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Wednesday, 24 January 2018

पी से ‘पॉलिटिक्स’, पी से ‘पद्मावत’


देश, संविधान, लोकतंत्र, सेंसर बोर्ड और कानून सब एक तरफ और करणी सेना दूसरी तरफ. जी हां ये विडंबना ही है कि हम सुपर पावर बनने की बात कर रहे हैं लेकिन मुढ़ी भर करणी सेना को काबू नहीं कर पा रहे हैं या यू कहे कि काबू करना नहीं चाहते हैं. संजय लीला भंसाली की फिल्‍म पद्मावत पर कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए करणी सेना का विरोध पिछले कई महीनों से जारी है. लेकिन सरकार चुप्पी साधी हुई है. 25 जनवरी को देशभर में भंसाली की फिल्म पद्मावत को रिलीज़ होना है. नतीजतन देश भर में करणी सेना और दूसरे संगठनों के बेकाबू लोग हिंसा पर उतर आए हैं. देश के बुद्धिजीवियों, मीडिया, फिल्म-जगत और आम जनता ने चौक-चौबारों पर बहस करके यही पाया कि फिल्म सामने आनी चाहिए. यहां तक कि निर्माताओं की गुहार सुनते हुए भारत के सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में फिल्म रिलीज करने का आदेश देते हुए यह भी कह दिया कि इसे प्रतिबंधित करना असंवैधानिक है.
लेकिन महीनों चले अप्रिय विवादों की सुरंग से निकलकर 25 जनवरी को बड़े परदे का मुंह देखने जा रही इस फिल्म का भविष्य अगर अमंगलमय नजर आ रहा है तो महज इसलिए कि मुट्ठी भर लोगों की एक निजी किस्म की जातीय सेना पूरे देश, खास तौर पर उत्तर भारत में इसकी रिलीज को लेकर बवाल काट रही है. राजपूतों की करणी सेना को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना का थोड़ा भी भय नजर नहीं आता. करणी सेना के लोगों ने दिल्ली एनसीआर उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में डीएनडी को ब्लॉक कर दिया और पुलिस की मौजूदगी में ही उन्होंने मारपीट भी की. लेकिन पुलिस कुछ नहीं कर रही.
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि इतना बल इस अनजान से संगठन में कहां से आया? अपने अहंकार को पालने का बल इसे कौन दे रहा है? न्यायालय, पुलिस, सरकार और मीडिया को ठेंगे पर रखने का हौसला आखिर इसे कैसे मिला? इन तमाम सवालों के जवाब सत्ता में बैठे राजनीतिक दलों की खामोशी में छिपे हुए हैं. करणी सेना के नेता देश जलाने संबंधी धमकियां देते हैं लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकारें चूं तक नहीं करतीं.

मोदी-योगी जी खामोश हैं और उनके प्रवक्ता करणी सेना के कृत्य को जस्टीफाई करते नजर आते हैं. राजपूत वोट बैंक के चक्कर में उन्हें यह फिक्र भी नहीं सताती कि एक मामूली सी फिल्म के चक्कर में अगर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना की जा सकती है तो बाकी अहम फैसलों का पालन किस विधि हो सकेगा. राजनीतिक दलों की सरपरस्ती में राजपूत अस्मिता की लड़ाई लड़ने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन दूसरों की अस्मिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना बुरा है. ये बवाल देश  में तब तक जारी रहेंगे जब तक वोट बैंक की गंदी राजनीति चलती रहेगी.