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Thursday, 26 December 2013

इसे हार नहीं त्याग कहिए जनाब!

                  
दक्षिण अफ्रीका में वनडे सीरीज में मिली शर्मनाक हार के बाद.. टीम इंडिया की टेस्ट में भी कमोबेश वही स्थिति दिख रही है...हालांकि पहले टेस्ट में हार तो नहीं मिली...लेकिन इसे हार से कम भी नहीं कहेंगे...क्योंकि जीते मैच को टीम मुश्किल से ड्रॉ करवा पाई...एक तरह से ये हार ही तो है...टीम इंडिया की इस दुर्दशा की खबर लेने बकवास ख़बर के संवाददाता टीम इंडिया के अधिकारी से बात करने दक्षिण अफ्रीका पहुंचे....पेश है इस बातचीत के कुछ खास अंशः-
संवाददाता- अभी कुछ दिन पहले भारत अपने घर में, तो टकाटक जीत रही थी.. तो दक्षिण अफ्रीका पहुंचते ही ऐसा क्या हुआ कि अब टीम जीतना ही भूल गई?
अधिकारी- किसने कहा हम हार रहे हैं...कृपया! इसे हार ना कहें जनाब...ये तो त्याग है...घरेलू मैदान पर जीत का रिकॉर्ड नहीं देख रहें क्या...हम टेस्ट में नंबर वन बने...विश्वविजेता बने...घरेलू मैदान पर हमने ऑस्ट्रेलिया से लेकर वेस्टइंडीज तक को लगातार एक के बाद एक हराते आ रहे थे...सो हमने सोचा ऐसे में सभी टीम क्या सोचेंगी...वो हम से डर जाएंगी...वो सोचेंगी कि इस खेल में अब हमारे लिए बचा ही क्या है...तब कहीं ऐसा ना हो कि वो खेलना ही छोड़ दें...फिर हम हराएंगे किसे...इसलिए बीच-बीच में जीत का त्याग करना जरुरी है...सो हमने एक टीम ढूंढी और हार गए।
संवाददाता- ऐसा कहा जा रहा है कि टीम इंडिया सिर्फ घरेलू शेर है!
अधिकारी- देखिए, ये बिलकुल गलत है...हमने जिम्बाब्वे को उसी की धरती पर हराया...वेस्टइंडीज को भी उसी के घर में घुस कर हराया...श्रीलंका, बांग्लादेश को तो हमेशा हमारी टीम उसी की जमीन पर जा कर हराती रही है...फिर आप कैसे हमारी टीम को घरेलू शेर कह सकते हैं।
संवाददाता- सारे खिलाड़ी इतने अच्छे फॉर्म में चल रहे थे..तो अचानक से इस निराशा जनक प्रदर्शन का कारण क्या है?
अधिकारी- आप मीडिया वाले हमेशा नेगिटिव ही सोचते हैं...और नेगिटिव ही दिखाते हैं।
संवाददाता- वो कैसे?
अधिकारी- आप कहते हैं कि टीम इंडिया अचानक से इतनी निराशा जनक प्रदर्शन क्यों करने लगी...वहीं आप ये क्यों नहीं कहते कि दक्षिण अफ्रीका की टीम अच्छी खेल रही है।
संवाददाता- ऐसा कहा जा रहा है कि इस टेस्ट में अगर इशांत शर्मा ने थोड़ी कोशिश की होती तो ये मैच हम हार भी सकते थे।
अधिकारी- ऐसा कहना गलत होगा...देखिए, हमारे टीम में ऐसे कई गेंदबाज हैं..जो किसी भी परिस्थिति में मैच हरा सकते हैं...आप चाहे 500 का टारगेट क्यों ना दे दें...इसमें आप अकेले किसी एक गेंदबाज को श्रेय नहीं दे सकते...वरना बाकी के गेंदबाज बुरा मान जाएंगे.... आखिर उनमें भी हरवाने का हुनर है।
संवाददाता- इस टेस्ट को लेकर धोनी की कप्तानी पर भी सवाल उठने लगे हैं।
अधिकारी- लो, टेस्ट में नंबर वन बनाया, वनडे में नंबर वन, वर्ल्ड कप जीतवाया, टी-20 का चैम्पियन बनाया, चैम्पियंस ट्रॉफी जीतवाया.... अब क्या बच्चे की जान लोगे.... सिर्फ जीतते ही रहें.... मशीन बन जाएं क्या...अपना धर्म भूला दें...क्या लेकर आए थे, क्या लेकर जाएंगे...अब बेचारा त्याग भी ना करें...जितना नाम कमाना था कमा लिया, जितना पैसा कमाना था कमा लिया, जितना विज्ञापन करना था कर लिया.... अब त्याग करने का समय आया है.... सो अब त्याग कर रहे हैं।
संवाददाता- अगले मैच के लिए आपकी रणनीति क्या होगी?

अधिकारी- देखिए, अगर गेंदबाजों ने मदद की तो हमे पूरा भरोसा है कि अगला मैच हम हार कर ये सीरीज 1-0 से दक्षिण अफ्रीका के नाम कर देंगे.... लेकिन अभी कुछ कहा नहीं जा सकता.... आप लोगों से एक विनती है कि कृपया! इसे हार ना कहें इसे त्याग कहें...और अपने दर्शकों को भी बताएं कि ये त्याग है...वैसे इस हार का बदला हम अपने घरेलू मैदान पर जरुर लेंगे।

Tuesday, 24 December 2013

चाय की चुस्की

                        

अभी कुछ दिन पहले ऑफीस से तीन दिनों की छुट्टी ले कर घर पे आराम कर रहा था.... इसी दौरान कॉलेज के कुछ दोस्तों से मिलने का प्लान बनाया.... लगभग दो साल बाद हमलोग मिलने वाले थे..... मिलने की जगह तय हुई हमारे कॉलेज से कुछ कदमों की दूरी पर थी एक चाय की दुकान..... जहां कॉलेज के समय हम लोगों का हमेशा जमावड़ा लगा करता था..... और ना जाने कई घटों तक वहां बैठ कर चाय के चुस्की के साथ गप्पे मारते रहते..... यही अपने फुर्सत के लम्हें को एक प्याली चाय की चुस्कियों में बिताने आते.... दो साल बाद जब एक बार फिर मिलने का मौका मिला तो सबने एक ही जगह चुना वही चाय की दुकान..... जी हां चाय की दुकान आप सब शायद हैरान हो कि इस मैकडोनाल्ड और पिज्जा हट की चकाचौंध भरी दुनिया में मिलने की जगह चुना भी तो चाय की दुकान ही तो भैया आपको बता दे कि चाय की दुकान का मजा भी एक अजीब मजा है..... हम कॉलेज लाइफ से लेकर ऑफीस लाइफ तक जहां भी जाते है..... एक ना एक चाय की दुकान ढूंढ़ ही लेते है..... और यही हम अपने फुर्सत के लम्हें को बिताने आते हैं.... और यही फुर्सत के बिताए हुए लम्हों को हम याद रखते हैं..... आपने भी तो कभी ना कभी अपने दोस्तों या सहकर्मियों के साथ दूर छिपे किसी कोने में चाय की दुकान पर एक प्याली चाय पी ही होगी..... है ना मजेदार, यहां आपको सर या मैडम कहते लड़का या लड़की नहीं दिखेंगी..... और ना ही आपको खाने के लिए लंबा सा किताबीनुमा मेनू थमाया जाएगा.... हम सभी दोस्त इस याद को ताजा करने के लिए वहां पहुंचे..... वहां पहुंच कर देखा, वहां का नजारा ही बदल चुका था..... नहीं बदली तो वो चाय की दुकान..... हां, लेकिन उस चाय की दुकान में भी कुछ चीजें समय के साथ बदल गई थी.... उस दुकान में अब पहले से ज्यादा सामान मिलने लगा था.... वहां अब एक बुढ़े अंकल की जगह एक नौजवान था.... मैंने पूछा, यहां जो अंकल बैढ़ते थे वो कहा गए.... उसने कहा कि उनके गुजरे तो एक साल हो गए..... यह सुनकर हम लोगों को बहुत दु:ख हुआ..... हम लोगों का उनसे कोई रिश्ता तो नहीं था और ना ही हम उनके नाम जानते थे.... लेकिन उनसे एक प्याली चाय का रिश्ता था.... और हम लोग उन्हें चाय वाले अंकल के नाम से जानते थे.... ना सिर्फ उस अंकल बल्कि यहां आने वाले सभी लोगों के बीच एक अनुठा रिश्ता बन गया था.... यहां हम एक दूसरे को नाम से नहीं, उनकी मौजूदगी से जानते थे..... यहां किसी को शायरी वाले भैया, किसी को पल्सर वाले भैया, किसी को सलमान खान तो किसी को अमिताभ बच्चन के नाम से जाना जाता था..... कोई यहां आर्थिक मंदी का रोना रोता तो कोई बेरोजगारी का..... कोई यहां विराट और धोनी को क्रिकेट का गुर सिखाता..... तो कोई राजनेता को राजनीतिक गुर..... ऐसा लगता मानो तमाम आर्थशात्री, वैज्ञानीक, क्रिकेटर, एक्टर, राजनेता यही से पनपेंगे..... और कांग्रेस बीजेपी को चुनावी रणनीति यही से बनवानी चाहिए..... जब हम लोग यहां मिले तो इन्ही सब यादों को ताजा कर रहे थे..... यकीन मानीए ये किसी पांच सितारा होटल से कम मजेदार नहीं था।