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Wednesday, 2 July 2014

काश के ऐसा होता !



फुटबॉल का जादू पूरी दुनिया में सिर चढ़कर बोल रहा है.... अख़बार, टीवी चैनल या फिर सोशल मीडिया सभी फुटबॉल की खबरों से पटे हुए हैं.... भारत भी फुटबॉल के फीवर में तप रहा है.... लेकिन जिस देश में क्रिकेट को किसी धर्म के तरह माना जाता है उस देश के फुटबॉल प्रेमियों को दूसरे देशों के खिलाड़ीयों के हार-जीत पर खुश या मायूस होना पड़ता है.... हलांकि जिस दौर में मेजर ध्यानचंद की हाकी को लेकर दुनिया भर में धमक थी... उसी दौर में भारत की फुटबाल टीम की भी अपनी धमक थी.... इस समय फीफा की रैंकिंग में भारतीय टीम का 154वां स्थान हैं.... लेकिन आपको जान कर हैरानी होगी कि ब्राजील में साल 1950 में हुए विश्व कप फाइनल में खेलने का मौका भारत की फुटबाल की टीम को मिला था.... भारत की टीम को बाकायदा न्यौता भेजा गया था.... भारत ने ओलिंपिक में फुटबाल में चौथा स्थान हासिल किया था... और एशियाई खेलों में तो सोना जीता था.... भारत को तब उस ग्रुप में रखा गया था.... जिसमें इटली, स्वीडन और पेरुग्वे की टीमें शामिल थी.... दरअसल दूसरा विश्व युद्द खत्म होने के बाद विश्व कप हुआ था और एशिया से बर्मा और फिलीपिंस की टीमों ने क्वालीफाई किया था.... लेकिन दोनों देशों ने पैसों की कमी के कारण ब्राजील जाने से मना कर दिया था.... तब भारतीय टीम को न्योता भेजा गया था.... निमंत्रण अंतिम समय में मिलने के कारण भारतीय फुटबाल फैडरेशन के पास ब्राजील टीम भेजने के लिए पैसा नहीं था, जिस कारण भारत इस मौके का फायदा नहीं उठा सका.... दरअसल, भारतीय फुटबाल फैडरेशन समझ ही नहीं सकी की वो किस स्वर्णिम मौके का गंवा रही है.... अगर फैडरेशन ने दूरदर्शिता दिखाई होती और टीम को भेजा होता तो तय है कि आज नजारा दूसरा ही होता..... हो सकता है कि भारतीय फुटबाल प्रेमी रात-रात भर जाग कर मैसी या नैमार या रोनाल्डो के बजाए किसी भारतीय खिलाड़ी के कौशल देखने के लिए राते काली कर रहे होते..... खैर, सच्चाई तो यही है कि भारत की टीम 1950 के फुटबाल विश्व कप नहीं खेल पाई.... आज भी हमारे यहां बंगाल, केरल और गोवा में खासतौर से फुटबाल खेली जाती है.... उत्तर पूर्व के कई राज्यों में भी फुटबाल का चलन है.... लेकिन फुटबाल में एशिया छोड़िये सार्क देशों को भी पीटने की हालत में नहीं है.... टाटा फुटबाल एकेडमी भी बनी है.... फुटबाल के विदेशी कोच भी बुलाए गये हैं.... विजयन और बाइचिंग बूटिया जैसे खिलाड़ी भी हाल के सालों में हमें मिले हैं... जो नौजवान पीढ़ी के लिए प्रेरणा बने हैं.... लेकिन हमारी फुटबाल और यूरोप या अफ्रीकी देशों की फुटबाल में अभी भी जमीन आसमान का अंतर है.... कोलकाता में मोहन बगान और ईस्ट बंगाल के मैच देखिए या गोवा में डेम्पो या सल्गावकर स्पोर्टसे क्लब के मैच देखिए और फिर तुलना कीजिए योरोपिन टीमों से.... अंतर साफ हो जाता है.... ऐसा लगता है कि भारतीय युवा फुटबाल प्रेमी पीढ़ी को अभी कई दश्क तक किसी मैसी, किसी नैमार या फिर किसी रोनाल्डो का खेल देखने और उसकी हार-जीत पर खुश या मायूस होते बिताने पड़ेंगे।