Follow by Email

Followers

Tuesday, 2 October 2012

आज गाँधी जयन्ती है.

आज गाँधी जयन्ती है.....आज देश गाँधी जयन्ती मना रहा हैं......मनानी भी चाहिए......लेकिन क्या सिर्फ गाँधी जयंती मना लेने से उनकी आत्मा को शांति मिल जाएगी......क्या हमें ऐसा नहीं लगाता है कि महात्मागांधी के सपनों का भारत कहीं खो गया है? आज सत्य के नाम पर झूठ और धोखा धड़ी अहिंसा के नाम पर हिंसा और सत्याग्रह के नाम पर सिर्फ स्वार्थ देखने को मिलता हैं.....आज कल तो गाँधी की टोपी तक को लोग अपना-अपना नाम दे रहें हैं.....गाँधी जी के पद चिन्हों पर चलकर जहाँ हम गरीबी हटाकर ग्रामविकास का दंभ भरते थे, वहीं आज शहरी विकास के यत्न हो रहे हैं......धर्म कि आड़ में साम्प्रदायिकता का जहर फ़ैल रहा है और धार्मिक उन्माद से हिंसा का तांडव हो रहा है......जिस देश में समाजवाद और गरीबी हटाओं के नारे गूंज रहे थे, आज वही पूंजीवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है और गरीब को हटाने की साजिशें चल रहीं हैं.....हमारी स्वतन्त्रता और स्वावलम्बन को विदेशी हाथों में बेचा जा रहा है.....क्या गाँधी जी ने भावी भारत की यही तस्वीर बनाई थी? ऐसा लगता है कि आज भारतीय लोकतंत्र महज दिखावे भर के लिए है आज देश की इस दशा को देख कर एक महान कवि की कविता याद आ रही है..........
कवियों ने कवी के कलम तक बेच डाला!
नेतओं ने गाँधी की गाँधी गिरी तक बेच डाला!
मत पूछ क्या-क्या ना बिका इस दुनिया में!
लोगों ने तो अपने आँखों की शर्म तक बेच डाला!