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Tuesday, 28 July 2015

‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ कलाम





आज पहली वार लिखते वक्त हजार बार सोचा कि क्या लिखूं, क्या ना लिखूं, कहां से शुरू करूं.... एक पत्रकार की हैसियत से शायद ऐसा पहली वार हुआ है कि लिखने को मेरे पस कोई शब्द ही नहीं बचे.... आखिर कलम के प्रेरणा कलाम ही आज हमारे बीच नहीं रहे.... उन्हें क्या कह कर संबोधित किया जाए मिसाइल मैन, भारत रत्न, पीपुल्स प्रेसिडेंट, लेखक या शिक्षक या फिर कमाल के कलाम.... उनकी उपलब्धियां... देश के प्रति उनका अगाध प्रेम... देश के विकास में उनका योगदान भुलाए नहीं भूलेगा.... कहते हैं ना व्यक्ति अपने कर्मों से ही महान बनता है... कलाम साहब उन्हीं महान हस्तियों में से एक थे... जिन्होंने अपने जीवन भर इतने महान काम किये हैं जो हमारे देश की आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है... महात्मा गांधी के बाद लोगों के लिए पूज्यनीय बने कलाम के बारे में कहा जाता है कि वे क़ुरान और भगवद् गीता दोनों का अध्ययन करते थे... इसी कारण उनके व्यक्तित्व के अंदर गीता का ठहराव था तो वहीं वाणी में कुरान की मिठास दिखायी देती थी जिसके चलते वो सबको अपना बना लेते थे... एक सच्चे मुसलमान और एक नाविक के बेटे अवुल पकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्तूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ.... एक अखबार बेचने वाले बच्चे से लेकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने का सफर काफी दिलचस्प और प्रेरणा दायक है.... कलाम साहब की जिंदगी एक अनवरत यात्रा का नाम है.... कलाम वैज्ञानिक तो थे हीं, वीणा भी बजाते थे... शिक्षण संस्थानों में  जगह-जगह जा कर प्रोफेसर के रुप में लेक्चर भी देते थे.... प्रकृति के साथ समय भी गुजारते थे और इन सब के बीच उन्होंने 20 किताबें लिखने का भी वक्त निकाल लिया.... कलाम साहब को देश का शीर्ष सम्मान भारत रत्न मिला... उन्होंने देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति को भी हासिल किया, लेकिन फिर भी एक गरीब नाविक के इस बेटे ने कभी रुकना नहीं सीखा.... राष्ट्रपति भवन छोड़ने के बाद भी कलाम ने एक शिक्षक के तौर पर अपने पसंदीदा काम को चुना.... कलाम ने कई दफा कहा कि उन्हें पूर्व राष्ट्रपति के बजाए 'शिक्षक कलाम' कहा जाए.... उन्हें अपनी जिंदगी में जो भी जिम्मेदारी मिली, उसे उन्होंने नई परिभाषा दी... इसीलिए वह आम लोगों के राष्ट्रपति होकर भी सबके लिए हमेशा खास रहेंगे... कलाम की शख्सियत में कोई बनावटीपन नहीं था.... आज थोड़ी सी सफलता में जहां लोग हवा में उड़ने लगते हैं, कलाम आजीवन हर किस्म के दिखावे से दूर रहे.... सादे कपड़े, बालों को संवारने का एक ही तरीका और बच्चों सी चहकती हंसी.... सच मानिए उनकी यही मुस्कान तमाम मिसाइलों से ज्यादा जानलेवा थी.... खैर कलाम जैसी शख्सियत के लिए लिखने बैठे तो कई किताबें लिखी जा सकती है.... उनकी शख्सियत ही कुछ ऐसी थी की चन्द शब्दों में नहीं समा सकती.... आज जहां देश में हम हिन्दु, मुस्लिम, सिख, इसाई के रूप में लड़ रहे हैं... ऐसे समय में एक सच्चे हिनदुस्तानी हमे छोड़ कर चले गए.... बहरहाल कलाम साहब जैसे इंसान सदियों में एक बार आते है.... आज वो हमारे बीच शाररीक रूप से भले ही ना हो, पर उनके करिश्माई व्यक्तित्व आज भी देखी जा सकती है.... जिसने पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया है.... जहां हर कोई उनको खुद से जोड़ लेने पर आमदा है... आज सभी जाति, धर्म और रंग-रुप से उपर उठकर एक शख्सियत की मौत पर नम आखों से उन्हें श्रद्धांजलि दें रहा हैं और सिर्फ यही कह रहा है, कलाम तुझे सलाम’!


Monday, 27 July 2015

सांप, सपेरा और विष!


राजनीति में कुछ भी संभव है.... कल तक जो किसी का शत्रु हुआ करता था वो आज उसी का दोस्त है.... और जो दोस्त हुआ करता था वो आज शत्रु हो चला है.... जी हां आपने ठीक ही सोचा मैं बिहारी बाबू और बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा की बात कर रहा हूं... सिन्हा साहब एक बार फिर बगावती मूड में दिख रहे हैं.... एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के मुजफ्फरपुर में 25 जून को रैली कर नीतीश कुमार की सरकार को जमकर कोसा तो दूसरी तरफ बीजेपी के कद्दावर नेता शत्रुघ्न सिन्हा उसी दिन देर रात नीतीश से मिलने पहुंचे... मिलने के बाद ना सिर्फ नीतीश की तारीफ की बल्कि पीएम को नसीहत भी दी कि भला बुरा कहने की बजाए वो बिहार सरकार की मदद करें... हलांकि बाद में बवाल बढ़ने पर उन्होंने सफाई दी कि वो सिर्फ शिष्टाचार के चलते मिलने गए थे.... आज के राजनीति में भी शिष्टाचार बचा हुआ है ये इन्हीं से पता चला.... खैर इससे पहले वो लालू के जन्मदिन पर उनके घर गए थे.... दरअसल शॉटगन एक अरसे से पार्टी से खफा चल रहे हैं.... खफा भी इतने की कई बार पार्टी लाइन के आगे बढ़कर अपनी बात कह देते है.... हालांकि पार्टी से उनकी नाराजगी का कारण भी है.... शत्रुघ्न सिन्हा सिनेमा की दुनिया से सियासत की दुनिया में आए और उस दौर में पार्टी से जुड़े जब पार्टी बिल्कुल नई थी.... तब अमिताभ बच्चन कांग्रेस के करीबी थे और बिहारी बाबू ने बीजेपी को चुना.... 1996 में जब बीजेपी अच्छा करने लगी तो पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का सांसद बनाया.... फिर वाजपेयी सरकार में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री, और शिपिंग मंत्री भी रहे.... लेकिन इस बार सिन्हा को सरकार में जगह तो नहीं ही मिली उल्टे उन्हें दरकिनार किया जाने लगा.... इससे पहले जब भी चुनाव प्रचार का मौका आता था तो बिहारी बाबू को पार्टी का स्टार प्रचारक बनाया जाता था.... भीड़ जुटाने के लिए इनकी सभाएं होती थीं.... लेकिन अब तो रैलियों में उन्हें न्योता तक नहीं दिया जाता.... तो टीस किसी न किसी रूप में तो बाहर आएगी ही.... बहरहाल राजनीतिक महत्वकांक्षा हर किसी की होती है, इनकी भी है और होनी भी चाहिए.... लेकिन उसके लिए इस तरह का कदम राजनीतिक तौर पर आत्मघाती साबित हो सकता है.... शिष्टाचार, सामाजिक और व्यक्तिगत संबंधों की जिम्मेदारी शत्रु को जाने की इजाजत देती होगी.... लेकिन कैमरे, मीडिया के सामने वो कैसे उन्हें अपना आदर्श पेश कर सकते हैं, जिसके खिलाफ उनकी पार्टी राजनीतिक लड़ाई लड़ रही हो.... एक तरफ उनकी पार्टी जिसे जंगल राज का प्रतीक पेश कर रही है, शत्रु अपने राजनीतिक हित साधने के लिए उसे ही सच्चा और अच्छा आदमी बताते फिर रहे हैं.... ऐसी घटनाएं पार्टी को कमजोर तो करती ही है.... साथ ही उनके साख पर भी बट्टा लगाएगी..... राजनीतिक रिश्तों के साथ व्यक्तिगत रिश्तों को जोड़कर चलना, वो भी चुनावी मौके पर राजनीतिक तौर पर समझदारी की बात नहीं है.... अगर कोई दिक्कत है तो फिर मिल बैठकर उसे सुलझाने का प्रयास करना चाहिए.... अगर नहीं होता तो फिर पार्टी छोड़ देना चाहिए.... क्योंकि ये तो समाज का सिद्धांत रहा है कि विचारधारा जहां मेल खाती है वही आदमी काम करता है.... और फिर बिहारी बाबू को तो हर कोई हाथों हाथ लेने को तैयार बैठा है..... वैसे भी राजनीति में कब कौन किसका दोस्त बन जाए और कब कौन किसका शत्रु ये बताना मुश्किल है.... और उसका नतीजा तो हम देख ही रहे है लालू-नीतीश की दोस्ती के तौर पर.... राजनीति हित साधने के लिए एक ने विष पिया तो दूसरे ने सांप से दोस्ती की.... ऐसे में शत्रु और कुछ नहीं तो सपेरा बन कर बीन तो बजा ही सकते हैं।


Friday, 24 July 2015

नैतिकता की कसौटी पर.....नेता !

कल एक पुराने साथी ने सालों बाद फोन किया.... उसने कुछ मांगा मुछसे तो मैने माना कर दिया.... फिर उसने कहा, नैतिकता के आधार पर तुम्हे मदद करनी चाहिए... मैने कहा नैतिकता की तो बात ही मत करों दोस्त.... क्योंकि आज-कल नैतिकता काफी ढीठ हो गया है.... सच में वक्त के थपेड़ों ने नैतिकता को कितना बदल दिया है.... एक समय था जब नैतिकता काफी भावुक हुआ करती थी.... जरा सा इल्जाम लगने पर लोग नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देते थे.... दरअसल जन-प्रतिनिधियों से जनता नैतिक आचरण की अपेक्षा रखती है.... आज भी लोगों को याद है कि इसी देश में एक रेल दुर्घटना होने पर लालबहादुर शास्त्री ने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था.... वो दिन भी याद है जब देश के प्रधानमंत्री अनाज की कमी होने पर एक समय का खाना तक छोड़ देते थे.... लेकिन अब किसी आरोपी या अपराधी की सहायता करने और उससे पैसों का लेन-देन करने का पक्का सबूत मिल जाने पर भी हमारे नेता कुर्सी से चिपके रहते हैं.... व्यापमं घोटाले को लेकर लंबे समय से विरोध चल रहा है.... इस मामले से जुड़े चालीस से ऊपर गवाहों और आरोपियों की संदिग्ध मौत विचलित करने वाली है... पर बीजेपी अगर अब भी उस पर परदा डालने की कोशिश में जुटी है तो समझना मुश्किल है कि इससे उसे हासिल क्या होगा... यूपीए सरकार के समय जब राष्ट्रमंडल खेल, दूर संचार स्पेक्ट्रम आबंटन, कोयला खदान आबंटन आदि में अनियमितताएं उजागर हुर्इं तो बीजेपी ने सबसे अधिक आक्रामक रुख अख्तियार किया था... उस वक्त संबंधित दागी मंत्रियों, नेताओं को उनके पद से हटा दिया गया था... अब वही बीजेपी सत्ता में आने के बाद नैतिकता का वह तकाजा कैसे भूल गई.... सच में जमाना बहुत बदल गया है.... राजनीति में सदैव नैतिकता की दुहाई देने वाला दल बीजेपी आज अपने नफे-नुकसान का हिसाब कर कदम उठा रही है.... जबकी इसी पार्टी में कभी आडवाणीजी जैन हवाला कांड में नाम आने पर नैतिकता के आधार पर संसद की सदस्यता छोड़ दी थी.... आडवाणी पर केवल आरोप था, किसी अदालत ने उन्हें दोषी नहीं ठहराया था.... अदालत ने जब उन्हें निर्दोष करार दे दिया तब वो फिर संसद में लौटे.... अब उनकी ही पार्टी में उल्टी गंगा बह रही है.... गंभीर से गंभीर आरोप लगने पर बीजेपी सबूत मांगती है.... सबूत देने पर अदालत जाकर गुनाह साबित करने की चुनौती देती है.... खुलेआम कहती है कि जब तक न्यायालय प्रमाण की पुष्टि न कर दे, तब तक किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता.... केवल नैतिकता के आधार पर कोई नेता इस्तीफा नहीं देगा.... वक्त के साथ नैतिकता को ये भी समझ आ गया है कि इस्तीफा देने का मतलब तो अपराध की स्वीकारोक्ति है.... इसलिए इस्तीफा देने का मतलब आपकी जनता के प्रति जवाबदेही के रूप में नहीं बल्कि विपक्ष के सामने हथियार डालने के तौर पर देखा जाता है.... और यही विपक्ष बाद में आपके इस्तीफे को अपनी जीत के प्रमाण पत्र के तौर पर बार-बार लोगों को दिखाकर आपको नीचा दिखाता रहेगा.... और शायद इसलिए एलके आडवाणी और केएन गोविंदाचार्य जैसे बीजेपी के वरिष्ठ नेता भी आज नैतिकता की दुहाई दे रहे है फिर भी पार्टी के कानों पर जूं तक नहीं रैगती.... हलांकि नैतिकता के आधार पर इस्तीफा न देने वालीं बीजेपी की दो बड़ी नेत्रियों ने मानवता के पक्ष में बातें जरूर की हैं.... सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्होंने मानवता के आधार पर ललित मोदी की मदद की.... अब मेरे समझ में ये नहीं आ रहा कि जो मानवता को धारण करेगा, वह भला नैतिकता को कैसे त्याग सकता है? क्योंकि मानवता और नैतिकता मिलते-जुलते गुण माने जाते हैं.... खैर मैने उससे फिर कहा कि आज-कल लोगों की खाल बड़ी मोटी हो गई है.... नैतिकता का कोई असर नहीं होता.... आज के जमाने में नैतिकता का क्या मोल है दोस्त.... बाजार में बेचने निकलों तो कोई खरीदार नहीं हैं और खरीदने निकलों तो ढूढ़ने से नहीं मिलती.... जाने दो ये सिर्फ चिल्लाने की चीज है मानने की नहीं....!


नोट:- मैने उस दोस्त की मदद कर दी क्योंकि मेरी नैतिकता शायद आज भी बची है.... आप में है क्या?



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Wednesday, 22 July 2015

आपके टूथपेस्ट में शकरकंदी है?


गर्लफ्रेंड की तरह बाजार भी आपको कभी चैन से बैठने नहीं देता... वो हमेशा इस बात का अहसास करवाएगा कि तुम्हारे पास जो है, उसमें क्या कमी है.... एक जमाने में मास्टरजी ने राजू के लिए पूरी क्लास से सिर्फ इसलिए ताली बजवा दी थी कि वो डाबर लाल दंत मंजन यूज करता है.... फिर वक्त के साथ मंजन की जगह टूथपेस्ट ने ले ली और साल 2008 में हम से पूछा जाते लगा कि क्या आपके टूथपेस्ट में लौंग है? फिर साल 2010 में पूछा जाता है कि क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है? फिर 2013 में क्या आपके टूथपेस्ट में नमक और नींबू है? बहुत मुमकिन है कि 2016 में कोई सुंदरी आ के आप से पूछे कि क्या आपके टूथपेस्ट में शकरकंदी है? मतलब समझ नहीं आ रहा कि ये लोग हमसे ब्रश करवाना चाहते है या टूथपेस्ट से शिकंजी बनवाना चाह रहे हैं... पहले किसी भी ऊटपटांग चीज को जरूरत बता कस्टमर को हैरान कर दो... और वो गरीब जैसे-तैसे इस नई जरूरत को पूरा कर चैन से सोने लगे तो उसके कान में जोर से ये कहकर उसे उठा दो कि नमक तो ठीक है, मगर क्या आपके टूथपेस्ट में हल्दी है... कभी-कभी मेरा मन होता है कि काश आज हम किसी लिपस्टिक का एड कर रहे होते तो किसी दिन इन्हीं सुंदरियों के घर जा कर पूछता कि क्या आपकी लिपस्टिक में कस्तूरी मेथी है? तब इन्हें पता चलता कैसा लगता है।





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Tuesday, 21 July 2015

कभी ‘मौन मोहन’ थे, आज ‘मौन मोदी



हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी,
न जाने कितने सवालों की आबरु रखी!
ये शेर तो याद होगा ही आपको, आपको हो ना हो मैं तो कभी नहीं भुल सकता इस शेर को.... आखिर इसके बाद ही मुझे शेरो-शायरी का शौक चढ़ा... ये शेर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी खामोशी तोड़ते हुए कहा था... अब, जब देश के प्रखर वक्ताओं में शुमार वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद का नया सत्र शुरु होने पर मीडिया के सामने आए और मीडिया के सवालों से बचते दिखे तो अनायास ये शेर याद आ गया.... और मोदी जी में मनमोहन सिंह का अक्स दिखने लगा.... जी दृश्य बिलकुल वैसा ही था.... कहते है वक्त बदलते देर नहीं लगती.... अब देखिए ना कल तक मौन मोहनथे, आज मौन मोदी हैं, तो आखिर दोनों में फर्क ही किया है.... कभी कांग्रेस के मंत्रीयों के नाम गड़बड़झाले में आते थे और बीजेपी उसे लेकर सड़क से संसद तक हो हल्ला मचाती थी.... संसद नहीं चलने देती थी.... कांग्रेस संसद में लाख चर्चा को कहती रही, पर बीजेपी इस्तीफे से कम पर मानने को तैयार नहीं होती थी.... वक्त बदला, सरकार बदली, अब मोदी के मंत्रीयों के नाम गड़बड़झाले में आ रहे है और कांग्रेस हो हल्ला मचा रही है.... और संसद ठप है.... दरअसल पांच साल की सरकार में राजनीति ऐसे ही चला करती है... बीच में कोई पिसता है तो वो है जनता.... मनमोहन सिंह लाख ईमानदार थे लेकिन बीजेपी उनकी सरकार के किस्सों पर फोकस बना कर धीमी आंच में बदनामियों को पकाते हुए यूपीए को जनता की निगाहों से उतारा था.... आज वहीं काम कांग्रेस कर रही हैं.... मोदी चाहे लाख ईमानदार हो लेकिन कीचड़ का छींटे पीएम मोदी पर पड़ना तय है.... कांग्रेस अब पीएम को नसीहत दे रही है कि मोदी राजधर्म निभाए, राजे धर्म नहीं.... हलांकि नरेंद्र मोदी इन सब बातो से घबराते नहीं है... हमलावर विपक्ष की तो रत्ती भर चिंता नहीं करते.... फिर जहां तक राजनीति का सवाल है, तो उसका तकाजा है कि अड़े रहो.... अगर एक बार झुके तो फिर झुकते रहना होगा और शायद इसलिए मोदी झुकना नहीं चाहते.... हलांकि पीएम के चुप्पी के पिछे एक और कारण हो सकता है और वो है आने वाले दिनों में बिहार विधानसभा चुनाव.... बीजेपी को लगता है कि अगर इन मंत्रियों का इस्तीफा लिया गया तो इससे जनता में सीधा संदेश ये पहुंचेगा कि कुछ तो गड़बड़झाला जरूर था और इन सब का असर बिहार के विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय है.... पार्टी बिहार में विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए फिलहाल कोई गलती नहीं करना चाहती है.... हलांकि इन मंत्रियों का इस्तीफा ना हो यह विपक्ष भी चाहेगा और बीजेपी के अंदर भी कुछ मोदी विरोधी यही चाहेगें.... वो इसलिए कि इससे मोदी सरकार की आलोचना का चार साला तक उसे मुद्दा मिलेगा.... इसका प्रचार करने के लिए ललित पुराण विपक्ष का मंत्र जाप होगा.... ललित मोदी ने जब पहला मंत्र मुहैय्या कराया है, तो उसका जाप करते जाना विपक्ष का सहज नुस्खा होगा.... विपक्ष का काम इस हल्ला को लोगों की यादाश्त में बनाए रखना है और विपक्ष इसे साल 2019 के चुनाव तक अपने तरकस में रखना चाहेगी.... ध्यान रहे भारत में हर घोटाला, हर विवाद, हर गड़बड़झाला राजनीति के तालाब में एक तूफान बनकर आया और सरकार को उड़ा ले गया.... बहरहाल मोदी जी मीडिया के सवालों पर मौन रहे ये तो समझा जा सकता है.... लेकिन उनके पिछे खड़े नेता जो मीडिया के सवालों पर हंस रहे थे वो समझ से परे था... आखिर वो हंस के बताना क्या चाह रहे थे.... क्या उन्हें मीडिया के सवाल इतने बचकाने लगे? या फिर मंत्रीजी यह बात सोच कर हंस रहे थे कि मीडिया का चुप्पी से उपहास उड़ाया जा रहा है? जो भी हो ये लोकतंत्र के लिए सही नहीं है.... इन मंत्रीयों की हंसी देख कर एक शेर याद आ रहा है।
जनाब मत पूछिए हद हमारी गुस्ताखियों की

हम आईना ज़मीं पर रखकर आसमां कुचल दिया करते हैं...!!






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Sunday, 5 July 2015

बिहार की बिसात

बिहार में एक बार फिर से राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है। राजनीति के माहिर खिलाड़ी राजनीति के तमाम पैंतरे आजमाने शुरु कर दिए हैं। इस खेल में कौन बनेगा बिहार का मुख्यमंत्री ये तो फिलहाल रहस्य बना हुआ है, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी की जंग शुरू हो गई है। इस जंग में नरेन्द्र मोदी सरकार की अग्निपरीक्षा है, तो दूसरी तरफ लालू यादव और नीतीश कुमार की शक्ति परीक्षा और चुनावी अखाड़े के दो राजनीतिक पहलवान नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार में तरह-तरह के दांव अजमाए जा रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं बिहार में राजनीति के धुरंधर तरह तरह के पत्ते फेंक रहे हैं। इसी जंग के तहत बिहार की राजनीति में हाल के समय तक धुर विरोधी रहे और एक-दूसरे को अक्सर तक कोसने वाले दो दुष्मन अब दोस्त बन गए हैं। जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बना लिया है। उधर, बीजेपी ने भी सबसे पहले जीतनराम मांझी को अपने पाले में किया, जबकि रामविलास पासवान उनके साथ पहले से ही हैं। इस तरह से बीजेपी ने पूरे दलित वोट को अपने कब्जे में करने की कोशिश की है। दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के भविष्य से जुड़ा है। नवंबर 2013 से लगातार चुनावी जीत की लहर पर सवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसी साल दिल्ली विधानसभा में अरविंद केजरीवाल ने करारा झटका दिया था। अब बिहार भी बीजेपी के लिए कड़ी चुनौती बन गया है। लंबी जद्दोजहद के बाद आखिर लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मंजूर कर लिया। इसके साथ ही बरसों से बिखरे जनता परिवार को एकजुट करने की कवायद सिरे चढ़ गई। बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू और आरजेडी की साझी ताकत का सामना करना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा। कई दशकों से जनता दल परिवार बिखरा पड़ा था। समाजवादी आंदोलन की कोख से जनमी इन पार्टियों की खासियत यह है कि जब-जब उनके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराते हैं वे एकजुट हो जाती हैं और सत्ता मिलने के बाद अपने नेताओं के अहंकार के चलते बिखर जाती हैं। 1979 में जनता पार्टी के टूटने और 1990 में जनता दल तार-तार हो जाने का कारण कोई बड़ा सैद्धांतिक मतभेद नहीं था, दोनों बार कुछ नेताओं के सत्ता-मोह और अहंकार के कारण पार्टी टूटी थी। हांलाकि इस बार एक बात अलग है। इससे पहले हमेशा कांग्रेस के विरोध में ये दल और नेता एकजुट होते थे और उन्हें बीजेपी का साथ मिलता था। लेकिन समय बदलने के साथ इनकी मुखालफत अब बीजेपी के साथ हो गई है, जिसमें कड़वे घूंट तक पिए जाने की बातें की जा रही हैं। बहरहाल, मिलना और मिलकर बिछड़ना, यही भारतीय राजनीति में समाजवादी कुनबे का इतिहास रहा है और यही इनकी पहचान भी। आज लोहियावादी मुलायम सिंह यादव इनके सारथी बने हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें इन दलों से लगाव है, बल्कि उन्हें भी अपनी पार्टी को लेकर एक डर सताने लगा है। वो चाहते है कि जनता परिवार का एक प्रयोग बिहार चुनाव से शुरु हो और अगर ये सफल होता है, तो 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव में भी आजमाया जाएगा। यानी एक बात तो साफ हो जाती है कि राजनीतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य यही है कि उन्हें किसी भी तरह सत्ता की मलाई खाने को मिले।
लालू-नीतीश फैक्टर
छात्र आंदोलन से उभरे इन नेताओं ने बिहार की राजनीति को व्यापक रूप से बदल दिया। जब से लालू और नीतीश बिहार की राजनीति के क्षितिज पर उभरे हैं, तब से सत्ता समीकरण लगातार उनके इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं। लालू के परंपरागत मतदाता बिहार के सोलह फीसदी यादव और चौदह फीसद मुसलमान हैं। खराब वक्त में भी राजद को करीब बीस फिसदी मत मिले हैं। इसी प्रकार नीतीश को करीब सोलह फीसद मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है और इसलिए राज्य में पिछले पच्चीस साल में से पंद्रह साल लालू ने, तो दस साल नीतीश ने राज किया है। लोकसभा चुनाव में भी इन्हीं का सिक्का चला है। साल 1998 के लोकसभा चुनाव में इन दोनों के दलों ने चौवन में से सत्ताईस सीटें जीती थीं, जबकि साल 1999 में पच्चीस। सन 2000 में विभाजन के बाद झारखंड अलग हो गया, लेकिन जेपी आंदोलन की कोख से जन्में लालू और नीतीश का प्रभाव जस का तस बना रहा। 2004 के आम चुनाव में दोनों ने चालीस में से अट्ठाईस और 2009 में चौबीस सीटों पर विजय दर्ज की। 2014 के आम चुनाव में पहली बार दोनों पार्टियों को करारा धक्का लगा। दोनों के कुल छह प्रत्याशी ही जीत पाए। जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया, तब नाराज नीतीश ने बीजेपी के साथ सत्रह बरस से चल रहा गठबंधन तोड़ कर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। जेडीयू को इस निर्णय की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी, लेकिन आम चुनाव में पराजय से नीतीश ही नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रीय दलों ने बड़ा सबक सीखा। उन्हें पता चल गया कि अकेले दम पर बीजेपी को रोकने की ताकत किसी एक पार्टी में नहीं है। भगवा दल के पैरों में बेड़ियां मिल-जुल कर ही डाली जा सकती हैं। परिणामस्वरूप पिछले साल समाजवादी आंदोलन से निकले छह दलों ने विलय की घोषणा की, जिसका फल अब सामने आया है। सांप्रदायिक ताकतों को पराजित करने के लिए लालू और नीतीश ने हाथ मिलाया, यह सत्ता की चाशनी ही है जो दो दोस्तों को दूर करने या फिर पास-पास लाने का माद्दा रखती है। वैसे भी राजनीति में कोई स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता। भारतीय राजनीति में ऐसी अनेक नजीर हैं और उन्हीं में दो नाम लालू यादव और नीतीश कुमार हैं। दरअसल, कुछ माह पूर्व दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बीजेपी का घमंड चकनाचूर किया था और बिहार उपचुनावों में लालू और नीतीश ने साझा प्रत्याशी खड़े कर बीजेपी को धूल चटाई थी। इन परिणामों से विरोधी दलों को पता चल गया कि मोदी लहर को रोकना कठिन नहीं है। हलांकि तब से अब तक स्थिति में परिर्वत जरूर हुआ है। क्योंकि जेडीयू के नेता और पूर्व मुख्य़मांत्री जीतनराम मांझी पार्टी से बगावत करके अपनी पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा का गठन कर लिया हैं और वो बीजेपी के साथ जा मिले हैं। वहीं लालू की पार्टी से राजेश रंजन उर्फ पप्पु यादव ने भी आरजेडी से बगावत करके अपनी अलग पार्टी बना ली है। हलांकि सुपौल सीट पर उनकी पत्नी कांग्रेस से सांसद हैं और ऐसे में रंजीता रंजन के लिए धर्मसंकट वाली स्थिति पैदा हो गई कि वह पति की पार्टी के लिए वोट मांगें या कांग्रेस के लिए। लालू-नीतीश के खेमे की इस बगावत ने शायद बीजेपी की जीत को आसान कर दिया है। वह कहीं से भी लालू-नीतीश और कांग्रेस गठबंधन से उन्नीस नहीं है।
बीजेपी भी है तैयार
लोकसभा चुनाव में बीजेपी-एलजेपी-राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी को 38.8 फीसदी वोट मिले थे, आरजेडी-कांग्रेस-एनसीपी को 29.7 फीसदी वोट जबकि जेडीयू को 15.8 फीसदी वोट मिले थे। नये समीकरण के मुताबिक आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस-एनसीपी के वोट फीसदी को जोड़ दें तो ये आंकड़ा 45.5 फीसदी हो जाता है। यानी एनडीए से ये 6.7 फीसदी ज्यादा था लेकिन जीतन राम मांझी के जेडीयू से छिटकने से जेडीयू का महादलित वोट बैंक तहस-नहस होता दिख रहा है और इसका सीधा फायदा अब बीजेपी होगा। लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जहां सबसे ज्यादा नुकसान हुआ और आरजेडी-जेडीयू को जहां सबसे फायदा हुआ वो इलाका नॉर्थ बिहार का सीमांचल इलाका है। यहीं से बीजेपी की विरोधी पार्टियां किशनगंज, अररिया, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया और कटिहार से जीती थी। जहां पर मुस्लिम और यादव वोटरों की अच्छी खासी संख्या हैं। इसी इलाके में पप्पु यादव का बोलबाला है। पप्पु यादव की पकड़ पूर्णिया, सहरसा, मधेपुरा और सुपौल में अच्छी है। पप्पु यादव अब आरजेडी को छोड़कर अपनी पार्टी का गठन कर लिया हैं। ऐसे में पप्पु यादव यादव बीजेपी से हाथ मिलाते हैं या नहीं इसका फायदा वोट जुड़ने या वोट बंटने से बीजेपी को ही होगा। उधर, बीजेपी के पास कुशवाहा भी हैं, जिससे लव-कुश जाति के वोटों में भी सेंध लगेगा। बिहार में कुरमी और कोइरी यानी कुशवाहा जाति को लव-कुश जाति कहा जाता है। इन दोनों जातियों में आपस में शादियां भी होती हैं और राजनीति में दोनों साथ-साथ ही वोट करते रहे हैं। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा ने अलग दल बना कर इन दोनों जातियों के वोटों को अलग कर दिया। यह नीतीश कुमार के लिए चिंता की बात हो सकती है, क्योंकि अभी तक इन दोनों जातियों के 8 फीसदी वोटों पर नीतीश कुमार का एकछत्र राज था। इसके अलावा बीजेपी के परंपरागत वोट अगड़ी जातियां बीजेपी के साथ जा सकती हैं। यही वजह है कि बीजेपी को इस बार के विधानसभा चुनाव में जीत की आस है। लेकिन बीजेपी के पास यहां पर एक कमजोर कड़ी भी दिखती है। वह है बिहार में नीतीश के टक्कर में उनके पास कोई दमदार नेता नहीं है, जो नीतीश का सीधा मुकाबला कर सकता हो। यही वजह है कि बीजेपी किसी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बना कर चुनाव नहीं लड़ चाहती है। उधऱ बिहारी बाबू यानी शत्रुघ्न सिन्हा मुंहफुलाए बैठे हैं। बिहार के बीजेपी नेताओं से उनकी बनती नहीं है। साथ ही उन्हें लगता है कि उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया जाना चाहिए था। उन्हें यह भी लगता है कि यदि केवल सांसद बन कर ही रहना है, तो वह आरजेडी या जेडीयू से भी बना जा सकता है। यानी चुनाव निकट आने के साथ-साथ बीजेपी में अंतर्कलह तेज होने के आसार हैं। इसका दुष्प्रभाव बीजेपी के सहयोगी दलों और उनके वोट बैंक पर पड़ना लाजमी है। अब देखना है कि बीजेपी बिहार में चुनाव प्रचार को कैसे संभालती है। मोदी कैबिनेट में बिहार से छह मंत्री हैं और बीजेपी का प्रचार का तरीका बिहार चुनाव को काफी रोचक बनाने वाला है।

बहरहाल, संसदीय लोकतंत्र में हर चुनाव महत्वपूर्ण होता है, लेकिन बिहार के दोनों गठबंधनों के लिए इस चुनाव के खास मायने हैं। इससे सिर्फ बिहार की भावी सत्ता का स्वरूप ही नहीं तय होगा, इसके नतीजे देश के भावी राजनीतिक समीकरण का चेहरा भी तय करेगा। दरअसल देश की भावी राजनीति के नजरिए से अगले दो साल का समय बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस दौरान बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होंगे। लगभग एक तिहाई लोकसभा सीटों पर इन तीन सूबों का अधिकार है। वहां सत्ता पाए बिना बीजेपी का राष्ट्र पर एकछत्र राज करने का सपना साकार नहीं हो सकता। यानी अगर बिहार में जनता परिवार का परीक्षण सफल रहा तब देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश और फिर पश्चिम बंगाल की चुनावी जंग और दिलचस्प हो जाएगी।  लेकिन अगर बिहार में बीजेपी की जीत हुई, तो आगे के चुनावों के लिये उसके हौसले बुलंद होंगे। साथ ही राज्यसभा में बहुमत पाने की उसकी कोशिश को और बल मिलेगा और आगे के विधानसभा चुनावों में ज्यादा दमखम के साथ उतरेगी। 




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