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Tuesday, 26 May 2015

अबकी बार 'सेल्फ़ी' सरकार

आज-कल देश तीन चीजों से फेमस है.... एक सेल्फ, दूसरा सेल्फ़ी और तीसरा सेल्फ प्रमोशन.... जिसे देखो अपने आप में व्यस्त है और सब अपना-अपना सेल्फ़ी लेकर उसे सोशल मीडिया पर डाल कर खुद के प्रमोशन में लगा है..... हो भी क्यों न जब हमारे पीएम का मूड ही सेल्फियाना हो रखा हो, तो जनता तो होगा ही न.... आखिर दशको बाद हमें ऐसे 'सेल्फ़ी प्रेमी' पीएम मिले हैं..... जिसके काम से ज्यादा सेल्फ़ी का नाम हो रहा है..... मुझे लगता है सेल्फ़ी के प्रति दीवानगी शायद पीएम को बचपन से ही रहा होगा..... सोमवार को पीएम ने कहा कि एक साल में वो इत्ते सरे काम किए है कि 365 घंटा लग जाएगा गिनाने में ठीक ही तो कहा..... आखिर एक साल में कित्ते सेल्फ़ी हो गए होंगे..... लेकिन फिर भी विपक्ष कहता है काम ही नहीं हुआ..... अरे भईया सरे युवाओं को सेल्फ़ी खीचने का रोजगार तो मिल गया.... अब कितना काम करें.... अब तो नुक्कड़ पर चाय बेचने वाला भी चाय बनाते समय अपना सेल्फ़ी लेना नहीं भूलता..... मौसम कितना अच्छा तो सेल्फियाना हो रखा है..... विपक्षी का एक और शिकायत है कि पीएम इत्ते सरे विदेश दौरे पर क्यों जाते है..... आरे भाई, पीएम कोई हवाबाजी के लिए थोड़ी न विदेश जाते हैं..... तमाम तरह की डिले वहां हो रही है..... और फिर विदेश जाके वहां के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति के साथ सेल्फ़ी लेंगे तभी तो हमारी मित्रता बढ़ेगी..... और फिर प्रमोशन भी तो कोई चीज है.... भले ही प्रमोशन देश का हो या खुद का वो अलग बात है.... देश चलाने के लिए तो हमारी विदेश मंत्री हैं ही.... विदेश मंत्री तब तलक देश संभाले..... एक साल में आधी दुनिया घूम लेना कोई मज़ाक है क्या..... मैं तो चाहता हूँ कि जल्दी-जल्दी पीएम विदेश दौरे पर जाए ताकि हमारे यहाँ यूही सेल्फ़ी फोनों की डिमांड रहे..... तभी तो 'मेक इन इंडिया' का नारा 'मेड इन चाइना' में बदलेगा वैसे भी अपना एक नारा तो पीएम ने बदल ही दिया.... कल तक जो अच्छे दिनों के तलाश में थे.... अब उन्हें कह रहे हैं बुरे दिन तो चले गए.... ज्यादा माथा पच्ची मत करो भाई और ऐसे ही सेल्फ़ी बाज़ी करते रहो और हा उसे प्रमोट करना मत भुलना..... क्योंकि क्या पता कल को कोई सबसे अच्छा सेल्फ़ी लेने वाले को ही पीएम बनाया जाए..... इसी बात पे एक सेल्फ़ी तो बनती है!



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Saturday, 23 May 2015

केजरी और एलजी के बीच 'जंग'

कहते है राजनीति में सबकुछ माफ़ होता है, क्योंकि यहाँ कुछ नहीं साफ होता है.... इसका मतलब ये नहीं कि साफ-सुथरी राजनीति नहीं हो सकती, साफ-सुथरी राजनीति लोग होने नहीं देते हैं.... दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से जो कुछ चल रहा है.... उसमें मुझे लगता था कि गलती केजरीवाल जी की है..... मुझे लगता था कि उनमें अब भी बचपना हैं, वो स्कूल जाते उन बच्चों के तरह हैं जो बात-बात पर लड़ने लगते हैं..... लेकिन काफी अध्यन करने के बाद पता चला कि ताली एक हाथ से नहीं बजती..... दरअसल, केंद्र हमेशा से ही दिल्ली पर अपना नियंत्रण लेफ्टिनेंट गवर्नर के जरिए सुनिश्चित करता रहा है, दिल्ली में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र को लेकर खींचतान की नौबत तभी आई जब केंद्र और दिल्ली में अलग-अलग पार्टी की सरकारें रहीं..... लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार इस व्यवस्था को जिस हद तक खींच रही है, उसे देखते हुए लगता नहीं कि यह ज्यादा दिन चलने वाली है..... एलजी को समझना चाहिए कि उन्हें अधिकार इसलिए नहीं मिले हैं कि वे एक निर्वाचित राज्य सरकार को अपनी ताकत का अहसास कराते रहें..... उन्हें यह जिम्मेदारी इसलिए मिली है, ताकि कुछ असाधारण स्थितियों में ठीक एक अभिभावक की तरह वे जनता के हितों की रक्षा कर सकें.... केंद्र की बीजेपी सरकार अगर ऐसा सोचती है कि यह सब करके वह अरविंद केजरीवाल की ढिबरी टाइट कर देगी तो यह उसकी सबसे बड़ी गलती है..... इस मुद्दे पर मेरे मन में एक सवाल है जिसका जवाब मैं आप सबसे जानना चाहता हूँ..... सवाल यह है कि क्या अपने अफसरों की नियुक्तियों में एक निर्वाचित सरकार के हाथ बंधे होने चाहिए? अगर एक चुनी हुई सरकार अपने अधिकारियों की नियुक्ति, तैनाती और तबादले संबंधी फैसले नहीं कर सकती, तो उसकी प्रशासनिक जवाबदेही कैसे तय की जा सकती है?




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