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Friday, 15 August 2014

मुलायम ने ही क्यों की पहल

मुलायम के लिए सत्ता सबकुछ है.... लेकिन मेरे लिए मान-सम्मान.... यह सुवाक्य उत्तरप्रदेश की बीएसपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का है.... जब लालू-नीतीश की जोडी ने एक कार्यक्रम के दौरान अपनी तरह मुलायम-माया को भी एकजुट होने का गुरुमंत्र दिया, तो मायावती पर तो इसका असर नहीं हुआ लेकिन मुलायम लालू-नीतीश के मंत्र से मंत्रमुग्ध हो गये और उसने मायावती के सामने एकजुट होने का प्रपोजल रख दिया.... लेकिन मायावती ने दो टूक कह दिया कि मुझे यह प्रस्ताव मंजूर नहीं  है, मेरे लिए सत्ता नहीं मेरा मान सम्मान बडा है..... दरअसल, मायावती के साथ उनका करीब 20 फीसदी दलित वोट बैंक उनके साथ है.... मायावती की सोंच रही होगी कि अगर अल्पसंख्यकों का भी सहयोग उन्हें मिल जाता है, तो बीजेपी को पराजित करने के लिए उनके पास बेहतर विकल्प हो सकता है.... ऐसे में वह मुलायम के साथ गठबंधन कर नहीं चाहती होगी कि उसकी खुद की राजनीतिक क्षमता पर कोई सवाल उठे.... जिस दलित वोट बैंक की बदौलत मायावती अपने आप को हमेशा से एक मजबूत दावेदार मानती रही है..... ऐसे में माया ने मुलायाम को न कहकर अपने वोट बैंक को साफ आश्वासन दिया है कि उन्हें कहीं जाने की कोई आवश्यकता नहीं है.... वो अभी भी उनके हित के लिए... उनके साथ खडे हैं.... उन्हें बिखरने की कोई जरूरत नहीं है..... यह सच है कि इस लोकसभा चुनाव में बीएसपी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा... लेकिन आंकड़े बतातें हैं कि फिर भी उनका वोट फीसदी कम नहीं हुआ है... शायद मुलायम मुस्लिम वोटरों को यह संदेश देकर उससे सहानूभूति हासिल करने की कोशिश की कि वह बीजेपी जैसी तथाकथित सांप्रदायिक पार्टी को मात देने की लिए मायावती जैसी कट्टर राजनीतिक दुश्मन से भी समझौते के लिए तैयार है.... हलांकि इसके पिछे एक कारण और भी हो सकता है.... वो ये कि सपा अपने आप को यूपी में बीजेपी का मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी साबित करना चाहती हो.... और चाहती हो कि वह हर हाल में यूपी में बीएसपी से ऊपर रहे.... इस तरह मुलायम ने इस पहल के साथ एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश की है.... बहरहाल इसके पिछे का सच जो भी हो.... लेकिन इतना तो तय है कि मुलायम के प्रस्ताव को खारिज कर मायावती ने फिर से अपने बुलंद इरादों का परिचय दिया है.... अब इस फैसले के बाद यूपी में मायावती का 'मान-सम्मान' कितना बचता है... वह आगे होने वाले विधान सभा चुनाव में ही तय होगा।

अवसरवादिता की राजनीति

लोकसभा चुनाव में हार के बाद कैमरे के सामने पहली बार नीतीश के चेहरे पर मुस्कान दिख रही थी.... आखिरी बार तेइस साल पहले 1991 के लोकसभा चुनाव में लालू और नीतीश ने साथ प्रचार किया था..... इस तेइस साल में काफी कुछ बदल गया..... लालू का साथ छोड़ने के बाद सत्रह साल तक नीतीश बीजेपी के साथ रहे..... बिहार में मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र में मंत्री तक बने.... लेकिन जब लालू के साथ मिलकर जिस कदर उन्होंने बीजेपी पर हमला बोला उसे मौकापरस्ती से अलग नहीं रखा जा सकता..... नीतीश बीजेपी को ये कहकर कोसते रहे कि इनके पूर्वजों का देश की आजादी में कोई योगदान नहीं रहा है..... नीतीश जी सत्रह साल तक इसी बीजेपी के साथ रहकर इनका गुण गाते थकते नहीं थे..... मौकापरस्ती ही कहेंगे कि जिन लालू के जंगल राज से लड़कर बिहार की सत्ता पर काबिज हुए थे, अस्तित्व बचाने के लिए आज उसी के गुण गा रहे हैं..... दोस्ती दिखाने के लिए लालू और नीतीश ने जिस हाजीपुर को चुना वो शहर लोकतंत्र की जननी और वैशाली का जिला मुख्यालय है.... इसी शहर से रामविलास पासवान जीतकर संसद पहुंचे हैं.... पासवान कभी लालू और नीतीश के साथी हुआ करते थे.... मंडल के जमाने में लालू-नीतीश-पासवान की तिकड़ी थी..... लेकिन आज तस्वीर कुछ अलग है.... अब बिहार में लालू-नीतीश, और कांग्रेस मिल के तिकड़ी बनाई है.... और पासवान बीजेपी के साथ है.... दरअसल, लोकसभा में मिली करारी हार के बाद लालू और नीतीश ने हाथ मिलाया है.... लोकसभा चुनाव में लालू की पार्टी को करीब 20 फीसदी और नीतीश की पार्टी को करीब 16 फीसदी वोट मिले थे.... कांग्रेस और एनसीपी को मिले वोट को अगर इसमें जोड़ दें तो ये आंकड़ा 45 फीसदी का हो जाता है.... ये वोट बीजेपी को मिले 39 फीसदी वोट से 6 फीसदी ज्यादा हैं.... हलांकि ये मान लेना कि लोकसभा में जो वोट बीजेपी गठबंधन को मिले वही वोट विधानसभा में भी मिलेंगे ठीक नहीं होगा..... यही बात लालू और नीतीश गठबंधन के लिए भी है..... लोकसभा चुनाव में लालू और नीतीश अलग अलग लड़ रहे थे..... इन दोनों के साथ आने का फायदा है, तो नुकसान भी है.... लालू की छवि विकास विरोधी की रही है.... लालू के कथितजंगल राज के जमाने को लोग भूले नहीं हैं..... विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर सवर्णों के वोट जेडीयू उम्मीदवार को मिले थे.... लेकिन लालू के साथ आने से नीतीश को इसका नुकसान उठाना पड सकता है..... नीतीश और लालू के साथ आने से बीजेपी का सवर्ण और वैश्य वोट और एकजुट हो सकता है.... हलांकि लालू-नीतीश गठबंधन को यादवमुस्लिम और कुर्मी का वोट मिलना तय है.... कोइरी उपेंद्र कुशवाहा के बहाने बीजेपी के पास जा सकता है.... तो अति पिछड़े और दलितों में फूट का फायदा बीजेपी को होगा.... लेकिन अब तक होता ये रहा है कि सवर्ण और बाकी ताकतवर जातियों के प्रभाव में आकर कमजोर तबके का वोट बीजेपी गठबंधन को मिलता रहा है.... इसी वजह से 2010 के चुनाव में बीजेपी और जेडीयू को 200 से ज्यादा सीटों पर जीत मिली थी..... जरूरत दोनों को है लेकिन पर्दे के सामने जो दिख रहा है उसमें लालू नीतीश पर भारी पड़ रहे हैं..... 10 सीटों पर 21 तारीख को वोटिंग है..... बीजेपी के कब्जे वाली 6 और आरजेडी के कब्जे वाली 3 सीटें इसमें शामिल है..... इसमें 1 सीट जेडीयू के पास थी..... इसमें सबसे ज्यादा खोने के लिए बीजेपी के पास है..... और पाने के लिए नीतीश के पास..... इससे साफ जहीर है कि इस गठबंधन की लालू से ज्यादा जरूरत नीतीश को है.... नीतीश अगर लालू से हाथ नहीं मिलाते तो बहुत मुमकिन था कि अगले चुनाव आते-आते वो कहीं के नहीं रह जाते.... यही वजह है कि हाजीपुर के मंच पर नीतीश लालू के सामने लोटे नजर आए.... यही लग रहा था कि लालू दाता की भूमिका में हैं और नीतीश याचक की भूमिका में.... बहरहाल इस गठबंधन से हो सकता है कि उपचुनाव में लालूनीतीश को बीजेपी से ज्यादा सीटें मिल जाए.... लेकिन अगले साल यही परिणाम दोहाराया जाएगा इसको मान लेना कहीं से भी बुद्धिमानी नहीं होगी।