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Friday, 31 January 2014

फिसड्डियों की फौज

                               
भारत के न्यूजीलैंड दौरे से पहले क्रिकेट जानकारों का मानना था कि अगर मेजबान टीम इक्के-दुक्के मुकाबले जीत ले तो यह उसके लिए अच्छा प्रदर्शन माना जाएगा.....लेकिन हुआ इसके ठीक उलटा, हारने की लत लगा चुके धोनी के धुरंधर वेलिंगटन में खेले गए पांचवें वनडे में भी पस्त हो गए....सीरीज तो 4-0 से गंवाई ही....साथ ही नंबर एक का ताज भी गंवाया और बची-खुची इज्जत भी.....दरअसल क्रिकेट में आंकड़े बड़े अहम होते हैं....क्योंकि जीत-हार का फैसला रनों और विकेटों से तय होता है.....निजी उपलब्धियां भी तो इन्हीं आंकड़ों की मोहताज होती हैं..... शुरुआत करते हैं होनहार फिरकीबाज आर अश्विन से.....5 मैच में कुल 44 ओवर.....विपक्षियों पर इतने मेहरबान कि 227 की औसत से 227 रन लुटाये.....गिफ्ट में भारतीय टीम को 1 विकेट भी दिया.....हरभजन सिंह और अमित मिश्रा भी आज घर बैठे यही सोचते होंगे....हमसे क्या भूल हुई….! गलती तो गौतम गंभीर से भी नहीं हुई थी.....लेकिन टीम मैनेजमेंट को शिखर धवन और रोहित शर्मा पर ज्यादा भरोसा था.....साउथ अफ्रीका में रन नहीं बनाये तो क्या, उम्मीद था कि कीवियों के यहां अपने घर वाला कमाल दोहराएंगे.....जमकर रन बनाएंगे, बदले में टीम को जीत भी दिलाएंगे.....पर उम्मीदों का क्या, पूरा होने की गारंटी थोड़े ही है.....जीत दिलाना तो दूर, ये तो रन भी न बना सके.....धवन साहब ने 4 मैच में जैसे-तैसे कुल 81 रन बनाए,  और टैलेंट का खजाना कहे जाने वाले रोहित शर्मा के बल्ले से 5 मैचों में निकले 145 रनों ने तो अपनों की ही मुश्किल बढ़ा दी.....पारी शुरू नहीं हुई कि....अगला कौन...अगला कौन? ज्यादा अहम सवाल हो जाता.....हर मुकाबले में दर्शक यही सवाल पूछता...अभी धोनी है न...जडेजा आउट तो नहीं हुआ...इतना विश्वास करते हैं दर्शक रोहित और धवन पर.....सुरेश रैना के लिए यह दौरा बड़ा अच्छा रहा.....वेलिंगटन देखा...ऑकलैंड देखा...और देखा नेपियर.....ऐसा नहीं है कि पिछले दौरे पर उन्होंने ये सब नहीं देखा था, पर यादें ताजा होती रहनी चाहिए....कहां यूपी की वही ऊबाऊ सी गलियां और कहां न्यूजीलैंड.....नेचुरल खूबसूरती जनाब....! क्रिकेट तो बाद में भी खेल लेंगे.....बस धोनी की मेहरबानी होनी चाहिए.....हमें इनके द्वारा किये गए 3 मैच में कुल 84 रन के योगदान को नहीं भूलना चाहिए....मुंबई के होनहार अजिंक्य रहाणे में बहुत टैलेंट हैं....कई देशों का टूर कर चुके हैं भारतीय टीम के साथ.....ताकि टीम का टैलेंट हंट शो पास कर जाएं......हर बार मुंबई में फ्लाइट में बैठने वक्त यही सोचते होंगे कि इस बार तो जगह पक्की.....पर प्रदर्शन ऐसा कि प्लेइंग इलेवन छोड़िए, ड्रेसिंग रूम में भी शामिल करने पर सवाल उठ जाए.....5 मैचों में शुभ 51 रन बनाए हैं तो सवाल तो पूछा ही जाएगा.....भैया, इतनी दरियादिली क्यों....? सबसे अनुभवी जब मजबूरी बन जाए तो आप क्या करेंगे.....? धोनी का भी यही हाल है....ईशांत शर्मा, यंग ब्रिगेड के नये खेवनहार....भुवनेश्वर, शमी और वरुण इनकी ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखते होंगे....मन ही मन कहते होंगे....आप ही हमें रास्ता दिखाओ.....पर अनुभव का क्या करें जब टैलेंट ही धोखा देने लेगे....दूसरों को विकेट लेने का गुर क्या सिखाएं जब खुद ही इसके लिए तरस रहे हों....ईशांत शर्मा को देखकर आपके मन में एक ही ख्याल आता होगा.....कहां फंस गए यार....! इतने खूबसूरत बाल हैं तुम्हारे.....तेल...या फिर किसी शैंपू का विज्ञापन किया करो....पैसे भी मिलेंगे और टीम की इज्जत भी बची रहेगी.....मैच खेलकर, क्यों टीम को विकेट के लिए तरसाते हो....खैर टीम इंडिया के इस दशा को देख कर गालिब का एक शेर याद आ रहा है.....'बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले'......इस टीम का भगवान ही भला करें!







‘आप’ तो ऐसे ना थे!

                          

                                               


आम आदमी पार्टी पर आजकल सभी की नजरें लगी हैं....लगे भी क्यों ना...आखिर जिस जज्बा, ज़िद और जुनून से इस पार्टी ने राजनीति में प्रवेश किया और फिर देखते ही देखते 15 साल से सत्ता में काबिज शीला सरकार को उखाड़ फेंका...वो किसी चमत्कार से कम नहीं है....जनआंदोलन से जन्मी ये पार्टी देखते ही देखते राजनीति के उस बुलंदी पर पहुंच गई कि जिस लोकसभा की लड़ाई को पहले सीधी रेखा के रुप में देखा जा रहा था....अब वहीं त्रिभुजाकार बन गई है...यानि अब ये लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है...लेकिन महज एक महीने में केजरीवाल को आंदोलन और सरकार चलाने में फर्क समझ आने लगा है.....दिल्ली में आप सरकार बनाकर महज एक महीने में ही हांफती दिख रही है....दरअसल 1977 में भी कुछ ऐसा ही माहौल बना था...जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार को जनता ने उखाड़ फेंका था....इंदिरा खुद भी राजनारायण के हाथों हार गई थी....तब जनता पार्टी के नेता रातों रात स्टार बन गए थे....लेकिन उसके बाद गलतियों का ऐसा दौर शुरु हुआ कि ढाई साल में ही जनता ने वापस इंदिरा गांधी को सत्ता सौंप दी....आम आदमी पार्टी की हालात भी कुछ इसी तरह बनते दिख रही है.....आप सरकार का पहला हफ्ता अगर लोक लुभावने घोषणाओं पर न्योछावर रहा तो दूसरे हफ्ते से ही उसके साथ जो विवादों का दौर शुरु हुआ वो रुकने का नाम नहीं ले रहा.....केजरीवाल सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती एक महीने के भीतर ही विवादों की हैट्रिक लगा चुके हैं.....दिल्ली में जजों की बैठक बुलाने के मुद्दे पर अपने सचिव से टकराव....तो वहीं खिड़की एक्सटेंशन में रेड को लेकर दिल्ली पुलिस से टकराव......ये टकराव तो यहां तक बढ़ गया कि केजरीवाल को रेल भवन के आगे धरने तक पर बैठना पड़ा....और फिर सरकार की फजीहत हुई....और अब भारती के इस्तीफे की मांग भी गूंज रही है....महिला और बाल विकास मंत्री राखी बिड़ला के कार का शीशा टूटना एक सामान्य घटना थी...लेकिन उसे जो रुप दिया गया वो भी पार्टी को विवाद में घसीट दिया....वहीं प्रशांत भूषण ने कश्मीर पर जनमत संग्रह कराने की बात कहकर बवाल खड़ा कर दिया....तब आप को प्रशांत भूषण के इस बयान से किनारा करना पड़ा....लेकिन इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि कुछ हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने हमला बोल दिया.....इतना ही नहीं पार्टी के अंदर महज एक महीने में ही कई नेता बागावती सुर भी अपना लिए....दिल्ली के लक्ष्मीनगर से सांसद विनोद कुमार बिन्नी ने तो केजरीवाल को तानाशाह तक कह डाला....हांलाकि बिन्नी अब पार्टी से निकाले जा चुके हैं....और पार्टी ने उनके सभी आरोपों को खारिज कर दिया है....लेकिन मुश्किल यह है कि बिन्नी की तरह कई विधायक पार्टी की कार्यशैली से नाराज हैं....वहीं शपथग्रहण समारोह के लिए मेट्रो की सवारी कर टीम केजरीवाल ने खुब सुर्खियां बटोरी तो अगले ही दिन मंत्री वीवीआईपी नंबर वाले इनोवा गाड़ी इस्तेमाल करने लगे...सीएम के लिए मकान की खोज तो अपने आप में एक दिलचस्प किस्सा बन गया.....पार्टी ने जनता दरबार लगाने का ऐलान भी जोर-शोर से प्रचारित किया लेकिन पहले ही दिन जनता दरबार में भाड़ी अव्यवस्था मच गई...और केजरीवाल को इससे तौबा करनी पड़ी....दरअसल आम आदमी पार्टी के नेता सरकार बनाने के बाद भी यह मानने को राजी नहीं हैं कि सघर्ष का दौर अब पीछे छूट गया है....और सत्ता का ऐसा ताज सिर पर है, जिसके कांटे दूसरों को नहीं नजर आते, लेकिन पहनने वाले को चुभते जरुर हैं.....केजरीवाल और उनके मंत्री कई मुद्दों पर इस तरह के लाचारी और बेबसी का इजहार कर रहे हैं.....जैसे उन्हें पहले से पता ना हो कि दिल्ली ऐसी ही है.....वे अपने विभागों को दुरुस्त करने से ज्यदा केंद्र सरकार के विभागों में उनकी सुनवाई ना होने को लेकर आहत है.....आप चाहती है कि दिल्ली का सारा सरकारी महकमा उनके पार्टी कार्यकर्ताओं की तरह जज्बे से काम करने लगे.....लेकिन यह बदलाब कब होगा इसका किसी को नहीं पता और उपर से लोकसभा चुनाव सिर पर है.....इस लिए केजरीवाल सरकार सरकारी महकमे की बजाय पार्टी संगठन के बल पर सरकार चलाना चाहती है.....दरअसल केजरीवाल सरकार जनता के उम्मीदों पर खड़े उतरने के लिए ज्लदबाजी में दिख रही है.....खासतौर पर अपने 18 मुद्दों को पूरा करने में....सरकार चाहती है कि लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले अपने मेनिफेस्टों से सभी मुद्दों को निपटा दें.....ताकि लोकसभा चुनाव में जनता के सामने जाकर यह दावा कर सके कि हमने चंद महीनों में अपने सभी वादे पूरे कर दिए.....लेकिन सवाल है कि क्या वास्तव में दिल्ली के वही 18 मुद्दे ही है....? क्या इसके अलावा सरकार को कोई काम नहीं करना चाहिए.....? और यही करण है कि सरकार सवालों के घेरे में हैं....उदाहरण के लिए रिंग रोड पर ऐलिवेटिड रोड का काम क्यों ठप पड़ा है.....? केंद्र ने जवाहरलाल नेहरु मिशन के दहत रेंटल होम बनाने की जो योजना दिल्ली के लिए दी, उसमें दिल्ली सरकार का कोई जवाब क्यों नहीं गया.....? केंद्र द्वारा दिल्ली को दी जाने वाली बसें दूसरे राज्यों को क्यों चली गई.....? बात यहीं खत्म नहीं होती....यह सिलसिला लंबा है.....कोई कुछ भी कहे, सरकार चलाने के साथ-साथ जनता को यह लगना चाहिए कि दिल्ली की ग्रोथ नहीं रुकी है.....लेकिन एक महीने के अपने कार्यकाल के दौरान केजरीवाल सरकार ग्रोथ से संबंधित एक भी घोषणा अभी तक नहीं कर पाई हैं.....सरकार कब तक चलती है यह नहीं कहा जा सकता....और यही डर सरकार पर हावी है इस लिए उसका सारा ध्यान अपने मेनिफेस्टों पर है.....दरअसल आप के वादों का पहाड़ अब जन सैलाब बनकर दिल्ली सचिवालय पर हिलोरें मार रहा हैं....केजरीवाल से लोगों की उम्मीदें काफी हैं और अब तो ये राष्ट्रीय स्तर पर परवान चढ़ रही है.....केजरीवाल को समझना चाहिए कि उम्मीदों की सवारी शेर की सवारी की तरह खतरनाक होती है.....आप जब उम्मीदों की लहर पर सवार होते है तो आपको महाबली होने का एहसास होता है लेकिन आप शेर की पीठ से या उम्मीदों की लहर से उतर नहीं सकते...यह मारक हो सकता है.....ऐसे में अगर वे जनता के उम्मीदों पर खरे उतरते है तो मुमकिन है कि वो 2014 के लोकसभा चुनाव को प्रभावित कर सकते है....अगर विफल रहे तो उसका खामियाजा आप के साथ-साथ भारतीय राजनीति के लिए भी बुरा साबित हागा....क्योंकि उम्मीद और सपनों की मौत से बुरा कुछ भी नहीं होता।