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Tuesday, 25 February 2014

बिते लम्हों की कसक......




मनमोहन सिंह ने शुक्रवार को बतौर प्रधानमंत्री आखिरी बार लोकसभा को संबोधित किया..... क्योंकि वो पहले ही कह चुके हैं कि अगर यूपीए-3 की सरकार बनी तो वो पीएम नहीं होंगे..... प्रधानमंत्री ने इस संबोधन में अपनी सरकार की सिर्फ उपलब्धियां ही गिनाई..... जबकी सच्चाई इससे ठीक उलट है..... देश की जनता भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त है.... और यही कारण है की यूपीए सरकार अपना जनाधार खो चुकी है.... दरअसल साल 2004 में जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने, तो उनका मंत्र था बातें कम, काम ज्यादा.... यही कारण था कि 2009 में जनता ने उनपर भरोसा जताया और केंद्र में फिर से यूपीए सरकार की वापसी हुई..... लेकिन 2013 आते-आते 2-जी, सीडब्लूजी, कॉलगेट के साथ ये नारा बाते कम, स्कैम ज्यादा में तब्दील हो गया..... इस सालों में महंगाई धरती के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को पार कर गई..... चीनी सैनिक इतना बार लद्दाख आए..... कि ऐसा लगने लगा, मानो चीनी सैनिक भारत में अपना राशन कार्ड बनवा लिए हो..... लेकिन इस पर भी प्रधानमंत्री सिर्फ चीनी घुली अपनी आवाज में कड़ी निंदा करके रह गए..... धीड़े-धीड़े कड़ी निंदा चीनी सैनिकों के लिए चुटकुला जैसा बन गया.... और हम दुनिया के नजरों में मजाक..... रुपया के गिरने का सिलसिला ऐसा चला की रोज एक नया रिकोर्ड बनता गया.... आतंकी हमलों से लेकर बलात्कार तक की घटनाओं पर वो इतना कम वोले, मानो उन्हें डर हो कि कही उनका टॉक टाईम न खत्म हो जाए..... आर्थिक मंदी के लिए उन्होंने वैश्विक कारण गिनाए तो घोटाले के घड़े सहयोगियों के सिर फोड़े..... और महंगाई पर ये कहकर खुद को जमानत दे दी कि इसके लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं..... कुल मिलाकर भ्रष्टाचार से लेकर महंगई तक, जब-जब पानी खतरे के निशान से उपर गया, तो उन्होंने खतरे का निशान थोड़ा और उपर कर अपनी जान छुड़ा ली..... और अब जब वो जा रहे हैं, तो उन्हें कोई गिला नहीं..... पीएम का कहना है कि इतिहासकार बताएंगे कि उन्होंने कैसा काम किया.... ये बात सच है कि अब इतिहासकार ही बताएगा उनके कार्यकाल के बारे में, मगर ये भी सच है कि इतिहास कार इतिहास बताते है, बनाते नहीं.... और उनकी सरकार ने जो किया उसे इतिहासकार तब तक ऐतिहासिक नहीं बना पाएंगे जब तक इतिहास लिखने बाले उसमें अपनी कल्पना का इस्तेमाल न करें..... हलांकि जाते-जाते, सरकार ने कुछ ऐसा फैसले जरुर लिए जिससे आम जनता को कुछ राहत मिला..... फिर वो चाहे भोजन का अधिकार हो या भ्रष्टाचार रोधि बिल या फिर सैनिको के लिए वन रैंक वन पेंसन, इस सभी ने जनता के जख्मों पर मरहम का काम जरुर किया है.... अतरिम बजट में जिस तरह से जाते जाते यूपीए-2 के पिटारे से गिफ्ट निकले.... अगर ये सब पहले हुआ होता तो शायद यूपीए सरकार का आज ऐसा हाल न होता.... बहरहाल, मनमोहन सिंह और उनकी सरकार को इस सबके लिए कही न कही कस्क तो जरुर होगी.... लेकिन कहते है न, अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।