टर की डिग्री में उनका नाम अक्षांश गुप्ता लिखा है, लेकिन कैंपस में सब लोग उन्हें 'बंटी दादा' के नाम से जानते हैं। बंटी दादा के शरीर के निचले हिस्से बेकार है, वो ठीक से बोल नहीं पाते हैं। उनकी बोली समझने में भी परेशानी होती है, यहां तक कि हाथ भी सही तरीके से काम नहीं करते हैं। शरीर की लाचारी को मात देने वाले बंटी दादा कहते हैं कि अपने भाई-बहनों को स्कूल जाते देख उनकी भी पढ़ने की इच्छा होती थी, लेकिन शरीरिक विकलांग होने के चलते कोई स्कूल एडमिशन नहीं देता था। हमारे देश में शरीरिक रूप से अक्षम लोगों को कमजोर समझा जाता है। इसके बाद भी उन्होंने स्कूल की पढ़ाई पूरी की और कामयाबी की मंजिल को छूकर अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' लगवाया और दुनिया के सामने कायमाबी की मिसाल पेश की। 32 साल के बंटी दादा ने जेएनयू के कैंपस में बनी होस्टल में रहकर 5 साल तक कड़ी मेहनत की। उन्होंने 'ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस' विषय पर थीसिस तैयार की। रिर्चस पूरी करने के लिए वह मलेशिया भी गए। होस्टल के एक छोटे से कमरे में रहते हुए उन्होंने कभी शारीरिक अक्षमता को पढ़ाई में आड़े नहीं आने दिया।
उनके दोस्त बताते हैं कि बंटी दादा का असाधारण दिमाग है। बंटी दादा सिर्फ अपने बारे में ही नहीं सोचते, बल्कि अपने जैसे ही दूसरे छात्रों के बेहतरी के लिए भी सोचते हैं। इसलिए यूजीसी के नेट, जेआरएफ परीक्षा में विकलांग छात्रों के क्वालिफाइंग मार्क्स को SC/ST के बराबर करवाया। जबकि इसके पहले तक वो ज्यादा था। इतना ही नहीं 2012 के स्टूडेंट प्रेसिडेंट के चुनाव में छात्रों का प्रतिनिधि बन उनकी तरह के छात्रों के बेहतरी की तरफ सबका ध्यान खिंचा, तो वहीं दूसरी तरफ 2012 में ही एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस ऑन एजुकेशन में जेएनयू के तरफ से मलेशिया में प्रतिनिधित्व भी किया और कई अवार्ड जीते।

ये सच है कि काबलियत, हूनर खुद ही अपनी सफलता की राह तलाश लेती है और अक्षांश ने भी ऐसा ही किया है। पर सोचने वाली बात है कि क्या अक्षांश जैसे होनहार सभी छात्र इस मुकाम तक पहुंच पाते होंगे? क्या वो अपने सपनों को पुरा कर पाते होंगे? शायद नहीं क्योंकि इनके जैसे छात्र को ये जरूरी नहीं कि हर जगह शिक्षा के अवसर मिल ही जाए। सरकार और समाज ने इनके जैसे छात्रों के लिए कुछ विशेष स्कूल जरूर बनाए हैं। पर जरूरत है इन्हें इस तरह के स्कूल के साथ सामान अवसर भी मिले और शुरूआती शिक्षा के स्तर में भी सुधार हो। खैर बंटी दादा के जज्बे को देख कर ये बात कही-ना-कही सही लगती है खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है...?