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Sunday, 8 September 2013

अखिलेश राज की सच्चाई

मुजफ्फरनगर में एक संप्रदाय की लडकी से दूसरे संप्रदाय का युवक छेड़छाड़ करता है…. तो लड़की का भाई क्रोध में आकर अपनी बहन से बदतमीजी करने वाले युवक की हत्या कर देता है….. इसपर दूसरे पक्ष के कुछ युवक मिलकर उस युवती के दो भाइयों को मार डालते हैं.... फिर इस अपराध कथा का राजनैतिक फायदा उठाने के लिए एक राजनैतिक दल के कट्टरपंथी संगठन महापंचायत के नाम पर महासभा बुलाते हैं.... और वहां जमकर दूसरे संप्रदाय के विरूद्ध ज़हर उगला जाता है.... कुल मिला कर एक अपराध से शुरू हुई यह आग धर्म आधारित वोटों के ध्रुवीकरण का हथियार बन जाती है.... राजनीति का यह घृणित खेल अभी थमा नहीं है.... सपा और भाजपा दोनों इस दंगे को अपने अपने पक्ष भुनाने में लगी हैं.... तो वहीं कांग्रेस भी इस दंगे की आग में राजनीति की रोटियां सेंक रही है..... ये कोई पहला मौका नहीं है.... जब यूपी में अखिलेश के राज में सांप्रदायिक हिंसा हुआ हो.... एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 2012 में सांप्रदायिक हिंसा के 104 मामले दर्ज किए गए थे.... गृह मंत्रालय की इस रिपोर्ट में लिखा है कि 100 से ज्यादा दंगों में 34 लोगों की मौत हुई और 456 जख्मी हो गए.... अखिलेश राज के पहले 12 महीने कानून व्यवस्था के लिहाज से बदतर साबित हुए हैं... और इसने प्रचंड बहुमत की सरकार की हैसियत को ही सवालों के घेरे में कर दिया है..... अगर बात पिछले साल यानी 2012 की करें.... तो साल 2012 में 1 जून को मथुरा में,  23 जून को प्रतापगढ़,  23 जुलाई और 11 अगस्त को दो बार बरेली में दंगे हुए.... इतना ही नहीं,  17 अगस्त को लखनऊ,  कानपुर,  इलाहाबाद में सड़कों पर उपद्रव हुआ तो 17 सितंबर को गाजियाबाद के मसूरी इलाके में बवाल.... 24 अक्टूबर को फैजाबाद में दंगे हुए.... इस साल 5 मार्च 2013 को अंबेडकरनगर के टांडा में हत्या के बाद बवाल हुआ.... और अब मुजफ्फरनगर के हालात सुधारे नहीं सुधर रहे हैं..... यही अखिलेश राज की सच्चाई है।