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Saturday, 29 August 2015

कह देना "छेनू" आया था!


कल मैं ABP News पर प्रेस कॉन्फ्रेंस देख रहा था बिहारी बाबू यानि शत्रुघ्न सिन्हा जी गेस्ट थे.... बड़े ही बेबाकी से जवाब दे रहे थे.... जब लास्ट में उन्हें एक डायलॉग बोलने को कहा गया.... उन्होंने अपना फेमस डायलॉग "छेनू" वाला बोला.... लेकिन जब वो डायलॉग बोल रहे थे तो मेरे आखों के सामने एक दृश्य चल रहा था..... वो कुछ इस तरह था!
अमित शाह और अरुण जेटली जी बैठे थे....
शत्रुघ्न सिन्हा वहां पहुँचते हैं और पूछते हैं कि मोदी कहां हैं ?
अमित शाह, मोटा भाई तो अभी नहीं हैं.... वो बिहार के लिए जुमला बनवाने गए हैं....
शत्रुघ्न सिन्हा, आए तो कह देना कि छेनू आया था.... और नीतीशवा को अच्छा सीएम बताया था....
अमित शाह कुछ बोलने की कोशिश कर ही रहे थे कि सिन्हा जी बोल पड़े "खामोश" !!!

Saturday, 15 August 2015

फेसबुकिया देशभक्त

मैं सोच रहा था कि अगर आज हमारा देश गुलाम होता तो शायद फेसबुक और ट्विटर पर ही देशभक्ति देख कर अँगरेज़ भाग गए होते....दरअसल सभी फेसबुकिया देशभक्त को लगता हैं जबतक हम फेसबुक या ट्विटर पर 'गर्व से कहो हम हिंदुस्तानी हैं' का नारा नहीं लगते तबतक हम सच्चे देशभक्त नहीं कहलाते.....आज़ादी की शुभकामना तक तो ठीक हैं पर वो सन्देश भी देने लगते हैं.....जिन्हें ठीक से 10 स्वतंत्रता सेनानी का नाम भी पता न हो वो भी हमे देशभक्ति सीखने लगते हैं.....आरे भाई गर्व से फेसबुक या ट्विटर पर हिंदुस्तानी कह देने से तस्वीर नहीं बदलती.....एक हिंदुस्तानी को अपने हिंदुस्तानी होने का गर्व दिल में  होना चाहिए.....जोकि शायद हर हिंदुस्तानी में हैं.....और जिनमें  नहीं हैं वो देश छोड़ कर जा रहे हैं.....देश छोड़ने से याद आया कि बीते 10 सालों में आपने देश से करीब साठ हजार अरबपति देश छोड़कर चले गए और विदेशों में जा बसे.....उन्हें अब ये देश गरीब लगता हैं.....आरे भाई  इसी देश ने तो तुम्हें इस लायक बनाया कि तुम अब विदेश में भी जके आराम से रह सको.....खैर इन नालायकों को कौन समझाए.....जो लायक बन जाने के बाद आपने माता-पिता को भी छोड़ देते हैं और जो आपने माता-पिता को छोड़ सकते हैं उनसे आप उम्मीद ही क्या रख सकते!

Friday, 14 August 2015

'अन्नदाता' की अनदेखी


हैं सरसों उगाता वो....खाने में खुद प्याज और सुखी रोटी खता!
काश कोई खुशहाली उसके घर भी लाता.....वो किसान जो हर रोज हल चलता!
देश के विकास में किसान और जवान की भूमिका को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया था.... जिसका लोहा पूरे विश्व ने माना था.... आज वहीं किसान हाशिए पर है.... आजादी के 68 साल बीतने के बाद भी किसी ने किसानों की सुध नहीं ली.... इतने सालों में कई सरकारें बदली, मंत्री बदले, पर नहीं बदले तो किसान के हालात.... राजनेता संसद के अंदर और बाहर एक-दूसरे पर किसानों की अनदेखी का आरोप लगा रहे, लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के हाथ खून से सने हैं.... किसानों की आत्महत्या कोई ताजा मामला नहीं है....  भारत में विकास दर और जीडीपी के आकड़े यू तो देखने में बड़े अच्छे लगते है... लेकिन सच्चाई ये है कि एक तरफ जहां हर आधे घंटे में भारत की जीडीपी में अरबों रूपए जुड़ जाते है.... तो वहीं दूसरी तरफ हर आधे घंटे में एक किसान खुदकुशी कर लेता हैं.... यनि हर रोज करीब 50 किसान खुदकुशी करता है.... जिसका सीधा असर उन 50 परिवारों पर परता है जो उनसे जुड़े है.... किसानों के लिए खेती धीरे-धीरे जुआ साबित हो रहा है....National Crime Records Bureau के आकड़े बताते है कि पिछले 20 सालों में  296,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.... अगर सिर्फ इस साल की बात करें तो इस सल भी अब तक 1400 से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं.... एक तरफ देश के अन्नदाता परेशान है... लेकिन हमारी सरकार मदद करने के जगह उसके जख्मों पर नमक छिड़कती है... हाल ही में देश के कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने संसद में बयान दिया कि अधिकतर किसानों के मौत का कारण प्रेम-प्रसंग, दहेज और नपुंसकता रहा है.... यानि देश के किसानों कि हालत कैसे सुधरे ये सोचने के बजह सारी सरकारें इस पर सिर्फ राजनीति करते दिखती हैं... वहीं भूमि अधिग्रहण कानून से किसका हित सधेगा ये सबको पता है.... एक तरह से इस कानून के तहत सरकार की योजना किसानों से जबरन जमीन ले के उद्योगपति को देने की है.... सरकार का मानना है कि बिना जमीन के विकास कैसे हो सकता है.... ऐसे में नए परियोजनाओं पर ब्रेक लग जाएगा.... लेकिन सच्चाई कुछ और ही है... खुद वित्त मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि केवल आठ फीसदी परियोजना ही जमीन की वजह से लंबित है.... हलांकि किसानों और विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बाद सरकार ने इस बिल को वापस ले लिया.... लेकिन एक बात तो साफ है कि सारी सरकारें सिर्फ अपना हित साधना चाहती है.... हर कोई सिर्फ किसानों को राजनीतिक रंग देना चाहता है.... किसी को किसानों की हालात सुधारने की मंशा नहीं दिखती.... अगर अपको किसान के जिंदगी से जुड़ी सच्चाई को गहराई से जानना हो तो एक बार मदर इंडिया फिल्म जरूर देखिए.... इस फिल्म में किसानों की बदहाल और दर्दनाक तस्वीर देख कर आपकी आंखें भर आएंगी.... फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक किसान साहूकार के हाथों कर्ज के बोझ से दबता चला जाता है और उसकी खुद की जिंदगी ही नहीं बल्कि पूरा परिवार तबाह तो जाता है... आज की तारीख में किसानों की हालात उसी फिल्म के सिनेमाई किरदारों की तरह हो गई है.... खैर सवाल उठता है कि किसानों की हालात आखिर सुधरेगी कैसे.... कैसे किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर निकल पाएगा.... मेरा मानना है कि किसान चैनल या कम ब्याज पर ऋण की सुविधाएं बढ़ाने मात्र से किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सकते.... सच्चाई ये है कि किसानों को कर्ज नहीं, आमदनी चाहिए.... लगातार कम होती आमदनी किसानों की सबसे बेड़ी समस्या हैं.... साल 2014 की एनएसएसओ रिपोर्ट के मुताबिक खेती से एक किसान को हर महीने केवल 3,078 रुपए की आमदनी होती है.... जो कि आज के लिए पर्याप्त नहीं है.... इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं होनी चाहिए कि देश के 58 फीसदी किसान भूखे पेट सोने को मजबूर हैं.... जिस कारण 76 फीसदी किसान रोजगार का विकल्प मिलने पर खेती छोड़ने को तैयार हैं.... काफी अध्ययन के बाद पता चला कि साल 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपए प्रति क्विंटल था.... आज यह 1450 रुपए प्रति क्विंटल है यानि बीते 45 सालों में इसमें करीब 19 गुणा वृद्धि हुई है.... इससे किसानों की बढ़ी आमदनी की तुलना दूसरे तबकों के वेतन में हुए इजाफे से करें तो.... इन सालों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तनख्वाह 110 से 120 गुणा, स्कूल शिक्षकों की 280 से 320 गुणा और कॉलेज शिक्षकों की 150 से 170 गुणा बढ़ी है.... कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वालों की आमदनी 350 से 1000 गुणा तक बढ़ गई है.... वहीं केंद्रीय कर्मचारियों को जल्दी ही अब सातवें वेतन आयोग के रूप वेतन और भत्ते मिलेंगे.... इसमें सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी का वेतन भी 26 हजार रुपए महीने करने की मांग हो रही है.... ऐसे में सिर्फ किसान ही क्यों अपने हक से बंचित है.... क्या किसानों का हक नहीं हैं कि उनके पास भी स्मार्ट फोन, लेपटॉप और गाड़ी हो.... बिडम्वना है कि हमारे देश में अगर किसी किसान के पास ये सब सुबिधा हो तो उसे किसान नहीं मानते.... हम किसान का मतलब सिर्फ एक गरीब किसान ही क्यों समझते हैं... इन 45 सालों में अगर आप सबसे कम वेतन वृद्धि के आधार पर भी देखें तो किसानों के गेहूं के मूल्य में कम से कम 100 गुणा इजाफा होना चाहिए.... इसका मतलब यह कि प्रति क्विंटल गेहूं के लिए किसान को 7,600 रुपए मिलने चाहिए, लेकिन अभी उसे केवल 1450 रुपए मिल रहा है.... हम मानें या नहीं मानें,लेकिन यह उसका हक है.... हम सालों से किसानों को बेहतर कमाई से वंचित करते रहे हैं.... और खाद्यान्न महंगाई के लिए किसानों को दंडित किया गया.... लेकिन अब वक्त आ गया है कि इनके बारे में भी सोचा जाए.... हलांकि मैं यह नहीं चाहता कि खाद्यान्न की कीमतें आसमान छूने लगें.... लेकिन मेरा मानना है कि सारा बोझ गरीब किसानों के ऊपर डालने की बजाय उसे फसलों की ज्यादा कीमत मिलना चाहिए.... फिर कृषि उत्पादों को सब्सिडी के दायरे में ले आएं जिससे आम उपभोक्ताओं को भी ज्यादा कीमत न देनी पड़े.... आखिर कई अमीर देशों में ऐसा ही होता है.... खेती से होने वाली आमदनी में इजाफा नहीं हुआ तो किसानों के लिए कोई उम्मीद नहीं हो सकती.... उत्पादकता बढ़ाने या सिंचाई के साधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की सलाह देने से खास फायदा नहीं होगा.... क्योंकि ये सब तो सिर्फ नई तकनीकों को बेचने के तरीके हैं.... इसके अलावा मेरा मानना है कि उद्योगों को मिलने वाली मदद राशि का यदि एक हिस्सा भी किसानों को दिया जाए तो उनके आर्थिक सपने साकार हो सकते हैं.... पिछले 10 सालों में उद्योगपतियों को 42 लाख करोड़ रुपये की कर छूट दी गई.... 2015 के बजट में 5.90 लाख करोड़ कर राहत दी गई, फिर भी औद्योगिक उत्पादन नहीं बढ़ सका और पर्याप्त रोजगार सृजन में यह क्षेत्र विफल रहा.... अगर इस में से सिर्फ 2 लाख करोड़ रुपये हर साल कृषि को दिया जाए और उसका सार्थक उपयोग हो तो न केवल लाखों की संख्या में रोजगार सृजन होगा, बल्कि देश के हर क्षेत्र में विकास हो सकेगा.... आखिर भारत में आर्थिक विकास का रास्ता देश के 60 करोड़ किसानों और 6.4 लाख गांवों से होकर ही गुजरता है.... पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी अपने किताब में देश को विकसीत बनने के लिए जिन पांच चीजों का जिक्र किया है उसमें कृषि ही सबसे उपर है... इसलिए बिना कृषि के कभी मेक इन इंडिया का सपना पूरा नहीं हो सकता.... करीब तीन दशकों से भारत का ग्रामीण समाज ढह रहा है.... लेकिन हमे डीजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी के सपने दिखाए जा रहे है.... बहरहाल नई सरकार से किसानों को काफी उम्मीदें है.... आखिर कई दशक बाद देश में पूर्ण बहुमत की सरकार आई है.... और अपने चुनाव अभियान में मोदी ने कृषि को आर्थिक रूप से उपयोगी बनाने का वादा भी किया था.... कुल लागत पर 50 फीसद का मुनाफा किसानों को दिलाने की बात कही थी.... देश में जहां कहीं भी गए भयावह कृषि संकटग्रस्तता की बात की थी.... उन्होंने गन्ना किसानों की बात की, कपास किसानों की बात की.... बार-बार कृषि समृद्धता की बात की.... अब वहीं किसान पूछ रहे हैं क्या हुआ मोदी के उन वादों का.... कहीं ये भी चुनावी जुमले तो नहीं थे.... ये सही समय है जब किसानों के हितों में कदम उठाना होगा.... अगर सरकार सच में देश को विकसित देखना चाहती है तो सबसे पहले उसे किसानों को खुश करना होगा.... तभी वास्तव में सबका साथ, सबका विकास हो पाएगा।

Tuesday, 4 August 2015

राजनीति में संवादहीनता

वक्त बदला, सरकार बदली, विपक्ष बदला, पर नहीं बदला तो संसद का चेहरा.... जी हां... वहीं रोज के हो हल्ले, रोज के हंगामे और संसद की कार्यवाही ठप्प.... फर्क सिर्फ इतना है कि जब यूपीए की सरकार थी तब बीजेपी के सांसद, संसद नहीं चलने देते थे.... अब जब एनडीए की सरकार है तो इस काम का जिम्मा कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों ने उठा लिया है.... दरअसल पांच साल की सरकार में राजनीति ऐसे ही चला करती है... बीच में कोई पिसता है तो वो है जनता.... पर जनता को किसे फिक्र है इन नेताओं को तो सिर्फ अपनी राजनीति चमकानी है... हंगामे के चलते सदन में कोई महत्त्वपूर्ण काम नहीं हो पा रहा... कुछ जरूरी विधेयकों पर चर्चा लगातार टल रही है.... ऐसे में विपक्ष से सहयोग की अपेक्षा स्वाभाविक है.... आखिर संसद चर्चा का मंच है, सरकार के खिलाफ नारेबाजी का नहीं.... लेकिन इस मामले में सरकार से भी लोकतांत्रिक रवैए की अपेक्षा की जाती है.... आखिर संसद में कामकाज का माहौल बेहतर बनाने की जिम्मेदारी उसी की है.... जब से मानसून सत्र शुरू हुआ है, विपक्ष सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे सिंधिया और शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफे की मांग पर अड़ा हुआ है.... कांग्रेस की दलील है कि विपक्ष के रूप में उसने वही स्टैंड अपनाया है जो कभी बीजेपी अपनाया करती थी... उधर विपक्ष के इस रुख से सरकार को रत्ती भर चिंता नहीं.... उसकी कोशिश विपक्ष पर जवाबी हमला बोलने और उसे विकास में बाधक बताने की है... वह शुरू से ही विपक्ष को छकाने की मंशा से रणनीति बनाती रही है.... फिर जहां तक राजनीति का सवाल है, तो उसका तकाजा है कि अड़े रहो.... झुको मत, अगर एक बार झुके तो फिर झुकते रहना होगा और शायद इसलिए सरकार झुकना नहीं चाहती... लेकिन इन सबके बीच उन सावा-सौ करोड़ जनता का क्या.... जो तरह-तरह के मुद्दों पर सरकार से जवाब का इंतज़ार कर रही है... छात्र लाठियां खा रहे हैं... सैनिक अपनी पेंशन का इंतज़ार कर रहे हैं... बाढ़ की समस्या मुह बाए खड़ी है... किसानों के मुआवज़ा मिलने का मुद्दा कहां गया.... वो किसी को पता नहीं.... इससे यही लगता है कि हमारा विपक्ष आलसी हो चला है.... वो नए तथ्यों की तलाश में अपना पसीना नहीं बहाना चाहता.... और सिर्फ विपक्ष होने के नाते अपना विरोध दर्ज कराना चाहती है... साफ है सत्ता और विपक्ष, दोनों अधिक से अधिक आक्रामक दिखना चाहते हैं... कहने को बीजेपी संसद में बहस कराने को उतावली तो दिख रही है, पर बहस के नतीजों को लेकर उसमें घबराहट भी साफ देखी जा सकती है.... बहरहाल भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक संवाद की जमीन पिछले तीन-चार सालों में जितनी कम हुई है, उतनी शायद इमर्जेंसी को छोड़कर पहले कभी नहीं रही.... जब दोनों पक्षों के वोट संवादहीनता से ही निकलते हों तो संसद चले या चले, किसे पड़ी है।