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Thursday, 26 December 2013

इसे हार नहीं त्याग कहिए जनाब!

                  
दक्षिण अफ्रीका में वनडे सीरीज में मिली शर्मनाक हार के बाद.. टीम इंडिया की टेस्ट में भी कमोबेश वही स्थिति दिख रही है...हालांकि पहले टेस्ट में हार तो नहीं मिली...लेकिन इसे हार से कम भी नहीं कहेंगे...क्योंकि जीते मैच को टीम मुश्किल से ड्रॉ करवा पाई...एक तरह से ये हार ही तो है...टीम इंडिया की इस दुर्दशा की खबर लेने बकवास ख़बर के संवाददाता टीम इंडिया के अधिकारी से बात करने दक्षिण अफ्रीका पहुंचे....पेश है इस बातचीत के कुछ खास अंशः-
संवाददाता- अभी कुछ दिन पहले भारत अपने घर में, तो टकाटक जीत रही थी.. तो दक्षिण अफ्रीका पहुंचते ही ऐसा क्या हुआ कि अब टीम जीतना ही भूल गई?
अधिकारी- किसने कहा हम हार रहे हैं...कृपया! इसे हार ना कहें जनाब...ये तो त्याग है...घरेलू मैदान पर जीत का रिकॉर्ड नहीं देख रहें क्या...हम टेस्ट में नंबर वन बने...विश्वविजेता बने...घरेलू मैदान पर हमने ऑस्ट्रेलिया से लेकर वेस्टइंडीज तक को लगातार एक के बाद एक हराते आ रहे थे...सो हमने सोचा ऐसे में सभी टीम क्या सोचेंगी...वो हम से डर जाएंगी...वो सोचेंगी कि इस खेल में अब हमारे लिए बचा ही क्या है...तब कहीं ऐसा ना हो कि वो खेलना ही छोड़ दें...फिर हम हराएंगे किसे...इसलिए बीच-बीच में जीत का त्याग करना जरुरी है...सो हमने एक टीम ढूंढी और हार गए।
संवाददाता- ऐसा कहा जा रहा है कि टीम इंडिया सिर्फ घरेलू शेर है!
अधिकारी- देखिए, ये बिलकुल गलत है...हमने जिम्बाब्वे को उसी की धरती पर हराया...वेस्टइंडीज को भी उसी के घर में घुस कर हराया...श्रीलंका, बांग्लादेश को तो हमेशा हमारी टीम उसी की जमीन पर जा कर हराती रही है...फिर आप कैसे हमारी टीम को घरेलू शेर कह सकते हैं।
संवाददाता- सारे खिलाड़ी इतने अच्छे फॉर्म में चल रहे थे..तो अचानक से इस निराशा जनक प्रदर्शन का कारण क्या है?
अधिकारी- आप मीडिया वाले हमेशा नेगिटिव ही सोचते हैं...और नेगिटिव ही दिखाते हैं।
संवाददाता- वो कैसे?
अधिकारी- आप कहते हैं कि टीम इंडिया अचानक से इतनी निराशा जनक प्रदर्शन क्यों करने लगी...वहीं आप ये क्यों नहीं कहते कि दक्षिण अफ्रीका की टीम अच्छी खेल रही है।
संवाददाता- ऐसा कहा जा रहा है कि इस टेस्ट में अगर इशांत शर्मा ने थोड़ी कोशिश की होती तो ये मैच हम हार भी सकते थे।
अधिकारी- ऐसा कहना गलत होगा...देखिए, हमारे टीम में ऐसे कई गेंदबाज हैं..जो किसी भी परिस्थिति में मैच हरा सकते हैं...आप चाहे 500 का टारगेट क्यों ना दे दें...इसमें आप अकेले किसी एक गेंदबाज को श्रेय नहीं दे सकते...वरना बाकी के गेंदबाज बुरा मान जाएंगे.... आखिर उनमें भी हरवाने का हुनर है।
संवाददाता- इस टेस्ट को लेकर धोनी की कप्तानी पर भी सवाल उठने लगे हैं।
अधिकारी- लो, टेस्ट में नंबर वन बनाया, वनडे में नंबर वन, वर्ल्ड कप जीतवाया, टी-20 का चैम्पियन बनाया, चैम्पियंस ट्रॉफी जीतवाया.... अब क्या बच्चे की जान लोगे.... सिर्फ जीतते ही रहें.... मशीन बन जाएं क्या...अपना धर्म भूला दें...क्या लेकर आए थे, क्या लेकर जाएंगे...अब बेचारा त्याग भी ना करें...जितना नाम कमाना था कमा लिया, जितना पैसा कमाना था कमा लिया, जितना विज्ञापन करना था कर लिया.... अब त्याग करने का समय आया है.... सो अब त्याग कर रहे हैं।
संवाददाता- अगले मैच के लिए आपकी रणनीति क्या होगी?

अधिकारी- देखिए, अगर गेंदबाजों ने मदद की तो हमे पूरा भरोसा है कि अगला मैच हम हार कर ये सीरीज 1-0 से दक्षिण अफ्रीका के नाम कर देंगे.... लेकिन अभी कुछ कहा नहीं जा सकता.... आप लोगों से एक विनती है कि कृपया! इसे हार ना कहें इसे त्याग कहें...और अपने दर्शकों को भी बताएं कि ये त्याग है...वैसे इस हार का बदला हम अपने घरेलू मैदान पर जरुर लेंगे।

Tuesday, 24 December 2013

चाय की चुस्की

                        

अभी कुछ दिन पहले ऑफीस से तीन दिनों की छुट्टी ले कर घर पे आराम कर रहा था.... इसी दौरान कॉलेज के कुछ दोस्तों से मिलने का प्लान बनाया.... लगभग दो साल बाद हमलोग मिलने वाले थे..... मिलने की जगह तय हुई हमारे कॉलेज से कुछ कदमों की दूरी पर थी एक चाय की दुकान..... जहां कॉलेज के समय हम लोगों का हमेशा जमावड़ा लगा करता था..... और ना जाने कई घटों तक वहां बैठ कर चाय के चुस्की के साथ गप्पे मारते रहते..... यही अपने फुर्सत के लम्हें को एक प्याली चाय की चुस्कियों में बिताने आते.... दो साल बाद जब एक बार फिर मिलने का मौका मिला तो सबने एक ही जगह चुना वही चाय की दुकान..... जी हां चाय की दुकान आप सब शायद हैरान हो कि इस मैकडोनाल्ड और पिज्जा हट की चकाचौंध भरी दुनिया में मिलने की जगह चुना भी तो चाय की दुकान ही तो भैया आपको बता दे कि चाय की दुकान का मजा भी एक अजीब मजा है..... हम कॉलेज लाइफ से लेकर ऑफीस लाइफ तक जहां भी जाते है..... एक ना एक चाय की दुकान ढूंढ़ ही लेते है..... और यही हम अपने फुर्सत के लम्हें को बिताने आते हैं.... और यही फुर्सत के बिताए हुए लम्हों को हम याद रखते हैं..... आपने भी तो कभी ना कभी अपने दोस्तों या सहकर्मियों के साथ दूर छिपे किसी कोने में चाय की दुकान पर एक प्याली चाय पी ही होगी..... है ना मजेदार, यहां आपको सर या मैडम कहते लड़का या लड़की नहीं दिखेंगी..... और ना ही आपको खाने के लिए लंबा सा किताबीनुमा मेनू थमाया जाएगा.... हम सभी दोस्त इस याद को ताजा करने के लिए वहां पहुंचे..... वहां पहुंच कर देखा, वहां का नजारा ही बदल चुका था..... नहीं बदली तो वो चाय की दुकान..... हां, लेकिन उस चाय की दुकान में भी कुछ चीजें समय के साथ बदल गई थी.... उस दुकान में अब पहले से ज्यादा सामान मिलने लगा था.... वहां अब एक बुढ़े अंकल की जगह एक नौजवान था.... मैंने पूछा, यहां जो अंकल बैढ़ते थे वो कहा गए.... उसने कहा कि उनके गुजरे तो एक साल हो गए..... यह सुनकर हम लोगों को बहुत दु:ख हुआ..... हम लोगों का उनसे कोई रिश्ता तो नहीं था और ना ही हम उनके नाम जानते थे.... लेकिन उनसे एक प्याली चाय का रिश्ता था.... और हम लोग उन्हें चाय वाले अंकल के नाम से जानते थे.... ना सिर्फ उस अंकल बल्कि यहां आने वाले सभी लोगों के बीच एक अनुठा रिश्ता बन गया था.... यहां हम एक दूसरे को नाम से नहीं, उनकी मौजूदगी से जानते थे..... यहां किसी को शायरी वाले भैया, किसी को पल्सर वाले भैया, किसी को सलमान खान तो किसी को अमिताभ बच्चन के नाम से जाना जाता था..... कोई यहां आर्थिक मंदी का रोना रोता तो कोई बेरोजगारी का..... कोई यहां विराट और धोनी को क्रिकेट का गुर सिखाता..... तो कोई राजनेता को राजनीतिक गुर..... ऐसा लगता मानो तमाम आर्थशात्री, वैज्ञानीक, क्रिकेटर, एक्टर, राजनेता यही से पनपेंगे..... और कांग्रेस बीजेपी को चुनावी रणनीति यही से बनवानी चाहिए..... जब हम लोग यहां मिले तो इन्ही सब यादों को ताजा कर रहे थे..... यकीन मानीए ये किसी पांच सितारा होटल से कम मजेदार नहीं था।

Saturday, 16 November 2013

तेंदुलकर युग का अंत

                                                          
क्रिकेट के भगवान विदाई के लिए तैयार थे..... उनके भक्त भी अपने भगवान के मैदान में अंतिम दर्शन के लिए तैयार थे..... क्रिकेट का मंदिर भी सज चुका था..... क्रिकेट में भगवान का खिताब हासिल कर चुके सचिन रमेश तेंदुलकर अपने क्रिकेट करियर के आखिरी चरण में उपलब्धियों के पहाड़ पर बैठे हैं..... क्रिकेट में सौ शतक और ऐसे ही ढेर सारे रिकॉर्ड जिनके बारे में फिलहाल यही कहा जा सकता है कि वे हमेशा अछूते ही रहेंगे..... आज वह जिस मुकाम पर खड़े है उसके लिए उन्होंने खुद को 11 साल की उम्र में ही क्रिकेट को समर्पित कर दिया था.... उनकी यह पूजा मुंबई के शारदाश्रम स्कूल से शुरू हई थी..... और फिर 1989 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में प्रदार्पण के साथ ही क्रिकेट में तेंदुलकर युग की शुरुआत हो गई..... तब से लेकर आज तक क्रिकेट की दुनिया में सिर्फ तेंदुलकर नाम का ही डंका बजता रहा..... लगभग ढ़ई दशक तक इस तरह की निरंतरता बनाए रखना आसान नहीं था..... शायद यह सिर्फ सचिन ही कर सकते थे..... हलांकि कई और क्रिकेटरों में भी समर्पण, प्रतिबध्दता, जुनून, जज्बा और रनों की भुख रही लेकिन उन्होंने इस भारतीय बल्लेबज की तरह मीरा बनके क्रिकेट को कृष्ण के तरह प्यार में अपना सबकुछ न्योछावर करने की कोशिश नहीं की..... दुनिया ने तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान माना लेकिन वह हमेशा एक ऐसा इंसान बने रहे जिन्होंने क्रिकेट को ही अपना भगवान बनाया और उसकी सच्ची मन से पूजा की..... उसकी यही भक्ति मैदान के अंदर और बाहर हर जगह दिखती रही..... सचिन एक अदभुत आक्रामक बल्लेबाज तो रहे ही, एक अत्यंत दिमागी बल्लेबाज भी माने जाते रहे..... गेंदबाज की सोच से वह एक कदम आगे ही रहते थे..... यही कारण था कि अपने जवाने के वसीम अकरम, वकार यूनुस, एलन डोनाल्ड जैसे तेज गेंदबाज भी उन्हें कभी तंग नहीं कर पाए..... उनका खेल हमेशा शास्त्रीय किस्म का होता था..... फुटवर्क, टाइमिंग और गेंद को दो क्षेत्ररक्षकों के बीच से निकालने की उनकी कला का कोई सानी नहीं था..... हालांकि किसी अन्य खिलाड़ी की तरह क्रिकेट के इस भगवान के करियर में भी कई बार उतार चढाव आए.... और कुछ लोगों ने उन्हें सलाहे भी दी कि अब उन्हें मैदान छोड़ देना चाहिए..... लेकिन उनके भक्तों ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा..... जबकी भारत जैसे भावुक देश में शीर्ष पर लंबे समय तक टिके रहना आसान नहीं होता...... यहां हर एक मिनट में आपको हिरो और अगली ही असफलता में आपको जीरो साबित करने के लिए लोग तैयार रहते है..... करोड़ों लोगों की अपेक्षाओं का भार उठाकर इतने लंबे समय तक शीर्ष पर बने रहना असंभव है...... लेकिन सचिन तेंदुलकर में यही सबसे बड़ी खासियत है कि वह आलोचना से कभी घबराए नहीं...... और हमेशा अपने आलोचकों को वह अपने बल्ले से जवाब दिया..... क्रिकेट में उनके अदभुत योगदान को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनके संन्यास के साथ ही क्रिकेट से एक युग यानी तेंदुलकर युग की समाप्ति हो गई है..... सचिन के बिना क्रिकेट अधुरा सा लगेगा...... सचिन खुद संन्यास की घोषणा करते समय भावुक होकर कहा था कि मालूम नहीं क्रिकेट के बिना वो कैसे जिएंगे...... आज जो हाल सचिन का हैं, वहीं हाल उनके प्रशंसकों का भी हैं...... प्रशंसक कह रहे हैं, जिएं तो जिए कैसे, बिन आपके
बहरहाल सचिन के भक्त को मानना होगा कि वक्त किसी के लिए नहीं ठहरता...... उम्र किसी को नहीं बखशती..... फिर चाहे वो क्रिकेट के भगवान ही क्यों ना हो...... क्रिकेट अब भी खेला जाएगा और कई महान क्रिकेटर ओर भी आएंगे...... हो सकता है की सचिन का रिकॉर्ड भी टुट जाए..... क्योंकि रिकोर्ड टुटने के लिए ही बनते है..... पर क्रिकेट में अब सचिन जैसा भगवान दूसरा नहीं आएंगा...... अब शायद ही कोई एसा खिलाड़ी होगा जिसके लिए कोई प्रशंसक पूरे बदन को तिरंगे में पेंटिंग कर उनके सभी मैच देखने के लिए मुजफ्फरपुर से साइकिल पर चल कर आए...... शायद ही कोई खिलाड़ी मिले जो अपने प्रशंसक को घर बुलाकर साथ में खाना खाए...... शायद ही एसा कोई खिलाड़ी मिले जिसकी प्रशंसा उनके विरोधी भी करें..... शायद ही कोई खिलाड़ी मिले जो 24 सालों तक बिना थके, बिना रुके सिर्फ अपने देश के लिए खेलता ही जाए..... इतनी सुनहरी यादें देने के लिए आज पूरी दुनिया यही कह रही हैं शुक्रिया सचिन!...... पूरी दुनिया ही क्या आज अगर वानखेड़े स्टेडियम भी बोल पाता तो शायद यही कहता शुक्रिया सचिन! अलविदा सचिन! सलाम सचिन!








Thursday, 10 October 2013

'भगवान' का संन्यास

बेजोड़... बेमिसाल... बेहतरीन... लासानी... लाजवाब... यही कुछ विशेषण बचे रह गए हैं, जिनसे इस खिलाड़ी का ज़िक्र किया जाना मुमकिन रह गया है... लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये सभी विशेषण के बावजूद भी अन्दर कहीं महसूस होता है कितना भी कह लें तारीफ में, कम ही रहेगा... बार-बार, लगातार ऐसा ही माहौल बनाता जा रहा है यह खिलाड़ी, हम समझ ही नहीं पा रहे, क्या-क्या कहे, और क्या रहने दें... इस खिलाड़ी ने कई बार साबित किया है कि उम्र सिर्फ एक आंकड़ा है, जो आपके जज़्बे और जुनून से बड़ा नहीं हो सकता... फिटनेस, जज़्बा, और जोश उम्र का मोहताज कतई नहीं होता... जिस उम्र से काफी पहले ही बेहतरीन कहे जाने वाले अन्य खिलाड़ी घर बैठ चुके थे, उस उम्र में भी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बने रहना उपलब्धि नहीं है... इस खिलाड़ी ने हमेशा साबित किया कि इसकी तुलना के लिए इसके अलावा किसी भी और खिलाड़ी को ढूंढना लगभग असंभव है... इस बेमिसाल खिलाड़ी ने हमेशा ऐसे कारनामे किए, जो हमेशा अकल्पनीय लगते रहे... अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 100 शतक ठोकना ये एक सपने से कम नहीं है... लेकिन ऐसा इसी खिलाड़ी ने वनडे में सबसे पहले किया…. पिछले दो दशकों से ये खिलाड़ी ऐसे मुकाम पर बैठा है, जहां पहुंचना एक सपने से कम नहीं है.... ये खिलाड़ी जहां-जहां खेला, रिकॉर्ड बनते चले गए... दुनिया में सर्वाधिक 463 एक-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच, और सर्वाधिक 198 टेस्ट मैच खेलने और सर्वाधिक 18,426 एक-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय रन और सर्वाधिक 15,837 टेस्ट रन इसी खिलाड़ी के नाम हैं... 'क्रिकेट का भगवान' कहे जाने वाले इस खिलाड़ी के मैदान में होते किसी और के नाम कोई भी रिकॉर्ड हमें अच्छा नहीं लगता... वन-डे हो या टेस्ट शायद ही कोई रिकॉर्ड हो, जो इस खिलाड़ी के नाम न हो... हां सबसे तेज़ अर्द्धशतक, सबसे तेज़ शतक, और टेस्ट मैच की एक पारी में 400 रन सिर्फ यही वो आंकड़े हैं, जो इसके नाम के साथ नहीं जुड़े हैं... लेकिन भूलना नहीं चाहिए यह खिलाड़ी अब भी दो मैच खेलेगाआप कहेंगे, इतना कुछ कह दिया, एक बार भी खिलाड़ी का नाम नहीं बताया... यकीन मानिए, मुझे नाम कहने की ज़रूरत महसूस नहीं हो रही है, इस लिए नहीं कहा... आप ही कहिए, इतना कुछ कहने के बाद नाम बताने की ज़रूरत है क्या...?


Sunday, 8 September 2013

अखिलेश राज की सच्चाई

मुजफ्फरनगर में एक संप्रदाय की लडकी से दूसरे संप्रदाय का युवक छेड़छाड़ करता है…. तो लड़की का भाई क्रोध में आकर अपनी बहन से बदतमीजी करने वाले युवक की हत्या कर देता है….. इसपर दूसरे पक्ष के कुछ युवक मिलकर उस युवती के दो भाइयों को मार डालते हैं.... फिर इस अपराध कथा का राजनैतिक फायदा उठाने के लिए एक राजनैतिक दल के कट्टरपंथी संगठन महापंचायत के नाम पर महासभा बुलाते हैं.... और वहां जमकर दूसरे संप्रदाय के विरूद्ध ज़हर उगला जाता है.... कुल मिला कर एक अपराध से शुरू हुई यह आग धर्म आधारित वोटों के ध्रुवीकरण का हथियार बन जाती है.... राजनीति का यह घृणित खेल अभी थमा नहीं है.... सपा और भाजपा दोनों इस दंगे को अपने अपने पक्ष भुनाने में लगी हैं.... तो वहीं कांग्रेस भी इस दंगे की आग में राजनीति की रोटियां सेंक रही है..... ये कोई पहला मौका नहीं है.... जब यूपी में अखिलेश के राज में सांप्रदायिक हिंसा हुआ हो.... एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 2012 में सांप्रदायिक हिंसा के 104 मामले दर्ज किए गए थे.... गृह मंत्रालय की इस रिपोर्ट में लिखा है कि 100 से ज्यादा दंगों में 34 लोगों की मौत हुई और 456 जख्मी हो गए.... अखिलेश राज के पहले 12 महीने कानून व्यवस्था के लिहाज से बदतर साबित हुए हैं... और इसने प्रचंड बहुमत की सरकार की हैसियत को ही सवालों के घेरे में कर दिया है..... अगर बात पिछले साल यानी 2012 की करें.... तो साल 2012 में 1 जून को मथुरा में,  23 जून को प्रतापगढ़,  23 जुलाई और 11 अगस्त को दो बार बरेली में दंगे हुए.... इतना ही नहीं,  17 अगस्त को लखनऊ,  कानपुर,  इलाहाबाद में सड़कों पर उपद्रव हुआ तो 17 सितंबर को गाजियाबाद के मसूरी इलाके में बवाल.... 24 अक्टूबर को फैजाबाद में दंगे हुए.... इस साल 5 मार्च 2013 को अंबेडकरनगर के टांडा में हत्या के बाद बवाल हुआ.... और अब मुजफ्फरनगर के हालात सुधारे नहीं सुधर रहे हैं..... यही अखिलेश राज की सच्चाई है।

Saturday, 31 August 2013

गांधीजी का सुझाव

कल रात मेरे सपने में महात्मा गांधी आए और मुझसे कहने लगे तुम लोगों ने मुझे कही का नहीं छोड़ा.... रुपये पर मेरा तस्वीर छाप दी है.... और रुपया गिरता जा रहा है.... एक डॉलर में अब 66 रुपया मिल रहा है….  डॉलर पर छपे अमेरिकन नेता जॉर्ज वॉशिंगटन मुझे चिढ़ाते हैं.... वो कहते है, गांधीजी, ये कहा आ गए आप, यू ही साथ साथ चलके..... 1947 में डॉलर और रुपये की हैसियत एक ही थी.... और अब तुम लोगों ने इसका क्या हाल बना दिया है.... मैंने पूछा गांधीजी तो फिर इसका उपय क्या है..... आप ही बता दो क्योंकि हमारी सरकार और आरबीआई की सारी कोशिशें नाकाम सावित हो रही है..... आप ही बताओँ कैसे सुधारे इस गिरते रुपये को..... गांधीजी ने कहा पहले तो नोट पर भले आदमी की फोटो लगाना छोड़ो.... और इस भ्रष्टाचार के जमाने में किसी भ्रष्टाचारी का फोटो लाचार नोट पे लगाओ..... तब जाके रुपये में सुधार होगा.... मैंने पूछा किसका लागाऊ.... उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचारी की भी कमी है तुम्हारे देश में..... ए राजा या कलमाड़ीजी की फोटू नोट पर लागाओ फिर देखना कैसे रुपये की वैल्यू गिरता है.... वो जिस आइटम को हाथ लगा दिया वहीं महंगा हो जाता है.... कॉमनवेल्थ में देखा कैसे सारी चिजों की कीमत सौ-दो सौ गुणा ज्यादा था.... उसी तरह जैसे ही कलमाड़ीजी का फोटू नोट पर लागाओगे समझो फिर 66 डॉलर में एक रुपया मिलने लगेगा।


























Wednesday, 28 August 2013

कब तक रोता रहेगा रुपया?



रुपया लगातार गिर रहा है..... ऐसे में ये सवाल उठना लाजमि है कि आखिर रुपये की ये हालत कैसे हुई.... इसका सबसे बड़ा कारन डॉलर का मजबूत होना है.... 2008 के मंदी के बाद अमेरिका ने खुद को मजबूत करने के लिए बाजार में करीब 2 खरब डॉलर डाले.... ये भारत चीन समेत कई देशों में लगी..... अब अमेरिका बाजार से अपने पैसे खिचने का बात कर रहा है.... जिसके चलते डॉलर का भाव तो बढ़ा है लेकिन भारत, दक्षिण अफ्रीका ब्राजील जैसे देशों की  मुद्रा गिर रही है..... वहीं रुपये की गिरने की दूसरी वजह ये है कि देश का व्यापार घाटा बढ़ गया है..... देश का आयात बढ़ गया है.... जबकि निर्यात घट गया है..... जिसके चलते देश में डॉलर कम आ रहा है..... तिसरी बजह है निवेश का हालत ठिक ना होना..... भारत में निवेश जबतक नहीं बढ़ेगा तबतक रुपये की हालत में सुधार नहीं होगा..... मतलब विदेशी कंपनियां देश में आएगी तो साथ में डॉलर भी लाएंगी.... रिटेल में अभी तक एफडीआई का फाइदा भी नहीं हुआ है..... कुल मिलाकर कहे तो विदेशी कंपनियों को हमारी अर्थव्यवस्था पर भड़ोसा ही नहीं है...... हाल्कि रुपये के गिरने की एक और बड़ी बजह है सरकार ने गरीबों की भलाई के लिए जमकर पैसे बहाये है..... मनरेगा जैसी योजना पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए है..... लेकिन उसके अनुपात में समाधान के लिए कोई कारगर उपय नहीं किया गया हैं..... अब सबाल उठता है कि रुपये गिरने का हमारे जेब पर उसका असर क्या होगा.... रुपये के गिरने से पेट्रोल डीजल महंगा होगा..... जिससे रोजमर्रा की सारी चीजें मंहगी होगी..... इसके अलावा सारी ब्रांडेड चीज और इलेकट्रोनिक सामान भी महंगा होगा..... इनसब के अलावा भारत की रेटिंग घटेगी..... रेटिंग घटने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार पर भड़ोसा नहीं करेंगे..... जिससे बाजार में विदेशी निवेश कम होगा..... और तब रुपये का हाल और भी खस्ता होगा..... इन सबके बीच सबाल उढ़ता है कि रुपया सभलेगा कैसे..... रुपया को सभालने के लिए डॉलर का इतजाम करना होगा..... जिसके लिए भारतीये अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेशकों के लाइक बनाना होगा..... आयात को कम करना होगा..... सोने के आयात पर लगाम लगानी होगी..... और निर्यात बढ़ानि होगी.... जिसके बाद ही रुपये में सुधार का माहौल बनेगा।

Tuesday, 5 March 2013

धोनी के सफलता का राज़!


                                     
सैमसन और डिलाइला की कहानी तो आपने सुनी होगी, इस पर एक फिल्‍म भी बन चुकी है....अगर नहीं सुनी तो अब सुनिए और सोचिए, ये आपको किसकी याद दिलाती है.....सैमसन एक महाशक्तिशाली पुरुष था, काफी  मन्नतों के बाद पैदा हुआ ये हीरो कईयों के लिए भगवान समान था.....परम शक्तिशाली योद्धा जो सिर्फ हाथों से शेरों का संहार कर देता था....ईश्वर ने एक शर्त पर उसे ये ताकत दी कि सैमसन कभी भी अपने बालों को नहीं काटेगा....सैमसन भगवान के बताए रास्ते पर चलता रहा.....वो एक बार में सैकड़ों दुश्मनों को धूल चटा देता.....युद्ध की अनूठी रणनीति से गांव के गांव तबाह कर देता.....फिर उसे डिलाइला नाम की एक लड़की से प्यार हो गया और जल्द ही दोनों ने शादी कर ली.....पर दुश्मनों ने उसकी पत्नी को सिक्कों से खरीद लिया और काम दिया सैमसन की अकूत शक्ति का राज़ जानने का.....पहले कुछ दिन तो सैमसन अपनी पत्‍नी को टालता रहा पर बहुत मानने के बाद उसने सच बता दिया....उस रात डिलाइला ने सैमसन के सारे बाल मुंडवा दिए.....सैमसन की पूरी शक्ति खत्म हो गई और उसे कैद कर लिया गया....सैमसन ने प्रायश्चित्त किया.....अपने बाल दोबारा उगाए और फिर ईश्वर से बस एक बार के लिए अपनी शक्ति वापस मांग ली....इस कहानी को सुनकर एक अजीब सा इत्तेफ़ाक का अहसास होता है.....विश्व कप की अगली सुबह याद आती है.....महेंद्र सिंह धोनी का सफ़ाचट सर याद आता है और याद आती है....उसके बाद की लाचारी.....जब धोनी को एक के बाद एक सीरिज में हार का सामना करना पड़ा और चारों तरफ उनकी कप्तानी की आलोचना होने लगी....लेकिन अब धोनी दोबारा अपना बाल बढ़ा रहें हैं....और दोबारा अपने रंग में लौट रहें हैं....लेकिन इस कहानी का अंत अभी बाकी है....अब देखना ये है कि इस कहानी का अंत क्य होता है?

Thursday, 14 February 2013

गर्लफ्रेंड न होने का अफ़सोस!


फरवरी को प्यार का महीना कहा जाता है क्योंकि इसके पहले ही हफ्ते से Valentine Week शुरु हो जाता है। 7 फरवरी को रोज़ डे से शुरू हुआ हफ़्ता प्रपोज़ डे, चॉकलेट डे, टेडी बियर डे, प्रॉमिस डे, हग डे, किस डे और फिर वैलेंटाइन डे पर ख़त्म हो जाता है।

अभी कुछ दिन पहले मेरा एक खास दोस्त मुझसे मिलने आया। उसने कहा ''दोस्त मैं घर जा रहा हूं।'' मैंने पूछा कब लौटोगे ? अब मार्च में ही लौटूंगा उसने कहा! मैंने कहा कि तुम से एक बात पुछनी थी, जो पिछले 2-3 सालों से पुछनी चाहता था। उसने कहा, क्या पूछों? यार लोग अक्सर अपने घर किसी त्यौहार या फंगसन में जाते है लेकिन फरवरी में न तो होली होती है न दिवाली और न ही दशहरा, तो फिर तुम हर वार फरवरी में ही घर क्यों जाते हो? उसने कहा, यार हर साल फरवरी के दूसरे सप्ताह यानी वैलेंटाइनी मौसम में यहां अच्छा नहीं लगता, जब भी प्रेमी जोड़ों को पार्क, मोल्स, काफ़ी शॉप या फिर सिनेमा घरों में एक दूसरे के बाहों में बाहें थामे देखता हूं तो मुझे अच्छा नहीं लगता और गर्लफ्रेंड न होने का अफ़सोस होता है! इस लिए हर बार घर चला जाता हूं। वहां अपने परिवार के साथ समय बीत जाता है और न ये सब देख पाता हूं और न ही कोई अफ़सोस होता है। मैने कहा, तो शादी क्यों नहीं कर लेते, यार बीबी में गर्लफ्रेंड वाली बात कहां होती उसने कहा!!! जब प्रेमी जोड़ों को सज-धज कर दिल के आकार के गुब्बरों के साथ रेस्तरों या पार्क में देखता हूं तो अंदर से जलन होती है और मन में अनायास एक सवाल उठता है.... वही गर्लफ्रेंड न होने का अफ़सोस.... गर्लफ्रेंड न होने का तब और ज्यादा अफ़सोस होता है, जब सुनता हूं कि आज-कल का लव ऑनलाइन हो गया है। यानी फेसबुक, व्हाट्सएप और स्काईप जैसे सोशल साइट पर चैटिंग फिर प्यार का इजहार धड़ल्ले से हो रहा है। ये सोच के परेशान हो जाता हूं कि इस वैलेंटाइन-डे के खास मौके पर अपनी चाहत का इजहार करने वालों को कितनी खुशी मिलती होगी। इन प्यार करने वालों के लिए कितने ऐसे चैटिंग-डेटिंग वाला साइट्स है, जो प्यार करने वाले जोड़ों को काफी करीब ला दिया है।

मैंने उसकी बातें सुन कर मन ही मन सोचने लगा कि सच में जब हम प्यार में होते है तो हमारी लाइफस्टाइल कितनी बदल जाती है। अपने प्यार के साथ बिताए एक-एक पल हम जिंदगी भर नहीं भूल पाते। जब हम अपने प्यार के साथ होते है तो हम सारे दुख-दर्द को भुला कर अपने प्यार के साथ खो जाते है और दिल करता है कि काश!!! ये पल यहीं थम जाए! आधुनिक परंपरा में उबल रहें इन युवाओं की भीड़ हमारे दोस्त जैसे उन तमाम पुरानी सोच वाले लोगों को ठेंगा दिखा कर खुल्लमखुल्ला अपने प्यार का इजहार करते हैं। वैसे तो वैलेंटाईन-डे का खुमार सभी प्यार करने वालों पर होता हैं, लेकिन खास कर मेट्रो शहर के युवाओं पर ज्यादा ही होता हैं। इन युवाओं के रोमांस को देख कर साफ पता चलता है कि प्यार कि तिलस्म बारिश में खोए इन प्रेमी जोड़ों के प्यार और लाइफस्टाइल में रुपहले पर्दे की रूमानी झलक साफ दिखाई देती हैं। यू तो प्यार करने का कोई दिन नहीं होता लेकिन वेलेंटाइन-डे के खास मौके पर हर एतिहासिक जगह, पार्क, मोल्स या फिर मूवी जैसे जगहों पर जा के एक दूसरे के हाथों में हाथ डाल के दो पल सुकून के दुनिया से बेखबर हो कर बीतते हैं। अपने प्यार को एक प्यारा सा तोहफा देने से भी नहीं चुकते। भले ही इसके लिए पैसा घरवालों से झूठ बोल के या दोस्तों से मांग के ही लिया हो लेकिन हम प्रेमी अपने प्रेमिका को इम्प्रेस करने के लिए हर वो कोशिश करते हैं, जिससे हमारी प्रेमिका मुस्कुरा सके।
बहरहाल अब आप इस वैलेंटाइन-डे किसके साथ मना रहें हैं या फिर आप भी मेरे दोस्त के तरह गर्लफ्रेंड न होने आप भी अफ़सोस कर रहे हैं, ये तो आप ही जाने! खैर आप सभी को हेपी वैलेंटाइन-डे ! 
  
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Thursday, 17 January 2013

शर्म करो इंडिया!





एक टीवी चैनेल पर इंटरव्यू के दौरान जब पाक विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार से पूछा गया कि पाकिस्तान बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है... एक तरफ कादरी साहब जनांदोलन चला रहे है और दूसरी तरफ पाक सुप्रीम कोर्ट प्रधानमन्त्री को भ्रष्टाचार के केस में गिरफ्तारी के वारंट जारी करने के आदेश दिए है....हिना रब्बानी का जबाव सुनकर मेरा ही नही पुरे भारत का सर शर्म से झुक गया...हिना रब्बानी ने कहा कि "विदेशी मीडिया पाकिस्तान की तारीफ क्यों नही कर रही है ? हमने कादरी साहब पर कोई पुलिसिया कार्रवाई नही की जबकि भारत ने बाबा रामदेव के उपर रात के दो बजे पुलिस कार्रवाई की थी... बच्चो और महिलाओ को बुरी तरह पीटा गया और एक महिला की मौत भी हो गयी...अगर ये कार्रवाई पाकिस्तान में हुई होती तो पूरा का पूरा पश्चिमी जगत पाकिस्तान को बर्बर और फेल देश घोषित कर देता ... आप पश्चिम वालो को भारत में हो रही घटनाये क्यों नही दिखती ? क्या आज तक पाकिस्तान पुलिस ने किसी जनआन्दोलन को रात के दो बजे सो रहे बुजुर्गो, महिलाओ और बच्चों पर लाठी चलाकर खत्म करवाया है ? रही बात हमारे प्रधानमन्त्री पर लगे आरोपों की तो भारत के प्रधानमन्त्री पर कितने आरोप लगे है ? उन्होंने कितने खरब के घोटाले अपनी सरकार में होने दिए...!! मै तारीफ करती हूँ अपने मुल्क की जम्हूरियत की ताकत की...हमारे अदालतों में वो माद्दा है कि हम प्रधानमन्त्री तक को भ्रस्ताचार में नही छोड़ते...जबकि आपलोग भारत के लोकतंत्र की तारीफ करते है...क्या भारत के किसी भी अदालत में ये माद्दा है कि इतने आरोपों के बाद भी वो प्रधानमन्त्री को सम्मन तक जारी कर सके...
हिना के तर्को में दम तो है !!
वैसे, हिना जी बोलती बहुत अच्छा हैं और दिखती भी अच्छी हैं ...
इसीलिए, मुझे उनकी बातों को सुनने में कुछ विशेष दिलचस्पी रहती है !!


Wednesday, 16 January 2013

केजरीवाल की खोज!

अभी कुछ दिन पहले मुझसे किसी ने पूछा भाई साब आज-कल अपने केजरीवालजी नज़र नहीं आते। अब उनके पास भांडा फोड़ने को कोई बचा नहीं क्या? उनसे कहिए जिस तरह से वो बड़े-बड़े राजनेताओं और उद्योगपतियों का  भाडाफोड़ा हैं। अगर उसी तरह मेरा भी एक बार  भाडाफोड़ कर देंगे तो बात बन जाएगी। क्योंकि  भांडा फोड़ से इन लोगों का कुछ होता तो नहीं, उपर से ये और ज्यादा चर्चा में आ जाते हैं और समाज में उनकी हैसियत का डंका बज जाता हैं। यानी केजरीवाल आज-कल बड़े लोग होने का एक तरह से सर्टिफिकेट प्रदान करते है। वो जिसका भी नाम लेते हैं। वह बड़ा आदमी माना जाता हैं, तो मैं भी सोच रहा था कि काश एक बार मेरा भी कोई खुलासा कर दें, तो मैं भी बड़े लोगों की कतार में आ जाऊं। आप तो पत्रकार हैं, एक बार उनको बताइए न कि मैं भी बहुत बड़ा घोटालेबाज हूं। सुईस बैंक में नहीं तो एसबीआई में तो मेरा खाता मिलेगा ही और अब तो एचडीएफसी में भी खुलबा लिया है। अगर अभी उनके पास समय नहीं हैं तो कुछ दिन बाद ही सही, पर एक बार मेरा नाम ले लेंगे, तब मेरा भी नाम बड़े लोगों में गिना जाएगा। समाज में आपनी भी हैसियत का डंका बज जाएगा। मैंने उससे कहा- भाई केजरीवालजी की तो खोज हम लोग भी कर रहें हैं। हम जैसे पत्रकार को तो वो बैठे बिठाए 2-4 घंटे  की खबर दे देते थे। पर कुछ दिन से तो उन्होंने खबर देना ही बंद कर दिया हैं। उसने कहा कही ऐसा तो नहीं कि अब उनके पास घोटालेबाजों की सूची ख़त्म हो गई है। या फिर इस बार वो कोई बड़ा खुलासा करने के लिए बड़ी तैयारी में जुटे हैं। मैंने कहा हो सकता है। पर हां ये बात सच है कि आज हमारे देश को कई और केजरीवाल जैसे साहसी लोगों की जरुरत है और न सिर्फ नेता बल्कि पत्रकार और आम जनता भी केजरीवाल की तरह चाहिए तभी इस देश का कल्याण हो सकता है।