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Saturday, 16 November 2013

तेंदुलकर युग का अंत

                                                          
क्रिकेट के भगवान विदाई के लिए तैयार थे..... उनके भक्त भी अपने भगवान के मैदान में अंतिम दर्शन के लिए तैयार थे..... क्रिकेट का मंदिर भी सज चुका था..... क्रिकेट में भगवान का खिताब हासिल कर चुके सचिन रमेश तेंदुलकर अपने क्रिकेट करियर के आखिरी चरण में उपलब्धियों के पहाड़ पर बैठे हैं..... क्रिकेट में सौ शतक और ऐसे ही ढेर सारे रिकॉर्ड जिनके बारे में फिलहाल यही कहा जा सकता है कि वे हमेशा अछूते ही रहेंगे..... आज वह जिस मुकाम पर खड़े है उसके लिए उन्होंने खुद को 11 साल की उम्र में ही क्रिकेट को समर्पित कर दिया था.... उनकी यह पूजा मुंबई के शारदाश्रम स्कूल से शुरू हई थी..... और फिर 1989 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में प्रदार्पण के साथ ही क्रिकेट में तेंदुलकर युग की शुरुआत हो गई..... तब से लेकर आज तक क्रिकेट की दुनिया में सिर्फ तेंदुलकर नाम का ही डंका बजता रहा..... लगभग ढ़ई दशक तक इस तरह की निरंतरता बनाए रखना आसान नहीं था..... शायद यह सिर्फ सचिन ही कर सकते थे..... हलांकि कई और क्रिकेटरों में भी समर्पण, प्रतिबध्दता, जुनून, जज्बा और रनों की भुख रही लेकिन उन्होंने इस भारतीय बल्लेबज की तरह मीरा बनके क्रिकेट को कृष्ण के तरह प्यार में अपना सबकुछ न्योछावर करने की कोशिश नहीं की..... दुनिया ने तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान माना लेकिन वह हमेशा एक ऐसा इंसान बने रहे जिन्होंने क्रिकेट को ही अपना भगवान बनाया और उसकी सच्ची मन से पूजा की..... उसकी यही भक्ति मैदान के अंदर और बाहर हर जगह दिखती रही..... सचिन एक अदभुत आक्रामक बल्लेबाज तो रहे ही, एक अत्यंत दिमागी बल्लेबाज भी माने जाते रहे..... गेंदबाज की सोच से वह एक कदम आगे ही रहते थे..... यही कारण था कि अपने जवाने के वसीम अकरम, वकार यूनुस, एलन डोनाल्ड जैसे तेज गेंदबाज भी उन्हें कभी तंग नहीं कर पाए..... उनका खेल हमेशा शास्त्रीय किस्म का होता था..... फुटवर्क, टाइमिंग और गेंद को दो क्षेत्ररक्षकों के बीच से निकालने की उनकी कला का कोई सानी नहीं था..... हालांकि किसी अन्य खिलाड़ी की तरह क्रिकेट के इस भगवान के करियर में भी कई बार उतार चढाव आए.... और कुछ लोगों ने उन्हें सलाहे भी दी कि अब उन्हें मैदान छोड़ देना चाहिए..... लेकिन उनके भक्तों ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा..... जबकी भारत जैसे भावुक देश में शीर्ष पर लंबे समय तक टिके रहना आसान नहीं होता...... यहां हर एक मिनट में आपको हिरो और अगली ही असफलता में आपको जीरो साबित करने के लिए लोग तैयार रहते है..... करोड़ों लोगों की अपेक्षाओं का भार उठाकर इतने लंबे समय तक शीर्ष पर बने रहना असंभव है...... लेकिन सचिन तेंदुलकर में यही सबसे बड़ी खासियत है कि वह आलोचना से कभी घबराए नहीं...... और हमेशा अपने आलोचकों को वह अपने बल्ले से जवाब दिया..... क्रिकेट में उनके अदभुत योगदान को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनके संन्यास के साथ ही क्रिकेट से एक युग यानी तेंदुलकर युग की समाप्ति हो गई है..... सचिन के बिना क्रिकेट अधुरा सा लगेगा...... सचिन खुद संन्यास की घोषणा करते समय भावुक होकर कहा था कि मालूम नहीं क्रिकेट के बिना वो कैसे जिएंगे...... आज जो हाल सचिन का हैं, वहीं हाल उनके प्रशंसकों का भी हैं...... प्रशंसक कह रहे हैं, जिएं तो जिए कैसे, बिन आपके
बहरहाल सचिन के भक्त को मानना होगा कि वक्त किसी के लिए नहीं ठहरता...... उम्र किसी को नहीं बखशती..... फिर चाहे वो क्रिकेट के भगवान ही क्यों ना हो...... क्रिकेट अब भी खेला जाएगा और कई महान क्रिकेटर ओर भी आएंगे...... हो सकता है की सचिन का रिकॉर्ड भी टुट जाए..... क्योंकि रिकोर्ड टुटने के लिए ही बनते है..... पर क्रिकेट में अब सचिन जैसा भगवान दूसरा नहीं आएंगा...... अब शायद ही कोई एसा खिलाड़ी होगा जिसके लिए कोई प्रशंसक पूरे बदन को तिरंगे में पेंटिंग कर उनके सभी मैच देखने के लिए मुजफ्फरपुर से साइकिल पर चल कर आए...... शायद ही कोई खिलाड़ी मिले जो अपने प्रशंसक को घर बुलाकर साथ में खाना खाए...... शायद ही एसा कोई खिलाड़ी मिले जिसकी प्रशंसा उनके विरोधी भी करें..... शायद ही कोई खिलाड़ी मिले जो 24 सालों तक बिना थके, बिना रुके सिर्फ अपने देश के लिए खेलता ही जाए..... इतनी सुनहरी यादें देने के लिए आज पूरी दुनिया यही कह रही हैं शुक्रिया सचिन!...... पूरी दुनिया ही क्या आज अगर वानखेड़े स्टेडियम भी बोल पाता तो शायद यही कहता शुक्रिया सचिन! अलविदा सचिन! सलाम सचिन!