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Friday, 21 March 2014

बीजेपी में मचा घमासान

बीजेपी में हो रही उठापटक एक नए तरह के बदलाव की ओर इशारा कर रही है.... एक के बाद एक रूठते जा रहे वरिष्ठ नेता धीरे-धीरे हाशिए पर जाते नजर आ रहे हैं.... किसी को मनचाही सीट नहीं मिल रही है तो किसी को पुरानी सीट छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है.... कोई खुलेआम पार्टी को अल्टीमेटम दे रहा है तो कोई धरना प्रदर्शन में जुटा है.... यह अलग बात है कि बड़े नेता मुखर होकर कुछ बोल नहीं रहे, फिर भी किसी न किसी रुप से उनकी नाराजगी व्यक्त हो ही जाती है.... पहले जोशी वराणसी सीट के लिए अड़े रहे, फिर आडवाणी और अब जसवंत सिंह, वनारस में तो मोदी, जोशी के समर्थकों के बीच शक्ती प्रदर्शन जैसी हालात भी पैदा हो गई थी.... कमोबेश यही स्थिती देश के बाकी के हिस्सों में भी देखी जा रहा है.... तमाम लहर के बावजूद बीजेपी के कई नेता सुरक्षित सीटों के तलाश में है, गुजरात बीजेपी नेताओं के बुलावे के बावजूद आडवाणी वहां से लड़ने को इच्छुक नहीं है.... डर है भितरघात का..... उस सीट पर उन्हें कांग्रेस से खतरा नहीं है और न ही आम आदमी पार्टी से, डर तो अपनों से है..... उन्हें अच्छी तरह पता है कि अगर वह इस चुनाव में हार गए तो उनके राजनीतिक जीवन का अंत हो जाएगा, वह जीवन जो छह दशकों से भी लंबा चल रहा है...... आडवाणी को इस पार्टी को आज के रूप में बनाने और संवारने का श्रेय जाता है.... लेकिन वक्त भी कितना निर्मम होता है, जिस पार्टी को उन्होंने मजबूत बनाया, सत्ता के करीब पहुंचाया वहां वह आज अलग-थलग खड़े हैं..... दरअसल, बीजेपी में दो धाराएं स्पष्ट है.... मोदी और उनके समर्थक पूरी तरह पार्टी पर हावी है और सारे फैसले अपने हिसाब से कर रहे हैं.... संघ ने भी उन्हें मोटे तौर पर इसकी छुट दे रखी है.... दूसरे तरफ पार्टी के कुछ पूराने नेता है जो फिलहाल डिफेंसिव रोल में चले गए है..... माना जा रहा है कि मोदी ना सिर्फ चुनाव बल्कि उसके बाद की भी परिस्थितीयों को भी ध्यान में रख कर दाव चल रहे है.... वो चाहते है कि पार्टी में उनके अलावा कोई और ध्रुव न बचे.... ऐसा ना हो 272 जादूई आकड़ों से दूर रहने पर दूसरी पार्टीयां बीजेपी से कोई ऐसी डील न कर ले, जिससे मोदी को दरकिनार ही कर दिया जाए.... मोदी जानते है कि नीतीश और एनडीए के कुछ और पूराने घटक को केवल उनसे ही परहेज हैं.... इसीलिए मोदी अपने राह के रोड़ों को पहले से ही हटाने में जुटे हैं.... शायद यही वजह है कि पार्टी में चल रही विचारधारा और महात्वाकांक्षा की लड़ाई हर बार सतह पर आ जाती है और ऐसे में ये भी तय है कि फिलहाल देश में चल रही मोदी की लहर पर बह कर जो नेता पार्टी की तरफ आ रहे हैं वही अगर लहर खत्म हो जाती है तो उल्टे पैर लौट भी सकते हैं...ऐसे में पार्टी का अंतर्विरोध पार्टी को कहां ले जाएगा ये देखने वाली बात होगी...।




Tuesday, 18 March 2014

हिंदुत्व का त्रिकोण


चुनावी मौसम में मोदी बनारस आए तो थे समर्थकों और बाबा विश्वनाथ का अलख जगानेमगर खुद ही बनारसी बाबू बनकर गए.... और आखिरकार लम्बें जद्दो-जहद के बाद उन्हें बनारस का टिकट मिल गया.... क्या हुआ जो बनारस सीट के पुराने साधक मुरली मनोहर जोशी खफा हैंमोदी के बढ़ते बनारस मोह के आगे जोशी का भी जोश ठंढ़ा पर गया..... पार्टी के पीएम उम्मीदवार को ये सीट भा गई, सो भा गई.... अब क्या फायदा ये सवाल उठाने का कि जब पूरे देश में मोदी की लहर हैतो नजर सिर्फ बनारस की सीट पर क्यों....चुनावी लहर पर सवार मोदी तो पूरे देश में कहीं से खड़े हो सकते थें..... दरअसल, 2014 के रण ने पूर्वांचल को अचानक से राजनीतिक बहस का मुद्दा बना दिया..... सभी सियासी दल इसे भुनाने की जुगत में है.... और इसी रेस में बीजेपी यहां के ज्यादा से ज्यादा सीटें हथीयाने की कोशिश में है.... बीजेपी के लिए चुनावी शतरंज पर अभी पूरे देश में जो महत्व उत्तर प्रदेश का है.... लगभग वहीं महत्व यूपी के भीतर पूर्वांचल का भी है.... लेकिन इसे हमेशा नजर अंदाज किया जाता है.... सियासी दलों की योजना अयोध्या, गोरखपुर और बनारस के हिंदुत्व त्रिकोण के जरिए सिर्फ यहा की 32 सीटों में से ज्यादातर सीटें अपनी झोली में डालने की होती है.... इस त्रिकोण के ठीक मध्य में स्थित आजमगढ़ में मुलायम संघी योजना में पलीता लगाने की कोशिश में मैनपुरी के साथ-साथ आजमगढ़ से भी चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है.... उधर, आम आदमी पार्टी के अर्जुन अरविंद केजरीवाल भी इस राजनीतिक भवर में गोते लगाने के लिए कमर कस चुके हैं..... दरअसल, पूर्वी उत्तर प्रदेश में 18 जिलों का एक धुंधला सा इलाका पूर्वांचल कहलाता है.... जहां महत्वाकांक्षी राजनेता चुनावी माहौल में इसे इस्तेमाल तो करते है...... लेकिन चुनाव के बाद इसे बीच मजधार में छोड़ देते है..... जिस कारण इस क्षेत्र का आर्थिक विकास नहीं हो पाता..... हलांकि अस्सी के दशक तक देश के राजनीतिक-आर्थिक नक्शे पर इसकी छोटी-मोटी जगह जरुर बनती थी..... यूपी के कई मुख्यमंत्री और कुछ ताकतवर केंद्रीय मंत्री यहां से आते थे..... जिसमें कमलापति त्रिपाठी, चद्रजीत यादव, वीरबहादुर सिंह जैसे कई नेता शामिल है..... लेकिन अस्सी के दशक के बाद भारत की राजसत्ता ने जैसे देश के पिछड़े इलाकों में विकास की जोत जगाने की इच्छाशक्ति खो दी..... इसके बाद से अर्थव्यवस्था में बड़ी प्रइवेट पूजी का बोलबाला दिखने लगा.... और विकास की चिड़िया सिर्फ महानगरीय या समुद्रतटीय सनराइज इलाकों में ही बसेरा करने लगी..... मजबूरियों से लदे ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनके की तरह अयोध्या का रामजन्मभूमि आंदोलन इसी माहौल का नतीजा है.... जिसके बाद पूर्वंचल के विकास का एजेंडा इसके साथ ही सदा के लिए दव गया.... भारत के राजनीतिक-आर्थिक नक्शे से पूर्वांचल के गायब होने को लेकर लोगों की राय चाहे जो भी हो..... लेकिन अर्से बाद इस आम चुनाव में एक बार फिर से पूर्वांचल की चर्चा में आने के बाद एक सवाल उठना लाजमी है.... क्या अब पूर्वांचल की तस्वीर और तकदीर बदलेगी.... क्या राजनेता के लिए इस क्षेत्र का महत्व चुनाव के बाद भी बना रहेंगा.... हलांकि अभी कहना मुश्किल है.... क्योंकि मोदी और मुलायम दोनों के लिए यह जगह सचमुच का नहीं, सिर्फ शतरंज का एक घर है।