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Tuesday, 29 December 2015

पाकिस्तान को लव-लेटर नहीं, लव की ज़रूरत!



पाकिस्तान को लव-लेटर लिखने की ज़रूरत नहीं है। ये तो यूपीए सरकार करा करती थी। एनडीए सरकार तो कुछ अलग करेगी ना। लिहाजा अब पाकिस्तान से लव करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री मोदी की पाकिस्तान की सरप्राइज विजिट तो यही संकेत देती है। हालांकि प्रधानमंत्री ने एक साहसिक कदम उठाया। मैं तहेदिल से इसका स्वागत करता हूं। मैरा भी यही मानना है कि बात करने से ही बात बनेगी। यह मैं यूपीए सरकार के समय भी कहता था और अब भी। लेकिन यूपीए के समय जब भी ऐसे कदम की मैं सराहना करता था। मेरे कुछ दोस्त मुझे कांग्रेसी कहकर चिढ़ाते थे। आज उन्हीं दोस्तों को अचानक इस सरप्राइज विजिट के बाद पाकिस्तान से प्यार हो गया। यूपीए सरकार गए अभी दो साल भी नहीं हुए हैं। आतंकवाद के खिलाफ और उस बहाने पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाए रखने के लिए तब विपक्ष में रही बीजेपी के रुख को इतनी जल्दी भुलाया नहीं जा सकता। सीमा पर होने वाली शहादत को लेकर राजनीतिक रूप से बीजेपी भाषाई उन्माद फैलाने में लगी थी। सुषमा ने एक सर के बदले दस सर का बयान दिया था। लेकिन अब कोई शहीदों के घर जाकर भावुकता का उन्माद नहीं फैलाता।
जरा सोचकर देखें कि अगर मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से बातचीत का ऐसा रुख दिखाया होता तो बीजेपी का क्या रवैया होता?  इस काल्पनिक स्थिति को यह कहते हुए भी खारिज नहीं किया जा सकता कि तब स्थितियां अलग थीं। क्योंकि पाकिस्तान की तरफ से हाल फिलहाल में ऐसा कोई भी संकेत नहीं आया है कि हालात बदले हैं। बीजेपी के खुद के सहयोगी दल शिवसेना ने भी ये सवाल उठाया कि यदि कोई कांग्रेस का प्रधानमंत्री इसी तरह करता को क्या बीजेपी ऐसे ही उनका स्वागत करती।
खैर मनमोहन सिंह में यह साहस नहीं था। वे बीजेपी के हमलों के आगे झुक गए। मनमोहन सिंह ने दस साल तक पाकिस्तान ना जाकर इसे साफ कर दिया कि वो डरपोक पीएम हैं। लेकिन अब देश को 56 इंच की छाती वाले पीएम मिले हैं तो इस तरह के सरप्राइज मिलते रहेंगे। मोदी सत्ता संभालने के बाद से ही ऐसे सरप्राइज देते रहे हैं। पहले पड़ोसी देशों के राजनेताओं को शपथग्रहण समारोह के लिए बुलाकर, फिर काठमांडू में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से नजरें फेरकर, विदेश सचिवों की बातचीत को रोककर और फिर पेरिस में अचानक नवाज शरीफ से मुलाकात कर। अब देखना दिलचस्प होगा कि मोदी के इस सरप्राइज गिफ्ट के बाद हमे रिटर्न गिफ्ट में क्या मिलता है? 

बहरहाल मोदी के इस सरप्राइज को देखकर कई प्यार करने वाले युवाओं को सीख मिली होगी कि आखिर सरप्राइज होता क्या है और देते कैसे है? मुझे भी इस सरप्राइज को देख अपने प्यार की याद आ गई। मैंने भी सालों पहले अपने प्रेमिका को ऐसा ही सरप्राइज दिया था। जब परीक्षा के सिलसिले में दिल्ली से पटना गया था और वहां से अचानक एक रात अपनी प्रेमिका से फोन पर बात हुई और मैं उससे मिलने अचानक घर पहुंच गया था। तब मेरी प्रेमिका से लेकर घर वाले तक भौंचक रह गए थे। ठीक इसी तरह जिस तरह मोदी के पाक दौरे ने लोगों को भौंचक कर दिया। 

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Wednesday, 16 December 2015

16 दिसंबर की वो काली रात....


यू तो 16 दिसंबर हम विजय दिवस के रूप में मनाते है। क्योंकि आज ही के दिन भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए थे। लेकिन भारतीय इतिहास के पन्नों में शूरवीरों की गाथाओं के साथ ही 16 दिसंबर, 2012 का वह काला पन्ना भी दर्ज हो गया, जिसने पुरुषसत्ता और सामंती मानसिकता के कीचड़ में डूबे भारतीय समाज को झकझोर कर रख दिया था। इसे एक दुर्घटना कहना शायद गलत होगा, क्योंकि यह अमानवीयता की वह पराकाष्ठा थी, जिसने न्याय प्रणाली को भी हिलाकर कर रख दिया। 16 दिसंबर की वो काली रात कोई नहीं भूला होगा और शायद भूल भी नहीं पाएगा। इसी दिन छह दरिंदों ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए चलती बस में 23 साल की दामिनी को अपनी हवस का शिकार बनाया था। इतना ही नहीं इन बेरहम दरिंदों ने दामिनी के शरीर में लोहे की रॉड़ डाल दी बाद में नग्न अवस्था में दामिनी और उसके पुरूष दोस्त को चलती बस से फेंक दिया था। उसके बाद इलाज के दौरान दामिनी की मौत हो गई थी। घटना के बाद पूरे देश में रोष की लहर फैल गई थी। दामिनी की मौत के बाद दिल्ली समेत देशभर की सड़कों पर आक्रोश उमड़ा था।
मानवता के चिथड़े-चिथड़े उधेड़ने वाली इस घटना ने एक ही रात में सत्ता के रसूकदारों को सख्त कानून बनाने और महिला सुरक्षा के मुद्दे को गंभीरता से लेने पर मजबूर कर दिया। हर बार की तरह देश की इस बहादुर बेटी के बलिदान को लेकर खूब राजनीति भी हुई, युवाओं ने नारे बुलंद किए, लाठियां खाईं, कड़ाके की ठंड में जलतोप की बौछारों से भीगे, चौराहों पर उसकी याद में लाखों मोमबत्तियाँ जलाई गई। देश के कई शहरों में भी प्रदर्शन हुए और निर्भया के सर्मथन में लोखों हाथ उठे। लेकिन क्या आपको लगता है निर्भया के इंसाफ की जंग अब पूरी हो चुकी है? क्या देश या फिर दिल्ली पहले से ज्यादा महफूज हो गई है? सच्चाई तो ये है कि आज भी दिल्ली में हर रात किसी न किसी युवती की आबरू को नीलाम किया जाता है। लेकिन ना तो सरकार ने कोई कदम उठाए है और ना ही हम वैसा आक्रोश दिखा पाए। इस तीन सालों में सिर्फ दिल्ली में ही निर्भया जैसी कई घटना हो चुकी है पर ना तो सरकार जागी, ना ही हम। हाल ही में दिल्ली में एक मासूम बच्ची को स्कूल जाते समय अगवाह किया गया। जबरन गाड़ी में ठूसकर उसे कुछ वहशी दरिंदो ने हवस का शिकार बनाया। कुछ दिन पहले ही मैंने आपको अपने ब्लॉग और फेसबुक के जरिए बताया था कि कैसे नोएडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन जैसे भीड़-भाड़ वाले इलाके में दिन-दहाड़े कुछ ऑटो वाले एक लड़की के साथ बदसलूकी कर रहे थे। लेकिन वहां करीब सौ से ज्यादा लोग मौजूद थे पर किसी को कोई मतलब नहीं था। सब देख कर भी अनदेखा बन रहे थे। यहां तक कि वहां सुरक्षा के लिए मौजूद गार्ड ने भी अनदेखा कर दिया। फिर मैंने जब आवाज उठाई तो वो माफी मांगने लगे।
दरअसल, सरकार ही नहीं आज हम भी मतलवी हो गए हैं। अपने आखों के सामने होते घटनाओं को भी देख कर अनदेखा कर देते हैं। अगर हम इन छोटी-मोटी घटनाओं को अनदेखा ना करें तो यकीन मानिए फिर किसी निर्भया के लिए हमे मोमबत्तियाँ जलाने की जरूरत नहीं पड़ेंगी।

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Wednesday, 9 December 2015

राहत की आड़ में राजनीति


एक तरफ जहां चेन्नई पिछले कई दिनों से लगातार हो रही बारिश की वजह से बाढ़ जैसे हालातों से जूझ रहा है। वहीं कुछ नेता इस प्राकृतिक आपदा को भी अपनी राजनीति चमकाने के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। आप सोच में पड़ जाएंगे कि राजनैuDSतिक दल और उनके नुमाइंदे खुद को चमकाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। सत्‍तारूढ़ एआईडीएमके समर्थकों ने प्रलय से जूझ रहे लोगों के बीच अपना चेहरा चमकाने के लिए अपनी मुखिया और राज्‍य की मुख्‍यमंत्री जयललिता को बाहुबली बना दिया है। चेन्नई की सड़कों पर ऐसे पोस्टर लगाए गए हैं जिनमें मुख्यमंत्री जयललिता को बाहुबली की राजमाता शिवागामी के रुप में दिखाया गया है जो एक बच्चे को उफनती नदी में एक हाथ से उठाई हुई है। पोस्टर में नीचे लिखा है, ‘’इस आपदा की घड़ी में अम्मा लोगों की जान बचा रही हैं। जयललिता के पोस्‍टर को लेकर सोशल मीडिया पर खासा आलोचना की जा रही है। इतना ही नहीं पीड़ितों को पहुंचाई जा रही राहत सामग्री पर मुख्यमंत्री जयललिता के फोटो के पोस्टर चिपकाए जा रहे हैं। भले ही राहत सामग्री पहुंचाने में देर हो जाए, पर अम्मा का फोटो लगाना अनिवार्य है।
दरअसल शासन करने की नीति को राजनीति कहतें हैं या तरीके से राज्य के शासन को सुचारू रूप से संचालित करने को राजनीति कहा जाता है। इसे राजनीति की संक्षिप्त परिभाषा तो कह सकतें हैं लेकिन वास्तव में राजनीति एक ऐसा व्यापक शब्द है जिसकी परिधि में शासन करने की नीति या प्रक्रिया के अलावा मानवीय संवेदनाओं का तत्व भी आता है हालांकि आज राजनीति के बदलते आयाम के दौर में राजनेता राजनीति को सिर्फ लोकतंत्र की लड़ाई ही मान बैठें हैं जिसका एक मात्र उद्देश्य सत्ता को हथियाना होता है जिसमें उनके निजी सरोकार सर्वोपरि होते हैं। मगर वास्तव में राजनीति हर वो चीज़ है जिससे सभी सामाजिक सरोकार जुड़े रहतें हैं लेकिन अब राजनेताओं द्वारा केवल सत्ता की राजनीति की जा रही है जहाँ सामाजिक सरोकार जैसे शब्द गौण होते जा रहें हैं। इसकी एक बानगी भर है चेन्नई, जहाँ आपदा से जूझते बच्चे-बूढे, स्त्री-पुरुष की मदद की आड़ में ओछी राजनीति की जा रही है। काश! राजनेता और उनके सिपहसलार मानवता की भावना को समझ पाते। 

सोनू कुमार झा से ट्विटर या फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

Tuesday, 8 December 2015

'बंटी दादा' के जज्बे को सलाम.....


कहते है सपने उन्हीं के पूरे होते, जिनके सपनों में जान होती है.....
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसले से उड़ान होती है......

जी हां, ऐसा ही कुछ कर दिखाया हैं जौनपुर उत्तर प्रदेश के अक्षांश गुप्ता, जो शरीर से 95 फीसदी विकलांग होने के बाद भी ना केवल अपने काबलियत के बल पर जेएनयू में दाखिला पाया, बल्कि जेएनयू के रिसर्च स्कॉलर में अपनी कड़ी मेहनत और लगन से पीएचडी कर दुनिया के सामने कायमाबी की मिसाल पेश की और ये सावित कर दिखाया कि मेहनत, लगन और काबलियत हो तो विकलांगता भी आपकी सफलता में बाधा नहीं बन सकती। 

अक्षांश ने कम्प्यूटर साइंस से बी-टैक और एम-टैक किया पीएचडी का विषय भी कम्प्यूटर से ही जुड़ा पर काफी अनोखा चुना था। हमलोग हमेशा सोचते हैं कि कैसे कम्प्यूटर से हम और अधिक स्मार्ट बने। पर उन्होंने ये सोचा कि किस तरह से कम्प्यूटर को ही और स्मार्ट बनाया जाए। ताकि कम्प्यूटर के दिमाग को इंसानी सोच के साथ और भी बेहतर बनाया जा सके। अक्षांश की उपलब्धि के वजह से ना केवल उनके परिजन, दोस्त बल्कि जेएनयू के वाइस चांसलर भी गौरवान्वित हैं। इसलिए अक्षांश के लिए विशेष तौर पर दिक्षांत समारोह का आयोजन कर उसे डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। जबकी जेएनयू में दिक्षांत समारोह नहीं होता है।
वैसे तो डॉक्टर की डिग्री में उनका नाम अक्षांश गुप्ता लिखा है, लेकिन कैंपस में सब लोग उन्हें 'बंटी दादा' के नाम से जानते हैं। बंटी दादा के शरीर के निचले हिस्से बेकार है, वो ठीक से बोल नहीं पाते हैं। उनकी बोली समझने में भी परेशानी होती है, यहां तक कि हाथ भी सही तरीके से काम नहीं करते हैं। शरीर की लाचारी को मात देने वाले बंटी दादा कहते हैं कि अपने भाई-बहनों को स्कूल जाते देख उनकी भी पढ़ने की इच्छा होती थी, लेकिन शरीरिक विकलांग होने के चलते कोई स्कूल एडमिशन नहीं देता था। हमारे देश में शरीरिक रूप से अक्षम लोगों को कमजोर समझा जाता है। इसके बाद भी उन्होंने स्कूल की पढ़ाई पूरी की और कामयाबी की मंजिल को छूकर अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' लगवाया और दुनिया के सामने कायमाबी की मिसाल पेश की। 32 साल के बंटी दादा ने जेएनयू के कैंपस में बनी होस्टल में रहकर 5 साल तक कड़ी मेहनत की। उन्होंने 'ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस' विषय पर थीसिस तैयार की। रिर्चस पूरी करने के लिए वह मलेशिया भी गए। होस्टल के एक छोटे से कमरे में रहते हुए उन्होंने कभी शारीरिक अक्षमता को पढ़ाई में आड़े नहीं आने दिया।
उनके दोस्त बताते हैं कि बंटी दादा का असाधारण दिमाग है। बंटी दादा सिर्फ अपने बारे में ही नहीं सोचते, बल्कि अपने जैसे ही दूसरे छात्रों के बेहतरी के लिए भी सोचते हैं। इसलिए यूजीसी के नेट, जेआरएफ परीक्षा में विकलांग छात्रों के क्वालिफाइंग मार्क्स को SC/ST के बराबर करवाया। जबकि इसके पहले तक वो ज्यादा था। इतना ही नहीं 2012 के स्टूडेंट प्रेसिडेंट के चुनाव में छात्रों का प्रतिनिधि बन उनकी तरह के छात्रों के बेहतरी की तरफ सबका ध्यान खिंचा, तो वहीं दूसरी तरफ 2012 में ही एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस ऑन एजुकेशन में जेएनयू के तरफ से मलेशिया में प्रतिनिधित्व भी किया और कई अवार्ड जीते।

ये सच है कि काबलियत, हूनर खुद ही अपनी सफलता की राह तलाश लेती है और अक्षांश ने भी ऐसा ही किया है। पर सोचने वाली बात है कि क्या अक्षांश जैसे होनहार सभी छात्र इस मुकाम तक पहुंच पाते होंगे? क्या वो अपने सपनों को पुरा कर पाते होंगे? शायद नहीं क्योंकि इनके जैसे छात्र को ये जरूरी नहीं कि हर जगह शिक्षा के अवसर मिल ही जाए। सरकार और समाज ने इनके जैसे छात्रों के लिए कुछ विशेष स्कूल जरूर बनाए हैं। पर जरूरत है इन्हें इस तरह के स्कूल के साथ सामान अवसर भी मिले और शुरूआती शिक्षा के स्तर में भी सुधार हो। खैर बंटी दादा के जज्बे को देख कर ये बात कही-ना-कही सही लगती है खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है...? 

Thursday, 26 November 2015

इसे असहिष्णुता नहीं, असुरक्षा कहिए जनाब!


ये घटना नोएडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन की है... दिन के करीब 12 बजे जब में मेट्रो से उतरा तो स्टेशन के निचे देखा कुछ मनचले लड़के एक लड़की से जबरदस्ती कर रहे थे... पहली नजर में ये मामला मुझे छेड़छाड़ का लगा... मैने पत्रकारिता का धर्म निभाते हुए पहले कुछ तस्वीरें ले ली.... फिर इंसानियत का धर्म निभाते हुए निचे पहुंचा... और उस लड़कों  से  पूछा कि क्या हुआ, तो उसने कहा कुछ नहीं, जाइए आप अपना काम कीजिए....  मैने कहा मेरा यही काम है फिर मैने उस लड़की से पूछा तो वो बोली ये लोग जबरदस्ती अपने ऑटो में बैठने को कह रहा है... जहां जाने का चार्ज 80 रुपया है, ये कहता है मैं 50 में ही ले चलूँगा मैडम.... मैने मना कर दिया तो ये पीछा पड़ गया... बात सही है, अगर दिल्ली-एनसीआर में ऑटो वाले ज्यादा पैसों के बदले कम मांगे तो ये बात आपको हजम नहीं होगी... और फिर उसमें भी जबरदस्ती करें तब तो कुछ गरबर जरूर है... मैने जब ऑटो वाले से पूछा कि क्यू भाई ऐसा क्यों कर रहे हो तुम्हारी ऑटो कंपनी कोई ऑफर दे रही है क्या.... अब तो दिवाली, छठ भी बीत गई तो फिर ये ऑफर क्यों... उसने कहा नहीं सर सुबह से बोहनी नहीं हुआ तो सोचा 50 भी मिल जाए तो क्या बुरा है...  मैने कहा तो फिर ये ऑफर सभी के लिए होगा...  या ये सिर्फ लड़कियों के लिए है... तम्हारे इस ऑफर पर तो 50 लोग जाने को तैयार हो जाएंगे तो फिर जो नहीं जाना चाहता है उससे तुम जबरदस्ती क्यों कर रहे हो या फिर लगाऊ पुलिस को फ़ोन... फिर मैने चार कदम आगे ही वहां कुछ सिक्योरिटी गार्ड को देखा मैने उससे कहा आपलोग यहाँ सुरक्षा देने के लिए हो और आपके सामने जबरदस्ती हो रहा हैं और आप मुह घुमाए खड़े हो.... उसका जवाब आया कि मैने देखा नहीं... मैने कहा ये सब 15-20 मिनट से हो रहा है और आपलोगों ने देखा ही नहीं.... फिर उस लड़की ने कहा नहीं ये देख के चले गए कुछ नहीं कहा... मैने जब उससे पूछा ऐसा क्यों तो उसने कहा क्या करें साहब आप तो यहाँ आए है फिर चले जाएंगे पर मुझे तो यही रहना है इन्ही लोगों के बीच... यानि जो आपकी सुरक्षा के लिए है वही खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता तो वो आपकी सुरक्षा क्या करेंगे? अखिलेश जी आपका भी परीक्षा नजदीक आ रहा है और इस परीक्षा में सुरक्षा ही सबसे बड़ा मुद्दा होगा! 

Monday, 2 November 2015

मोदी का सबसे छोटा फैन


ये दोनों ही घर में "छोटा आतंक" नाम से जाने जाते हैं....  एक मेरा भांजा और दूसरा भतीजा है तो शैतान होना ही चाहिए....  लेकिन शैतान होने के साथ ही ये दोनों जनाब मोदी जी के सबसे छोटे फैन हैं.... बड़ा इसलिए नहीं कहा कि ये लोग अभी खुद छोटे हैं तो छोटा फैन ही होंगे....  अब इसे मोदी जी के ब्रांडिंग का नतीजा कहे या फिर बचपन से ही राजनीति में रुचि....  इन दोनों का उम्र एक का मुश्किल से ढाई साल और दूसरे का साढ़े तीन साल होगा....  इस उम्र में शायद ही मुझे देश के प्रधानमंत्री का नाम पता हो पर इन दोनों को ना सिर्फ देश के पीएम का नाम पता हैं,  बल्कि उन्हें चेहरे से भी पहचानते  हैं....  कही भी पोस्टर दिख जाए तो ये  मोदी सरकार,  मोदी सरकार चिल्लाने लगते हैं..... आसमान में अगर हेलीकॉप्टर दिख जाए या फिर सड़क पर चुनाव प्रचार की कोई गाड़ी तो ये बाहर निकल के मोदी सरकार जिंदाबाद के नारे लगते....  मोदी को देखने की बेताबी इतनी कि अगर घर में खाना ना खाए तो एक बार कह दीजिए कि मोदी आए हैं चलो देखने चलना है तो झट से खाना खा लेते हैं.... यानि हर मर्ज की दवा मोदी.... इन दोनों के शरारत देखिए....  चुनाव प्रचार के दौरान मधुबनी विधानसभा क्षेत्र के आरजेडी प्रत्याशी समीर कुमार महासेठ के पिता और पूर्व मंत्री राजकुमार महासेठ जब हमारे दरवाजे पर आए तो ये दोनों ही मोदी सरकार जिंदाबाद के नारे लगते दरवाजे पर पहुंच गए.... और हा,  एक जनाब को सरकार नहीं कहने आता तो वो "छलकाल" कहते है.... ये देख महासेठ जी को भी एक बार इन बच्चों के साथ मोदी सरकार जिंदाबाद का नारा लगाना ही पड़ा..... क्योंकि उन्हें मैंने पहले ही बता दिया कि आप अगर गलती से भी लालू या किसी दूसरे नेतओं के नाम ले लेंगे तो ये आप पर हमला भी कर सकते हैं....  इसलिए तो "छोटा आतंक" नाम हैं इनका....  वैसे ये तो सिर्फ बचपना है जो सबको अच्छा लगता है..... चाहे वो महासेठ जी के जैसे विपक्षी दल के नेता ही क्यों ना हो..... लेकिन मोदी जी के जो समर्थक हैं वो धीरे-धीरे अंध भक्त होते जा रहे हैं....  जो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है.... अगर आपने इन अंध भक्तों के सामने मोदी सरकार के खिलाफ कुछ कहा, तो आप मुस्लिम हैं तो पाकिस्तानी और हिन्दू हैं तो कांग्रेसी बता दिया जाएगा! 

Sunday, 25 October 2015

चुनावी चौराहा

मैं ये चाहता हूँ  कि हर बिहारवासी मतदान करने से पहले 1 KG दाल और प्याज जरूर खरीदे.... उसके बाद ही वोट दे मेरा दावा है कि वोट सही पार्टी को जाएगा.... ये मैं नहीं बल्कि बिहार के एक वोटर का कहना है.... दरअसल इस चुनावी माहौल में जब मैं आपने गांव के आस-पास के वोटरों से चुनावी चौराहा पर चाय पे चर्चा करने पंहुचा तो वहां कई समुदाय के लोग चाय के दुकान पर बैठ कर चुनाव पर चर्चा कर रहे थे.... कुछ देर तो मैं युही सुनता रहा.... लेकिन फिर मैं भी चर्चा में शामिल हुआ.... उसमें से कुछ बीजेपी के समर्थक थे तो कुछ जेडीयू के तो कुछ लालू जी के.... लेकिन चर्चा मोदी सरकार को लेकर चल रही थी..... कुछ बीजेपी समर्थक मोदी का गुणगान कर रहे थे.... तो कुछ मोदी सरकार की खामियाँ निकाल रहे थे.... मैं मन ही मन सोच रहा था कि मोदी जी को अपना सलाहकार इसी चौराहे से उठाना चाहिए.... खैर मैने जब उनसे वोट के लिए पूछा तो पता चला कि यहाँ एनडीए के ज्यादा समर्थक हैं.... लेकिन कुछ समय बाद ही वहां कुछ जेडीयू-आरजेडी के समर्थक पहुंच गए.... अब टक्कर बराबरी का था.... माहौल बिलकुल चैनल वाला बन गया था.... लेकिन यकीन मानिए चर्चा बहुत शालीनता के साथ हुआ.... एक बात जो तमाम लोगों से बात करके समझ में आई वो ये कि बिहार के माहौल में लालू ही सबसे बड़ा मुद्दा है.... लालू का नाम लिये बगैर नीतीश की चर्चा हो ही नहीं रही है.... यानि नीतीश जीते तो भी लालू फैक्टर और हारे तो भी लालू फैक्टर ही होगा.... वही बीजेपी के पास सबसे बड़ा माइनस प्वाइंट ये है कि इनके पास नेताओं की भरमार तो है..... पर मुख्यमंत्री के लायक घोषणा करने वाला कोई चेहरा नहीं है.... जनता जानना चाहती हैं कि अगर सरकार बनेगी तो उनका मुख्यमंत्री कौन होगा ? विरोधी पार्टी के नेता भी यही पूछ रहे हैं कि नीतीश कुमार के सामने कौन होगा ?  आखिर कब तक एक व्यक्ति के नाम पर चुनाव लड़ा जा सकता है.... लोकसभा चुनाव में जीत के बाद मोदी लहर की सवारी कर बीजेपी ने महाराष्ट्र, हरियाणा में सरकार बना ली.... जम्मू कश्मीर में भी मिली जुली सरकार बनाने में पार्टी कामयाब रही..... लेकिन दिल्ली में बीजेपी को बुरी हार का सामना करना पड़ा..... पर बिहार का चुनाव इन चुनावों से अलग है..... विकास का तड़का लगाकर जातियों को तोड़ने की रणनीति बीजेपी कर तो रही है.... लेकिन उससे कितना फायदा मिलेगा ये 8  नवंबर को ही पता चलेगा!

Saturday, 10 October 2015

केजरीवाल के नाम सोनू का खुला खत

नमस्कार,
मैं सोनू कुमार.....एक साधारण सा पत्रकार....अरविंद केजरीवाल जी, आप से निवेदन है कि इतना भी नाटक ना करें कि 'आम आदमी' खुद को 'आम आदमी' कहने में भी शर्म महसूस करें....मुझे पता है कि पीएम ना बन पाने का दर्द आपको अभी तक हैं....पर अब 4 साल तक तो कुछ नहीं हो सकता ये आपको भी पता है और मुझे भी....तो आप अगर इन 4 सालों को दिल्ली के विकास में लगा दें और बिना किसी शोर-शराबे के चुपके से अपना काम करते रहे तो हो सकता है शायद अगले आम चुनाव में आप पीएम भी बन जाए....पर नहीं, आप तो इस नशे में चूर हैं कि दिल्ली की जनता ने आपको 70 में से 67 सीटें दें दी....अगर काम ना भी करें तो भी ऐसे ही मीठी-मीठी बातें कर के अगले चुनाव में 67 नहीं तो 37 सीटें तो मिल ही जाएगी....लेकिन आप गलत सोच रहे हैं....अगर आप एक बार इतिहास देखें तो शायद आपकी आखें खुल जाए....मुझे लगता है अगर ऐसा ही चलता रहा तो हर सीट पर आपको 67 वोट भी मिल जाए तो बड़ी बात है....खैर मुद्दे पर आते है....दादरी कांड पर सभी पार्टियों ने आपने-आपने तरीके से राजनीति की....सबने जहर उगला....पर आपने जो किया उसके लिए आपको सैलूट है....अगर किसी मुद्दे पर बेहतरीन राजनीति करने के लिए ऑस्कर मिलता तो शायद आपको ही मिलता....आपने जो वहां जा कर स्वीट पॉइज़न उगला वो कबीले तारीफ है....आपने महज 2 मिनट के बाइट में करीब 10 से ज्यादा बार हिन्दू-मुस्लिम शब्द का प्रयोग किया....इससे भी आपका मन नहीं भरा तो आपने दिल्ली वालों के पैसे से नेशनल चैनल पर विज्ञापन तक दे डाला....और फिर इसमें भी आपने अपने मीठे आवाज में जमकर हिन्दू-मुस्लिम शब्द का प्रयोग किया....जिसे ये ना भी पता हो कि किसके बीच दंगा हुआ था....आपने उसे अच्छे से समझा दिया....आप बहुत बेहतरीन बोलते है आपके आवाज का तो मैं कायल हो गया हूँ....ना जाने कहा से इतना दर्द लाते हैं....लेकिन माफ़ी चाहता हूँ.....आप कोई ड्रामा कंपनी नहीं चला रहे....आप देश की राजधानी चला रहे हैं....और आपके इस मीठे बातों में जनता सिर्फ एक बार आ सकती हैं, बार-बार नहीं....उन लोगों से तो इसी तरह की राजनीति की उम्मीद है....पर हम आप से ऐसी राजनीति की उम्मीद नहीं करते थे.....सर, अख़लाक़ को जिसने भी मारा है वो ना हिन्दू हो सकता ना ही मुस्लिम.....वो मानवता और लोकतंत्र का हत्यारा हैं....ऐसा आदमी समाज के लिए खतरनाक है.....चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम.....सिर्फ दादरी कांड ही नहीं आपने पिछले एक साल में हर मुद्दे पर बेहद घटिया राजनीति की हैं....फिर वो चाहे गजेंद्र सिंह की खुदकुशी हो या आनंद पर्वत हत्याकांड हो या फिर एलजी नजीब जंग के साथ जंग करने की बात हो....आपने हर मुद्दे पर बेहद मासूमियत से राजनीति की....पर अफ़सोस आपका असली चेहरा जनता पहचान चुकी हैं....और इसका छोटा सा उदाहरण आपको डूसू चुनाव में दिख गया होगा....हालांकि और भी कई मुद्दे है जिसपर आपने और आपकी पार्टी ने बेहद घटिया राजनीति की....अगर सब बताने लगा तो शायद एक किताब में भी ना आए....क्योंकि इन 2 साल के राजनीतिक करियर में आप और आपकी पार्टी ने सिर्फ नाटक ही तो किया हैं....लेकिन अफ़सोस कि आपको छोड़ कर आपके ड्रामे कंपनी में कोई नाटक भी बेहतर नहीं कर पता....अब देखिये ना जिस लोकपाल के लिए आपने इस्तीफा दिया....वहीं लोकपाल आज आपके पूर्ण बहुमत में होने के बाबजूद भी खटाई में है.....आप तो आम आदमी की सरकार बनाने चले थे....शुरुआत में आपके सरे विधायक मेट्रो और रिक्शा से विधानसभा आने का जो नाटक किया....वो मुश्किल से एक महीना भी नहीं चला सका....अब आपके विधायक जो खुदको आम आदमी बताते हैं....उन्हें पुराने सैलरी से गुजर नहीं हो पता तो अब आपने उनकी सैलरी 50-100 फीसदी नहीं पुरे 400  फीसदी बढ़ने की सोच ली....आम आदमी को तो दिन का 400 रुपया भी नसीब नहीं हो पता साहब....गुलाम अली को मुंबई में आने से शिव सेना ने रोका....जो नहीं होना चाहिए.....हर मुद्दे की तरह सबने इसपर भी राजनीति की.....लेकिन आपने तो सबको पीछे छोड़ते हुए एक कदम आगे बढ़ कर राजनीति की....नीतीश कुमार को आपसे सीखना चाहिए.....चुनाव का मौका है अगर बिहार में 2-4 शो गुलाम अली का वो भी करवा लें तो राजनीतिक फ़ायदा भी मिलेगा और वोटर्स एंटरटेन भी हो जाएंगे.....मेरा आपसे यही निवेदन है कि जितना ध्यान आप इस ओछी राजनीति में लगते हैं....अगर उतना ध्यान दिल्ली के विकास पर लगा दें तो शायद आपको पीएम बनने से कोई नहीं रोक सकेगा....दिल्ली 2 साल पहले जहाँ थी, वहीं है.....ऐसा लगता है मनो 2 साल से इसके विकास की गति को किसी की नज़र लग गई हो....मैं ये नहीं कहता कि पहले दिल्ली बहुत विकास कर रही थी....पर कुछ तो कर रही थी ना....अब आप ये मत कहना कि सब मिले हुए हैं जी....ये बीजेपी या कांग्रेस का आदमी लगता है....मैं आपके जानकारी के लिए बता दूँ कि मैंने आपको ही वोट दिया था....जिसका पछतावा मुझे अब हो रहा है....आप अगर इस पछतावे को आने वाले दिनों में ख़ुशी में बदल पाए तो मुझे आप पर गर्व होगा....एक बात याद रखिये जो अच्छा होता है और जो अच्छा काम करता है उसे विज्ञापन देकर किसी को बताना नहीं पड़ता....और फिर दूसरे पार्टियों के विज्ञापन पर तो आप ही सवाल उठाते थे ना....खैर आशा करता हूँ कि ये खत आप तक पहुंचेगा और आप इसे पढ़ कर नकारात्मक नहीं, सकारात्मक लेंगे....और आगे अच्छा काम करेंगे....अगर नहीं करेंगे तो पता ही है ये जो पब्लिक है ये सब जानती हैं....मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं!

आपका वोटर
सोनू कुमार झा

Friday, 18 September 2015

हां भैया, बिहार में बहार है.....

अभी आप देखें तो लगेगा देश में अगर कहीं बहार है तो सिर्फ बिहार में ही है..... हमेशा यहाँ आपको चुनाव के समय बहार नज़र आ जाएगा.... चाहे वो लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा.....पर इस बार तो हद ही है भैया.... ऐसा लग रहा है मनो बिहार द्रोपती हो और सरे नेता इसके चीर हरण को व्याकुल हो.... जिस नेता या पार्टी का बिहार से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं.... जो कल तक बिहारियों को गली दिया करते थे आज वो भी तमाम चैनलों पर खुद को बिहारियों का रहनुमा बताने को व्याकुल हैं..... देश के पीएम को तो लगता है जैसे बिहार चुनाव जीतना ही उनका एक मात्र लक्ष्य हैं और ये चुनाव जीतते ही वो पीएम पद से इस्तीफा देकर बिहार के सीएम बन जाएंगे.... वैसे मोदी जी बिहार चुनाव इसलिए भी जीतना चाहते हैं..... ताकि नीतीश बाबू को दिखा सकें कि "जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा"! वहीं नीतीश बाबू मोदी जी को अपना 10 का दम दिखाना चाहते हैं..... लेकिन घबराहट में आके एक गलती तो उन्होंने कर ही दी, लालू को साथ लेकर....दरअसल बिहार की जनता नीतीश कुमार को आपने सीएम के रूप में पसंद तो करती हैं....पर लालू के साथ जाने से अब वो एक पसोपेश में है....लालू की छवि बिहार की जनता में जंगलराज की बानी हुई है....और नीतीश कुमार के इसी कमजोर नस को दवा के बीजेपी पार पाना चाहती है....बीजेपी की रणनीति है कि वो लालू के जंगलराज की छवि को जोर-शोर से उठाए....क्योंकि अगर वो नीतीश को ज्यादा तबज्जो देती है तो नीतीश का जो गुड गवर्नेंस रहा है वो हाईलाइट होगा जो बीजेपी कभी नहीं चाहेगी.....खैर अब सुनने में आ रहा है कि हार्दिक पटेल भी वहां रैली करने जा रहे हैं..... हालांकि वो चुनाव तो नहीं लड़ेंगे.... पर ये एक चुनावी रैली से कम भी नहीं होगा..... ऐसा नहीं है कि सिर्फ नेताओं को ही बिहार में बहार नज़र आ रहा हो..... न्यूज़ चैनल वाले भी इसे खूब भुना रहे हैं पिछले कुछ समय से चैनलों पर बिहार छाया हुआ है और यकीन मानिए अभी नवंबर तक बिहार में ये बहार रहने वाला है..... उसके बाद भगवन ही जाने बिहार का क्या होगा? बहरहाल हर बार की तरह इस बार भी बिहार में जाती का मुद्दा हावी है....अब देखना दिलचस्प है कि वहां इस बार किसकी दीवाली होती है....हालांकि जिसकी भी दीवाली हो.....पर दिवाला तो सिर्फ बिहारियों का ही निकलने वाला है.....क्योंकि इस बार दोनों ही कुनबे में 5 साल तक सरकार चलने की कुव्वत नहीं है....चलते-चलते दो लाइने कहना चाहूंगा!
द्रोपदी बना है बिहार सब चीर-हरण को व्याकुल है !
कृष्णा बनकर आ जाओ तुम, बिहारी तुम्हारा गोकुल है !

Saturday, 29 August 2015

कह देना "छेनू" आया था!


कल मैं ABP News पर प्रेस कॉन्फ्रेंस देख रहा था बिहारी बाबू यानि शत्रुघ्न सिन्हा जी गेस्ट थे.... बड़े ही बेबाकी से जवाब दे रहे थे.... जब लास्ट में उन्हें एक डायलॉग बोलने को कहा गया.... उन्होंने अपना फेमस डायलॉग "छेनू" वाला बोला.... लेकिन जब वो डायलॉग बोल रहे थे तो मेरे आखों के सामने एक दृश्य चल रहा था..... वो कुछ इस तरह था!
अमित शाह और अरुण जेटली जी बैठे थे....
शत्रुघ्न सिन्हा वहां पहुँचते हैं और पूछते हैं कि मोदी कहां हैं ?
अमित शाह, मोटा भाई तो अभी नहीं हैं.... वो बिहार के लिए जुमला बनवाने गए हैं....
शत्रुघ्न सिन्हा, आए तो कह देना कि छेनू आया था.... और नीतीशवा को अच्छा सीएम बताया था....
अमित शाह कुछ बोलने की कोशिश कर ही रहे थे कि सिन्हा जी बोल पड़े "खामोश" !!!

Saturday, 15 August 2015

फेसबुकिया देशभक्त

मैं सोच रहा था कि अगर आज हमारा देश गुलाम होता तो शायद फेसबुक और ट्विटर पर ही देशभक्ति देख कर अँगरेज़ भाग गए होते....दरअसल सभी फेसबुकिया देशभक्त को लगता हैं जबतक हम फेसबुक या ट्विटर पर 'गर्व से कहो हम हिंदुस्तानी हैं' का नारा नहीं लगते तबतक हम सच्चे देशभक्त नहीं कहलाते.....आज़ादी की शुभकामना तक तो ठीक हैं पर वो सन्देश भी देने लगते हैं.....जिन्हें ठीक से 10 स्वतंत्रता सेनानी का नाम भी पता न हो वो भी हमे देशभक्ति सीखने लगते हैं.....आरे भाई गर्व से फेसबुक या ट्विटर पर हिंदुस्तानी कह देने से तस्वीर नहीं बदलती.....एक हिंदुस्तानी को अपने हिंदुस्तानी होने का गर्व दिल में  होना चाहिए.....जोकि शायद हर हिंदुस्तानी में हैं.....और जिनमें  नहीं हैं वो देश छोड़ कर जा रहे हैं.....देश छोड़ने से याद आया कि बीते 10 सालों में आपने देश से करीब साठ हजार अरबपति देश छोड़कर चले गए और विदेशों में जा बसे.....उन्हें अब ये देश गरीब लगता हैं.....आरे भाई  इसी देश ने तो तुम्हें इस लायक बनाया कि तुम अब विदेश में भी जके आराम से रह सको.....खैर इन नालायकों को कौन समझाए.....जो लायक बन जाने के बाद आपने माता-पिता को भी छोड़ देते हैं और जो आपने माता-पिता को छोड़ सकते हैं उनसे आप उम्मीद ही क्या रख सकते!

Friday, 14 August 2015

'अन्नदाता' की अनदेखी


हैं सरसों उगाता वो....खाने में खुद प्याज और सुखी रोटी खता!
काश कोई खुशहाली उसके घर भी लाता.....वो किसान जो हर रोज हल चलता!
देश के विकास में किसान और जवान की भूमिका को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया था.... जिसका लोहा पूरे विश्व ने माना था.... आज वहीं किसान हाशिए पर है.... आजादी के 68 साल बीतने के बाद भी किसी ने किसानों की सुध नहीं ली.... इतने सालों में कई सरकारें बदली, मंत्री बदले, पर नहीं बदले तो किसान के हालात.... राजनेता संसद के अंदर और बाहर एक-दूसरे पर किसानों की अनदेखी का आरोप लगा रहे, लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के हाथ खून से सने हैं.... किसानों की आत्महत्या कोई ताजा मामला नहीं है....  भारत में विकास दर और जीडीपी के आकड़े यू तो देखने में बड़े अच्छे लगते है... लेकिन सच्चाई ये है कि एक तरफ जहां हर आधे घंटे में भारत की जीडीपी में अरबों रूपए जुड़ जाते है.... तो वहीं दूसरी तरफ हर आधे घंटे में एक किसान खुदकुशी कर लेता हैं.... यनि हर रोज करीब 50 किसान खुदकुशी करता है.... जिसका सीधा असर उन 50 परिवारों पर परता है जो उनसे जुड़े है.... किसानों के लिए खेती धीरे-धीरे जुआ साबित हो रहा है....National Crime Records Bureau के आकड़े बताते है कि पिछले 20 सालों में  296,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.... अगर सिर्फ इस साल की बात करें तो इस सल भी अब तक 1400 से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं.... एक तरफ देश के अन्नदाता परेशान है... लेकिन हमारी सरकार मदद करने के जगह उसके जख्मों पर नमक छिड़कती है... हाल ही में देश के कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने संसद में बयान दिया कि अधिकतर किसानों के मौत का कारण प्रेम-प्रसंग, दहेज और नपुंसकता रहा है.... यानि देश के किसानों कि हालत कैसे सुधरे ये सोचने के बजह सारी सरकारें इस पर सिर्फ राजनीति करते दिखती हैं... वहीं भूमि अधिग्रहण कानून से किसका हित सधेगा ये सबको पता है.... एक तरह से इस कानून के तहत सरकार की योजना किसानों से जबरन जमीन ले के उद्योगपति को देने की है.... सरकार का मानना है कि बिना जमीन के विकास कैसे हो सकता है.... ऐसे में नए परियोजनाओं पर ब्रेक लग जाएगा.... लेकिन सच्चाई कुछ और ही है... खुद वित्त मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि केवल आठ फीसदी परियोजना ही जमीन की वजह से लंबित है.... हलांकि किसानों और विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बाद सरकार ने इस बिल को वापस ले लिया.... लेकिन एक बात तो साफ है कि सारी सरकारें सिर्फ अपना हित साधना चाहती है.... हर कोई सिर्फ किसानों को राजनीतिक रंग देना चाहता है.... किसी को किसानों की हालात सुधारने की मंशा नहीं दिखती.... अगर अपको किसान के जिंदगी से जुड़ी सच्चाई को गहराई से जानना हो तो एक बार मदर इंडिया फिल्म जरूर देखिए.... इस फिल्म में किसानों की बदहाल और दर्दनाक तस्वीर देख कर आपकी आंखें भर आएंगी.... फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक किसान साहूकार के हाथों कर्ज के बोझ से दबता चला जाता है और उसकी खुद की जिंदगी ही नहीं बल्कि पूरा परिवार तबाह तो जाता है... आज की तारीख में किसानों की हालात उसी फिल्म के सिनेमाई किरदारों की तरह हो गई है.... खैर सवाल उठता है कि किसानों की हालात आखिर सुधरेगी कैसे.... कैसे किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर निकल पाएगा.... मेरा मानना है कि किसान चैनल या कम ब्याज पर ऋण की सुविधाएं बढ़ाने मात्र से किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सकते.... सच्चाई ये है कि किसानों को कर्ज नहीं, आमदनी चाहिए.... लगातार कम होती आमदनी किसानों की सबसे बेड़ी समस्या हैं.... साल 2014 की एनएसएसओ रिपोर्ट के मुताबिक खेती से एक किसान को हर महीने केवल 3,078 रुपए की आमदनी होती है.... जो कि आज के लिए पर्याप्त नहीं है.... इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं होनी चाहिए कि देश के 58 फीसदी किसान भूखे पेट सोने को मजबूर हैं.... जिस कारण 76 फीसदी किसान रोजगार का विकल्प मिलने पर खेती छोड़ने को तैयार हैं.... काफी अध्ययन के बाद पता चला कि साल 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपए प्रति क्विंटल था.... आज यह 1450 रुपए प्रति क्विंटल है यानि बीते 45 सालों में इसमें करीब 19 गुणा वृद्धि हुई है.... इससे किसानों की बढ़ी आमदनी की तुलना दूसरे तबकों के वेतन में हुए इजाफे से करें तो.... इन सालों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तनख्वाह 110 से 120 गुणा, स्कूल शिक्षकों की 280 से 320 गुणा और कॉलेज शिक्षकों की 150 से 170 गुणा बढ़ी है.... कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वालों की आमदनी 350 से 1000 गुणा तक बढ़ गई है.... वहीं केंद्रीय कर्मचारियों को जल्दी ही अब सातवें वेतन आयोग के रूप वेतन और भत्ते मिलेंगे.... इसमें सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी का वेतन भी 26 हजार रुपए महीने करने की मांग हो रही है.... ऐसे में सिर्फ किसान ही क्यों अपने हक से बंचित है.... क्या किसानों का हक नहीं हैं कि उनके पास भी स्मार्ट फोन, लेपटॉप और गाड़ी हो.... बिडम्वना है कि हमारे देश में अगर किसी किसान के पास ये सब सुबिधा हो तो उसे किसान नहीं मानते.... हम किसान का मतलब सिर्फ एक गरीब किसान ही क्यों समझते हैं... इन 45 सालों में अगर आप सबसे कम वेतन वृद्धि के आधार पर भी देखें तो किसानों के गेहूं के मूल्य में कम से कम 100 गुणा इजाफा होना चाहिए.... इसका मतलब यह कि प्रति क्विंटल गेहूं के लिए किसान को 7,600 रुपए मिलने चाहिए, लेकिन अभी उसे केवल 1450 रुपए मिल रहा है.... हम मानें या नहीं मानें,लेकिन यह उसका हक है.... हम सालों से किसानों को बेहतर कमाई से वंचित करते रहे हैं.... और खाद्यान्न महंगाई के लिए किसानों को दंडित किया गया.... लेकिन अब वक्त आ गया है कि इनके बारे में भी सोचा जाए.... हलांकि मैं यह नहीं चाहता कि खाद्यान्न की कीमतें आसमान छूने लगें.... लेकिन मेरा मानना है कि सारा बोझ गरीब किसानों के ऊपर डालने की बजाय उसे फसलों की ज्यादा कीमत मिलना चाहिए.... फिर कृषि उत्पादों को सब्सिडी के दायरे में ले आएं जिससे आम उपभोक्ताओं को भी ज्यादा कीमत न देनी पड़े.... आखिर कई अमीर देशों में ऐसा ही होता है.... खेती से होने वाली आमदनी में इजाफा नहीं हुआ तो किसानों के लिए कोई उम्मीद नहीं हो सकती.... उत्पादकता बढ़ाने या सिंचाई के साधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की सलाह देने से खास फायदा नहीं होगा.... क्योंकि ये सब तो सिर्फ नई तकनीकों को बेचने के तरीके हैं.... इसके अलावा मेरा मानना है कि उद्योगों को मिलने वाली मदद राशि का यदि एक हिस्सा भी किसानों को दिया जाए तो उनके आर्थिक सपने साकार हो सकते हैं.... पिछले 10 सालों में उद्योगपतियों को 42 लाख करोड़ रुपये की कर छूट दी गई.... 2015 के बजट में 5.90 लाख करोड़ कर राहत दी गई, फिर भी औद्योगिक उत्पादन नहीं बढ़ सका और पर्याप्त रोजगार सृजन में यह क्षेत्र विफल रहा.... अगर इस में से सिर्फ 2 लाख करोड़ रुपये हर साल कृषि को दिया जाए और उसका सार्थक उपयोग हो तो न केवल लाखों की संख्या में रोजगार सृजन होगा, बल्कि देश के हर क्षेत्र में विकास हो सकेगा.... आखिर भारत में आर्थिक विकास का रास्ता देश के 60 करोड़ किसानों और 6.4 लाख गांवों से होकर ही गुजरता है.... पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी अपने किताब में देश को विकसीत बनने के लिए जिन पांच चीजों का जिक्र किया है उसमें कृषि ही सबसे उपर है... इसलिए बिना कृषि के कभी मेक इन इंडिया का सपना पूरा नहीं हो सकता.... करीब तीन दशकों से भारत का ग्रामीण समाज ढह रहा है.... लेकिन हमे डीजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी के सपने दिखाए जा रहे है.... बहरहाल नई सरकार से किसानों को काफी उम्मीदें है.... आखिर कई दशक बाद देश में पूर्ण बहुमत की सरकार आई है.... और अपने चुनाव अभियान में मोदी ने कृषि को आर्थिक रूप से उपयोगी बनाने का वादा भी किया था.... कुल लागत पर 50 फीसद का मुनाफा किसानों को दिलाने की बात कही थी.... देश में जहां कहीं भी गए भयावह कृषि संकटग्रस्तता की बात की थी.... उन्होंने गन्ना किसानों की बात की, कपास किसानों की बात की.... बार-बार कृषि समृद्धता की बात की.... अब वहीं किसान पूछ रहे हैं क्या हुआ मोदी के उन वादों का.... कहीं ये भी चुनावी जुमले तो नहीं थे.... ये सही समय है जब किसानों के हितों में कदम उठाना होगा.... अगर सरकार सच में देश को विकसित देखना चाहती है तो सबसे पहले उसे किसानों को खुश करना होगा.... तभी वास्तव में सबका साथ, सबका विकास हो पाएगा।

Tuesday, 4 August 2015

राजनीति में संवादहीनता

वक्त बदला, सरकार बदली, विपक्ष बदला, पर नहीं बदला तो संसद का चेहरा.... जी हां... वहीं रोज के हो हल्ले, रोज के हंगामे और संसद की कार्यवाही ठप्प.... फर्क सिर्फ इतना है कि जब यूपीए की सरकार थी तब बीजेपी के सांसद, संसद नहीं चलने देते थे.... अब जब एनडीए की सरकार है तो इस काम का जिम्मा कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों ने उठा लिया है.... दरअसल पांच साल की सरकार में राजनीति ऐसे ही चला करती है... बीच में कोई पिसता है तो वो है जनता.... पर जनता को किसे फिक्र है इन नेताओं को तो सिर्फ अपनी राजनीति चमकानी है... हंगामे के चलते सदन में कोई महत्त्वपूर्ण काम नहीं हो पा रहा... कुछ जरूरी विधेयकों पर चर्चा लगातार टल रही है.... ऐसे में विपक्ष से सहयोग की अपेक्षा स्वाभाविक है.... आखिर संसद चर्चा का मंच है, सरकार के खिलाफ नारेबाजी का नहीं.... लेकिन इस मामले में सरकार से भी लोकतांत्रिक रवैए की अपेक्षा की जाती है.... आखिर संसद में कामकाज का माहौल बेहतर बनाने की जिम्मेदारी उसी की है.... जब से मानसून सत्र शुरू हुआ है, विपक्ष सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे सिंधिया और शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफे की मांग पर अड़ा हुआ है.... कांग्रेस की दलील है कि विपक्ष के रूप में उसने वही स्टैंड अपनाया है जो कभी बीजेपी अपनाया करती थी... उधर विपक्ष के इस रुख से सरकार को रत्ती भर चिंता नहीं.... उसकी कोशिश विपक्ष पर जवाबी हमला बोलने और उसे विकास में बाधक बताने की है... वह शुरू से ही विपक्ष को छकाने की मंशा से रणनीति बनाती रही है.... फिर जहां तक राजनीति का सवाल है, तो उसका तकाजा है कि अड़े रहो.... झुको मत, अगर एक बार झुके तो फिर झुकते रहना होगा और शायद इसलिए सरकार झुकना नहीं चाहती... लेकिन इन सबके बीच उन सावा-सौ करोड़ जनता का क्या.... जो तरह-तरह के मुद्दों पर सरकार से जवाब का इंतज़ार कर रही है... छात्र लाठियां खा रहे हैं... सैनिक अपनी पेंशन का इंतज़ार कर रहे हैं... बाढ़ की समस्या मुह बाए खड़ी है... किसानों के मुआवज़ा मिलने का मुद्दा कहां गया.... वो किसी को पता नहीं.... इससे यही लगता है कि हमारा विपक्ष आलसी हो चला है.... वो नए तथ्यों की तलाश में अपना पसीना नहीं बहाना चाहता.... और सिर्फ विपक्ष होने के नाते अपना विरोध दर्ज कराना चाहती है... साफ है सत्ता और विपक्ष, दोनों अधिक से अधिक आक्रामक दिखना चाहते हैं... कहने को बीजेपी संसद में बहस कराने को उतावली तो दिख रही है, पर बहस के नतीजों को लेकर उसमें घबराहट भी साफ देखी जा सकती है.... बहरहाल भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक संवाद की जमीन पिछले तीन-चार सालों में जितनी कम हुई है, उतनी शायद इमर्जेंसी को छोड़कर पहले कभी नहीं रही.... जब दोनों पक्षों के वोट संवादहीनता से ही निकलते हों तो संसद चले या चले, किसे पड़ी है।