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Friday, 15 August 2014

मुलायम ने ही क्यों की पहल

मुलायम के लिए सत्ता सबकुछ है.... लेकिन मेरे लिए मान-सम्मान.... यह सुवाक्य उत्तरप्रदेश की बीएसपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का है.... जब लालू-नीतीश की जोडी ने एक कार्यक्रम के दौरान अपनी तरह मुलायम-माया को भी एकजुट होने का गुरुमंत्र दिया, तो मायावती पर तो इसका असर नहीं हुआ लेकिन मुलायम लालू-नीतीश के मंत्र से मंत्रमुग्ध हो गये और उसने मायावती के सामने एकजुट होने का प्रपोजल रख दिया.... लेकिन मायावती ने दो टूक कह दिया कि मुझे यह प्रस्ताव मंजूर नहीं  है, मेरे लिए सत्ता नहीं मेरा मान सम्मान बडा है..... दरअसल, मायावती के साथ उनका करीब 20 फीसदी दलित वोट बैंक उनके साथ है.... मायावती की सोंच रही होगी कि अगर अल्पसंख्यकों का भी सहयोग उन्हें मिल जाता है, तो बीजेपी को पराजित करने के लिए उनके पास बेहतर विकल्प हो सकता है.... ऐसे में वह मुलायम के साथ गठबंधन कर नहीं चाहती होगी कि उसकी खुद की राजनीतिक क्षमता पर कोई सवाल उठे.... जिस दलित वोट बैंक की बदौलत मायावती अपने आप को हमेशा से एक मजबूत दावेदार मानती रही है..... ऐसे में माया ने मुलायाम को न कहकर अपने वोट बैंक को साफ आश्वासन दिया है कि उन्हें कहीं जाने की कोई आवश्यकता नहीं है.... वो अभी भी उनके हित के लिए... उनके साथ खडे हैं.... उन्हें बिखरने की कोई जरूरत नहीं है..... यह सच है कि इस लोकसभा चुनाव में बीएसपी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा... लेकिन आंकड़े बतातें हैं कि फिर भी उनका वोट फीसदी कम नहीं हुआ है... शायद मुलायम मुस्लिम वोटरों को यह संदेश देकर उससे सहानूभूति हासिल करने की कोशिश की कि वह बीजेपी जैसी तथाकथित सांप्रदायिक पार्टी को मात देने की लिए मायावती जैसी कट्टर राजनीतिक दुश्मन से भी समझौते के लिए तैयार है.... हलांकि इसके पिछे एक कारण और भी हो सकता है.... वो ये कि सपा अपने आप को यूपी में बीजेपी का मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी साबित करना चाहती हो.... और चाहती हो कि वह हर हाल में यूपी में बीएसपी से ऊपर रहे.... इस तरह मुलायम ने इस पहल के साथ एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश की है.... बहरहाल इसके पिछे का सच जो भी हो.... लेकिन इतना तो तय है कि मुलायम के प्रस्ताव को खारिज कर मायावती ने फिर से अपने बुलंद इरादों का परिचय दिया है.... अब इस फैसले के बाद यूपी में मायावती का 'मान-सम्मान' कितना बचता है... वह आगे होने वाले विधान सभा चुनाव में ही तय होगा।

अवसरवादिता की राजनीति

लोकसभा चुनाव में हार के बाद कैमरे के सामने पहली बार नीतीश के चेहरे पर मुस्कान दिख रही थी.... आखिरी बार तेइस साल पहले 1991 के लोकसभा चुनाव में लालू और नीतीश ने साथ प्रचार किया था..... इस तेइस साल में काफी कुछ बदल गया..... लालू का साथ छोड़ने के बाद सत्रह साल तक नीतीश बीजेपी के साथ रहे..... बिहार में मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र में मंत्री तक बने.... लेकिन जब लालू के साथ मिलकर जिस कदर उन्होंने बीजेपी पर हमला बोला उसे मौकापरस्ती से अलग नहीं रखा जा सकता..... नीतीश बीजेपी को ये कहकर कोसते रहे कि इनके पूर्वजों का देश की आजादी में कोई योगदान नहीं रहा है..... नीतीश जी सत्रह साल तक इसी बीजेपी के साथ रहकर इनका गुण गाते थकते नहीं थे..... मौकापरस्ती ही कहेंगे कि जिन लालू के जंगल राज से लड़कर बिहार की सत्ता पर काबिज हुए थे, अस्तित्व बचाने के लिए आज उसी के गुण गा रहे हैं..... दोस्ती दिखाने के लिए लालू और नीतीश ने जिस हाजीपुर को चुना वो शहर लोकतंत्र की जननी और वैशाली का जिला मुख्यालय है.... इसी शहर से रामविलास पासवान जीतकर संसद पहुंचे हैं.... पासवान कभी लालू और नीतीश के साथी हुआ करते थे.... मंडल के जमाने में लालू-नीतीश-पासवान की तिकड़ी थी..... लेकिन आज तस्वीर कुछ अलग है.... अब बिहार में लालू-नीतीश, और कांग्रेस मिल के तिकड़ी बनाई है.... और पासवान बीजेपी के साथ है.... दरअसल, लोकसभा में मिली करारी हार के बाद लालू और नीतीश ने हाथ मिलाया है.... लोकसभा चुनाव में लालू की पार्टी को करीब 20 फीसदी और नीतीश की पार्टी को करीब 16 फीसदी वोट मिले थे.... कांग्रेस और एनसीपी को मिले वोट को अगर इसमें जोड़ दें तो ये आंकड़ा 45 फीसदी का हो जाता है.... ये वोट बीजेपी को मिले 39 फीसदी वोट से 6 फीसदी ज्यादा हैं.... हलांकि ये मान लेना कि लोकसभा में जो वोट बीजेपी गठबंधन को मिले वही वोट विधानसभा में भी मिलेंगे ठीक नहीं होगा..... यही बात लालू और नीतीश गठबंधन के लिए भी है..... लोकसभा चुनाव में लालू और नीतीश अलग अलग लड़ रहे थे..... इन दोनों के साथ आने का फायदा है, तो नुकसान भी है.... लालू की छवि विकास विरोधी की रही है.... लालू के कथितजंगल राज के जमाने को लोग भूले नहीं हैं..... विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर सवर्णों के वोट जेडीयू उम्मीदवार को मिले थे.... लेकिन लालू के साथ आने से नीतीश को इसका नुकसान उठाना पड सकता है..... नीतीश और लालू के साथ आने से बीजेपी का सवर्ण और वैश्य वोट और एकजुट हो सकता है.... हलांकि लालू-नीतीश गठबंधन को यादवमुस्लिम और कुर्मी का वोट मिलना तय है.... कोइरी उपेंद्र कुशवाहा के बहाने बीजेपी के पास जा सकता है.... तो अति पिछड़े और दलितों में फूट का फायदा बीजेपी को होगा.... लेकिन अब तक होता ये रहा है कि सवर्ण और बाकी ताकतवर जातियों के प्रभाव में आकर कमजोर तबके का वोट बीजेपी गठबंधन को मिलता रहा है.... इसी वजह से 2010 के चुनाव में बीजेपी और जेडीयू को 200 से ज्यादा सीटों पर जीत मिली थी..... जरूरत दोनों को है लेकिन पर्दे के सामने जो दिख रहा है उसमें लालू नीतीश पर भारी पड़ रहे हैं..... 10 सीटों पर 21 तारीख को वोटिंग है..... बीजेपी के कब्जे वाली 6 और आरजेडी के कब्जे वाली 3 सीटें इसमें शामिल है..... इसमें 1 सीट जेडीयू के पास थी..... इसमें सबसे ज्यादा खोने के लिए बीजेपी के पास है..... और पाने के लिए नीतीश के पास..... इससे साफ जहीर है कि इस गठबंधन की लालू से ज्यादा जरूरत नीतीश को है.... नीतीश अगर लालू से हाथ नहीं मिलाते तो बहुत मुमकिन था कि अगले चुनाव आते-आते वो कहीं के नहीं रह जाते.... यही वजह है कि हाजीपुर के मंच पर नीतीश लालू के सामने लोटे नजर आए.... यही लग रहा था कि लालू दाता की भूमिका में हैं और नीतीश याचक की भूमिका में.... बहरहाल इस गठबंधन से हो सकता है कि उपचुनाव में लालूनीतीश को बीजेपी से ज्यादा सीटें मिल जाए.... लेकिन अगले साल यही परिणाम दोहाराया जाएगा इसको मान लेना कहीं से भी बुद्धिमानी नहीं होगी।

Wednesday, 2 July 2014

काश के ऐसा होता !



फुटबॉल का जादू पूरी दुनिया में सिर चढ़कर बोल रहा है.... अख़बार, टीवी चैनल या फिर सोशल मीडिया सभी फुटबॉल की खबरों से पटे हुए हैं.... भारत भी फुटबॉल के फीवर में तप रहा है.... लेकिन जिस देश में क्रिकेट को किसी धर्म के तरह माना जाता है उस देश के फुटबॉल प्रेमियों को दूसरे देशों के खिलाड़ीयों के हार-जीत पर खुश या मायूस होना पड़ता है.... हलांकि जिस दौर में मेजर ध्यानचंद की हाकी को लेकर दुनिया भर में धमक थी... उसी दौर में भारत की फुटबाल टीम की भी अपनी धमक थी.... इस समय फीफा की रैंकिंग में भारतीय टीम का 154वां स्थान हैं.... लेकिन आपको जान कर हैरानी होगी कि ब्राजील में साल 1950 में हुए विश्व कप फाइनल में खेलने का मौका भारत की फुटबाल की टीम को मिला था.... भारत की टीम को बाकायदा न्यौता भेजा गया था.... भारत ने ओलिंपिक में फुटबाल में चौथा स्थान हासिल किया था... और एशियाई खेलों में तो सोना जीता था.... भारत को तब उस ग्रुप में रखा गया था.... जिसमें इटली, स्वीडन और पेरुग्वे की टीमें शामिल थी.... दरअसल दूसरा विश्व युद्द खत्म होने के बाद विश्व कप हुआ था और एशिया से बर्मा और फिलीपिंस की टीमों ने क्वालीफाई किया था.... लेकिन दोनों देशों ने पैसों की कमी के कारण ब्राजील जाने से मना कर दिया था.... तब भारतीय टीम को न्योता भेजा गया था.... निमंत्रण अंतिम समय में मिलने के कारण भारतीय फुटबाल फैडरेशन के पास ब्राजील टीम भेजने के लिए पैसा नहीं था, जिस कारण भारत इस मौके का फायदा नहीं उठा सका.... दरअसल, भारतीय फुटबाल फैडरेशन समझ ही नहीं सकी की वो किस स्वर्णिम मौके का गंवा रही है.... अगर फैडरेशन ने दूरदर्शिता दिखाई होती और टीम को भेजा होता तो तय है कि आज नजारा दूसरा ही होता..... हो सकता है कि भारतीय फुटबाल प्रेमी रात-रात भर जाग कर मैसी या नैमार या रोनाल्डो के बजाए किसी भारतीय खिलाड़ी के कौशल देखने के लिए राते काली कर रहे होते..... खैर, सच्चाई तो यही है कि भारत की टीम 1950 के फुटबाल विश्व कप नहीं खेल पाई.... आज भी हमारे यहां बंगाल, केरल और गोवा में खासतौर से फुटबाल खेली जाती है.... उत्तर पूर्व के कई राज्यों में भी फुटबाल का चलन है.... लेकिन फुटबाल में एशिया छोड़िये सार्क देशों को भी पीटने की हालत में नहीं है.... टाटा फुटबाल एकेडमी भी बनी है.... फुटबाल के विदेशी कोच भी बुलाए गये हैं.... विजयन और बाइचिंग बूटिया जैसे खिलाड़ी भी हाल के सालों में हमें मिले हैं... जो नौजवान पीढ़ी के लिए प्रेरणा बने हैं.... लेकिन हमारी फुटबाल और यूरोप या अफ्रीकी देशों की फुटबाल में अभी भी जमीन आसमान का अंतर है.... कोलकाता में मोहन बगान और ईस्ट बंगाल के मैच देखिए या गोवा में डेम्पो या सल्गावकर स्पोर्टसे क्लब के मैच देखिए और फिर तुलना कीजिए योरोपिन टीमों से.... अंतर साफ हो जाता है.... ऐसा लगता है कि भारतीय युवा फुटबाल प्रेमी पीढ़ी को अभी कई दश्क तक किसी मैसी, किसी नैमार या फिर किसी रोनाल्डो का खेल देखने और उसकी हार-जीत पर खुश या मायूस होते बिताने पड़ेंगे।

Thursday, 19 June 2014

बगदादी बगावत




इराक एक बार फिर से दहशत के साये में है में है... एक बार फिर खतरे में है.... इराक ज़ुल्म और जंग की वजह से दुनिया के सबसे चर्चित मुल्कों में शुमार हो चुका है.... वह इराक, जिसके राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने अपने जीते-जी कभी अपनी निगाहें नीची नहीं की.... और तो और उसने दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका से लोहा लेकर तबाह हो जाने से भी गुरेज नहीं किया.... लेकिन अब इसी सद्दाम हुसैन के इराक की जो नई तस्वीर दुनिया के सामने है, उसने अच्छे-अच्छों को चौंका दिया है.... दुनिया के कई देशों को अब इराक की हालत पर तरस आने लगा है..... दरअसल, इस्लामी स्टेट इन इराक एंड द लेवेंट नाम के इस आतंकवादी संगठन ने इराक समेत दूसरे कई देशों को मिलाकर जो नए इस्लामिक मुल्क का सपना बुना है, वो लाखों बेगुनाहों के ख़ून-खराबे से होकर गुज़रता है और इराक के तीन शहरों पर कब्जे के साथ इसकी शुरुआत हो चुकी है.... आलम ये है कि इराक से सैकड़ों मील दूर भारत में भी परेशानी महसूस की जा रही है.... भारत सरकार ने इराक में मौजूद भारतियों को वहां से तुरंत निकलने की हिदायतें दी हैं और वहां के दूतावास को इसके लिए खासतौर पर इंतजाम करने को कहा है... दो रोज पहले आलम ये था कि विद्रोहियों की सेना शहर के बाहर सेना से मुकाबला कर रही थी... लेकिन देखते ही देखते दो दिनों के भीतर सुन्नी विद्रोहियों ने वहां के कई शहरों को अपने कब्जे में कर लिया है.... ऐसे में पूरी दुनिया के सामने अब दो ही रास्ते बचे हैं.... एक ये कि चुपचाप आईएसआईएस को मनमानी करते हुए देखना या फिर आईएसआईएस को रोकने के लिए इराक में ही उनकी घेरेबंदी करना.... और अब तक अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जो संकेत दिए हैं, वो दूसरे विकल्प की तरफ़ ही इशारा करते हैं.... दरअसल, ओबामा ने आईएसआईएस से भिड़ने के विकल्पों पर विचार करने की बात कही है.... और उनकी इस टिप्पणी में इराक के आनेवाले दिनों की तकदीर छुपी है..... लेकिन अमेरिका ने ये भी साफ दिया है कि अमेरिकी सेना को इराक की धरती पर नहीं उतारा जाएगा.... उधर, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भी कहा है कि अगर अमेरिका इराक़ में कार्रवाई करता है, तो वह भी मदद करने को आगे आ सकते हैं.... ऐसे में टकराव के हालात से इनकार नहीं किया जा सकता.... दरअसल, आईएसआईएस वो आतंकवादी संगठन है, जो इराक समेत कई मुल्कों में इस्लाम के नाम पर अपना राज कायम करना चाहता है और इसी कोशिश में उसने इराक के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है.... दुनिया के सबसे अमीर आतंकवादी संगठन का सरगना, दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादियों का आका और अलकायदा के चीफ़ अल जवाहरी के बाद ये मोस्ट वांटेड आतंकवादी अबू बकर अल बगदादी इराक में अपने ख़ौफ़ की सलतनत कायम करना चाहता है.... हालत ये है कि इराक़ में मचे इस घमासान की बदौलत जहां 5 लाख लोग अपने ही मुल्क में बेघर होकर शरणार्थी की ज़िंदगी जी रहे हैं, वहीं सैकड़ों लोग अपनी जान से हाथ धो चुके हैं.... इराक में हालत लगातार बद से बदतर हो रहे हैं.... आतंकवादियों ने इराक की राजधानी बगदाद की ओर बढ़ना शुरू कर दिया है.... और दुर्भाग्य से ये वो इलाके हैं, जहां रहनेवाली सबसे बड़ी आबादी से ये आतंकवादी नफ़रत करते हैं.... ऊपर से इन आतंकवादियों के मुकाबले के लिए इराकी फौज ने खुद अपने ही मुल्क में हवाई हमले करने को मजबूर है.... और इन सबमें सबसे ज़्यादा नुकसान आम लोगों का ही हो रहा है.... बहरहाल, अगर इस तरह तेल उत्पादन के ठिकानों पर विद्रोहियों का कब्जा बढ़ता रहा... तो आनेवाने दिनों ने ना सिर्फ़ कच्चे तेल की क़ीमतों में आग लग जाएगी, बल्कि इसकी आंच इराक से दूर दुनिया के तमाम दूसरे देशों तक भी ज़रूर पहुंचेगी।

Friday, 6 June 2014

चाय वाले पीएम


देश के हर नुक्कड़ पर चाय के साथ मोदी सरकार की चर्चा गर्म है... बढ़ती तपिश में भी लोग इसे पसंद कर रहे हैं.... देश की जनता उत्सुकता भरी नजरों से नई सरकार को देख रही है.... दरअसल, नरेद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने, नए रोजगार पैदा करने, इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और बेहतर गवर्नेंस के जो वादे किए थे.... अब इन तमाम वादों पर उनकी परीक्षा शुरु हो चुकी है... हलांकी मोदी से पहले भी सत्ता में आए तमाम नेताओं ने वादे किए है.... लेकिन मोदी को अपने वादे को पूरा करना बड़ी चुनौती है... बिगड़ी व्यवस्था को पटरी पर लाना मोदी टीम के लिए बहुत बड़ी चुनौती है.... अगर भारतीय इकॉनमी की बात करें तो साल 2013 सबसे निराश करने वाला रहा...12 महीने में मंहगाई के एक्सीलेटर पर यूपीए सरकार लगाम लगाने में नाकाम रही.... जीडीपी ग्रोथ को तो संभालने का अवसर ही नहीं मिला.... और 4.5 फीसदी जीडीपी की दर ने ऐसी कमर तोड़ी कि हर कोई दर्द से कराह उठा.... इस लिए इंडस्ट्री, बिजनेसमैन, छोटे व्यापारी, किसानों और आम लोगों की उम्मीद मोदी सरकार पर जा टिकी है.... यानि इस सरकार को सबसे बड़ी और सबसे पहली चुनौती बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाना होगा.... इसके बाद रोजगार का नंबर आएगा.... पिछले कई सालों से देश में ना तो बड़े कारखाने लगे है, ना ही निर्माण की बड़ी परियोजनाएं शुरु हुई है.... ऊपर से जितनी इंडस्ट्री है भी उसका प्रॉडक्शन गिर रहा है.... ऐसे में मोदी सरकार को स्पष्ट करना होगा कि वह रोजगार देने के लिए क्या पहल करने जा रही है.... फिर नंबर है शिक्षा और स्वास्थय का.... देश में शिक्षा और स्वास्थय को लेकर नई सरकार को गंभीरता दिखानी होगी.... खासकर गांवो में ये समस्याएं मूंह वाए खड़ी है.... लोग बुनियादी सुविधाओं से महरुम है.... यह सही है कि हम बुलेट ट्रेन का सपना साकार करें, लेकिन साथ ही यह भी जरुरी है कि बेसिक स्तर पर आ रही समस्याओं को बुलेट की गति से निपटाए.... इन सबके अलावा मोदी टीम को देखना होगा कि पिछले सरकार में जिन योजनाओं पर ब्रेक लग चुका है, अगर उनमें दम है तो बिना किसी भेद भाव के उसे पूरा करना होगा.... यानि मोदी सरकार के सामने खेतो में हरियाली ठहराने से लेकर देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने और दुनिया के साथ अपने संबंध को बेहतर बनाने तक चुनौतियों का अंबार है.... हलांकी अभी मोदी और उनकी टीम पूरी तरह से एक्शन में नहीं आई है.... लेकिन उन्हें समझना होगा कि उनके पास गंवाने के लिए समय नहीं है.... मोदी को देश से जितना प्यार मिला है, उनकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ गई है.... लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, उनके फैसलों से अलग-अलग काल में देश की दिशा और दशा को बदला है.... यह भी इतिहास के सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुका है जब अच्छे दिन की तलाश में जनता ने एक चेहरे पर जीत का सेहरा बांधा है.... एक नई और उम्मीदों से बुनी सरकार की शुरुआत पर हम उन सभी वादों की याद दिलाते हुए यही कहेगें.... मोदी जी अच्छे दिन तो लाएंगे ना.....!




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Tuesday, 27 May 2014

रिश्तों का नया अध्याय



देश में धाक जमाने के बाद अब मोदी की नजर दुनिया के उन गिने-चुने कामयाब नेताओं की फेहरिस्त में शामिल होने की है, जिन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता के जरिए दुनिया भर के लिए एक मिसाल कायम की…. फिर चाहे वो पंडित नेहरू का गुटनिरपेक्ष आंदोलन हो, या फिर इंदिरा गांधी का आयरन लेडी का व्यक्तित्व, जब उन्होंने अमेरिका की चुनौति को भी सीधा स्वीकार किया था, मोदी की नजर अब वहां है, जहां से इतिहास में सुनहरे अध्याय लिखने का दायरा शुरू होता है....
दरअसल, मोदी जानते हैं कि देश को अगर विकास के रास्ते पर ले जाना है, तो पड़ोसी मुल्कों के साथ बेहतर रिश्ते जरूरी है.... सीमापार अगर तनाव की बजाय सद्भाव होगा तो सरकार की ऊर्जा सकारात्मक कामों में लगेगी.... मोदी की महत्वाकांक्षा देश की सीमाओं के पार जाने की है.... जिसकी शुरुआत वो सार्क देशों से कर रहे हैं.... कुछ मामलों में मोदी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नक्शे-कदम पर चलते दिख रहे हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते सुधारने के लिए ऐतिहासिक पहल की थी.... फिर चाहे वो लाहौर तक की बसयात्रा रही हो, या फिर आगरा शिखर सम्मेलन, ये और बात है कि ये दोनों कोशिशें पाकिस्तान के भीतर चल रहे आंतरिक उठापटक का शिकार हो गईं... अब
मोदी भी विदेश नीति के मामले में अटलजी के सिद्धांतों पर चलते हुए, अपनी शख्सियत की एक नई लकीर खींचना चाहते हैं.... चुनावों के दौरान मोदी ने सार्वजनिक मंचों से कई बार भारत की विशाल आबादी की दली देते हुए ये सवाल उठाया कि अगर चीन अपने मैनपावर के आधार पर विकसित देशों की कतार में खड़ा हो सकता है, तो भारत क्यों नहीं, मोदी ने कई बार कमजोर विदेश नीति को लेकर भी तंज कसा... अब जब मोदी सत्ता में आए हैं, तो यकीनन उनकी निगाह इन तमाम मसलों पर है.... मोदी भारत को उस दौर में ले जाना चाहते हैं... जब भारत ने शीतयुद्ध के दौर में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया था... और दक्षिण एशिया में एक बडे नेता की भूमिका में खड़ा रहा था तो वहीं 1971 में इंदिरा गांधी के वक्त पूर्वी पाकिस्तान को जीतने के बाद भी जियो और जीने दो की नीति पर अलग देश का निर्माण कराकर इंदिरा गांधी ने एक मिसाल दुनिया के सामने पेश की थी.... यकीनन मोदी का एजेंडा दुनिया के सामने देश की प्रतिभा का लोहा मनवाने का है, जिसकी अग्रणी भूमिका में वो खुद आना चाहते हैं... ताकि मोदी का कार्यकाल सदियों के लिए एक नजीर बन जाए.... मोदी की ये शुरुआत इसी का एक हिस्सा है। 

Tuesday, 29 April 2014

मोदी बनाम ऑल...

देश में आज-कल सियासत की दो धाराए बह रही है.... या यू कहे कि जानबूझकर बहाया जा रहा है.... एक धारा साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की बहाई जा रही है.... इस कोशिश में कि भावुकता और ध्रुवीकरण के नाम पर माहौल बदल जाएगा, तो दूसरी धारा है विकास के खोखले दावे की.... जिसकी शुरुआत मोदी ने की, तो हालत ये हुई कि ना चाहते हुए भी सबको इस होड़ में खुद को आगे दिखने के लिए जूझना पड़ रहा है..... फिर चाहे माया हो, या मुलायम, नीतीश हों या लालू, या फिर खुद कांग्रेस.... दरअसल, सियासी मौसम का सबसे दिलचस्प मोड़ आ चुका है.... और अभी की जो तस्वीर है वो नरेन्द्र मोदी बनाम ऑल की है, यकीन मानिए इतिहास में जब भी ऐसा हुआ है.... एक करिश्माई राजनीतिक परिवर्तन के दौर से देश गुजरा है.... शायद विरोधी भी इस बात को समझ गए हैं.... लिहाजा अब विकास के मुद्दों को जाति धर्म सम्प्रदाय के नाम पर डायवर्ट करने की कोशिशें भी तेज होने लगी हैं..... हलांकि मोदी को जितना पार्टी के बाहर उतना ही पार्टी के भीतर भी विरोधियों से जूझना पड़ रहा है.... अतीत में ऐसे कई मौके आए हैं जब करिश्मे की तरह सामने आए नेताओं को इन हालात से गुजरना पड़ा है.... नेहरू और इंदिरा गांधी उस दौर में भी कमोबेश ऐसा ही होता था... खासकर इंदिरा गांधी के जमाने में इंदिरा बनाम ऑल का बना माहौल भला कौन भूला है.... यकीनन मौजूदा सियासत के रंग में भी उसी इतिहास का अक्स साफ देखा जा सकता है.... पंडित नेहरू भी संसद के बाहर से लेकर भीतर तक ऐसी परिस्थियों का शिकार रह चुके हैं.... मौजूदा दौर भी मोदी के लिए कमोबेश वैसा ही है, जाहां मोदी पार्टी के भीतर आडवाणी ब्रिगेड का मुकाबला करते हुए... पार्टी के बाहर की चुनौतियों का मुकाबला कर रहे हैं.... मोदी जिस खूबसूरती से राजनीतिक विरोधियों के जाति और सम्प्रदाय के चक्रव्यूह से बचते हुए विकास, गुड गवर्नेस, को मुद्दा बनाकर आक्रामक कैंपैनिंग कर रहे है.... और इसी का नतीजा है कि चुनावी साल के सारे सर्वे मोदी को उनके विरोधियों से काफी आगे बता रहे हैं.... जनता का रिस्पॉंस, सर्वे के परिणाम और सोशल मीडिया की लोकप्रियता का ही नतीजा है कि अब नरेंद्र मोदी, दल और प्रत्याशी से ऊपर उठकर खुद अपने नाम पर वोट मांग रहे हैं.... और विचारधारा, सिद्धांत, जैसे मुद्दों पर चर्चा की बजाय विकास, अकाउंटेबिलिटी, और गुड गवर्वेंस जैसे मुद्दें मोदी के भाषणों की सुर्खियां बनीं हुई है.... दरअसल, मोदी के भाषणों में भ्रष्टाचार और महगाई से त्रस्त जनता को एक उम्मीद सी दिख रही है..... लेकिन मोदी को समझना चाहिए कि उम्मीदों की सवारी शेर की सवारी की तरह खतरनाक होती है..... आप जब उम्मीदों की लहर पर सवार होते है, तो आपको महाबली होने का एहसास होता है... लेकिन आप शेर की पीठ से या उम्मीदों की लहर से उतर नहीं सकते... यह मारक हो सकता है..... ऐसे में अगर वे जनता के उम्मीदों पर खरे उतरते है, तो मुमकिन है कि ये लहर सुनामी में बदल सकती है.... अगर विफल रहे तो उसका खामियाजा आप के साथ-साथ भारतीय राजनीति के लिए भी बुरा साबित हागा....क्योंकि उम्मीद और सपनों की मौत से बुरा कुछ भी नहीं होता।

Friday, 11 April 2014

खास आदमी पार्टी ‘घोषणात्र’

चुनावी समर में गोता लगाने के लिए हमारी पार्टी यानि खास आदमी पार्टी ने भी अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है... हमारे इस घोषणापत्र में खास बात यह है कि हमने ज़्यादातर युवाओं की समस्या को तरजीह दिया है... ताकि ज़यादा से ज़्यादा युवा हमारी पार्टी से जुड़ सके, तो घोषणापत्र इस प्रकार है:-
1-हमारी पार्टी ने महसूस किया है कि आज के युवाओं की असली समस्या रोटी, कपड़ा और मकान नहीं, बल्कि फेसबुक पर उनके कुछ कमीने टाइप दोस्तों द्वारा उनके वॉल पर फोटो टैग किए जाने की है….. लिहाजा हम अगर सत्ता में आए, तो फेसबुक टैगिंग को अपराध की श्रेणी में डाला जाएगा…. और दोषी शख़्स को ताउम्र दूसरों की फोटो में टैग होने और उनपर कमेंट करने की सजा सुनेई जाएगी।
2-हमने देखा है कि हमारे देश के पुरूषों की समस्या टाई बांधने की है.... और देश के 90 फीसदी पुरूष टाई नहीं बांध पाते है.... ख़ास कर वो टीवी एंकर, जो टीवी पर तो हमेशा कोशिश करते रहते है, बुधजिवी बनने की.... लेकिन साच्चाई ये हैं कि वो आपना टाई तक नहीं बांध पाते..... इसलिए हम अगर सत्ता में आए, तो हर छोटे-बड़े शहरों में टाई बांधना सिखाने के लिए स्कूल खोलेंगे.... इससे दो फायदा होगा एक तो पुरूष टाई बांधना सीख जाएंगे.... और दूसरा कि इससे उन लड़कियों को नोकरी मिलेगी, जो टाई बांधना जानती हो।
3-तीसरी बड़ी समस्या मल्टीप्लैक्सों में 10 रूपये के पॉपकार्न को कागज़ की बाल्टी में डालकर 150 रूपया में बेचा जाना है.... इस तरह से ये दुकानदार हमारे देश की भोली जनता को ढग रहें हैं, लिहाजा हम ख़ास अदमी पार्टी इसकी जगह सीधे झालमूड़ी वालों को मल्टीपलैकस में रेहड़ी लगाने की इजाज़त देंगे.... इसके अलावा महंगे पानी के बोटल से बचने के लिए मल्टीपलैक्स के अंदर ही हेडपंप भी लगवाएंगे।
4-युवाओं को जितनी ज़रूरत नौकरी की है, उतनी ही गर्लफ्रैंड की भी है... हम सत्ता में आए तो राइट टू गर्लफ्रैंड कानून लागू करेंगे, जिसके तहत उन तमाम शर्मीले लड़कों को गर्लफ्रैंड बनाने में 50 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा।
5-अब युवाओं के पास ज़्यादा गर्लफैंड होगीं, तो पैसों की भी ज़रूरत पड़ेगी... लिहाजा हम युवाओँ के लिए युवा पेंशन योजना लागू करेंगे जिसके तहत सभी मां-बाप को अपने बेटे-बेटियों को हर महीने गर्लफैंड-ब़यफैंड पर उड़ाने के लिए एक निश्चित रकम दी जाएगी।
6-हमने देखा है कि लड़कियों के लिए गोल गप्पे की बढ़ती महंगाई सबसे बड़ी समस्या है... लिहाजा हम अगर प्रधानमंत्री बने तो सभी गोल गप्पे वाले भइया से एक के साथ एक फ्री गोल गप्पा दिलवाने का भी भरोसा देते हैं।

मुद्दे और भी हैं लेकिन चुनाव आयोग का डर है... जिस कारण हम और वादा नहीं कर सकते, लेकिन सत्ता में आए तो इतना वादा ज़रूर करते है कि किसी युवाओं को कोई समस्या नहीं होने देंगे.... हमारा नारा है, युवाओं का हाथ, खास आदमी के साथ.... सबका साथ, खुदका विकास।